छोटी लाइन के सुनहले दिन

By Independent Mail | Last Updated: Jul 28 2018 4:46PM
छोटी लाइन के सुनहले दिन
  • परशुराम शर्मा की फेसबुक वाल से

बचपन में ट्वाय ट्रेन का मजा हम ननिहाल जाने पर उठाया करते थे। इसके लिए हमें शिमला अथवा दार्जिलिंग जाने की जरुरत नहीं थी। यह आरा-सासाराम के बीच चलने वाली छोटी लाइन की ट्रेन थी। हमारी 'ट्वाय ट्रेन' आरा स्टेशन से ननिहाल जाने के रास्ते में मिला करती थी। इसमें खूब भीड़ होती थी। उस समय यह ग्रामीण आबादी की लाइफ़ लाइन थी। उपर से नीचे तक पूरी ट्रेन यात्रियों से ठूंसी होती। अपने होश में उस ट्रेन से पहली बार मां के साथ हमें आरा से गड़हनी तक का सफर करने का मौका मिला था। तब भारी भीड़ के बावजूद छोटी लाइन का वह सफर मुझे काफी रोमांचक लगा था। हम बहुत छोटे थे। हमें मालूम हुआ कि पहले भी हम उसी ट्रेन से मां के साथ उनकी गोद में आते-जाते रहे हैं। बाद में भी जब तब इसका आनंद उठाते रहे।

सुनहला सपना था गाड़ी में चढ़ना-उतरना

बाल अवस्था में यह अजीब स्थिति होती है कि बड़े लोग तो सोने के बाद सपने देखते होगें। पर बच्चे तो दिन-रात सोते-जागते सुनहले सपनों में खोये रहते हैं। छोटी लाइन की गाड़ी में चढ़ना-उतरना भी मेरे लिए एक सुनहला सपना था। बड़ी लाइन वाली भारी भरकम रेलगाड़ी देख कर तब मुझे डर लगता था। बनाही स्टेशन पर बड़ी लाइन के ऊंचे रेल डिब्बे में कभी अकेले अपने दम पर नहीं चढ़ पाता। मां या किसी बड़े जन का सहारा लेना पड़ता। वहीं आरा में ऐसी परेशानी नहीं थी। वहां स्टेशन के बड़े प्लेटफार्म पर गाड़ी से जब मुझे नीचे उतारा जाता, तो मना करने के बाद भी तुरंत मां का हाथ छोड़ मैं छोटी लाइन वाले प्लेटफार्म की ओर भागता। छोटी गाड़ी के डिब्बे में अकेले चढ़ने के लिए मैं मचलने लगता। वहां छोटी लाइन वाले प्लेटफार्म पर खड़ी छोटी रेलगाड़ी को देख कर ही मैं चैन पाता।

खिड़की वाली जगह लूटने की थी होड़

बड़े प्लेटफार्म से सटे थोड़ा नीचे की ओर छोटी लाइन का अलग प्लेटफार्म बना था। वहीं से गाड़ी आती-जाती थी। पूरे गहमा गहमी के बीच उस पर खड़ी मेरी ट्रेन वहां खुलने के लिए तैयार नजर आती। फिर मेरे मन में एक दूसरी बेचैनी उठने लगती कि कैसे वहां जल्दी पहुंचा जाये ? तुरंत डिब्बे में घुसकर खिड़की वाली जगह लुटी जाये, ताकि गड़हनी तक के पूरे सफर में बाहर देखने का मुझे भरपूर आनंद मिल सके। यदि खिड़की के पास वाली सीट पर पहले से बैठा कोई यात्री मिल जाता तो मन में भारी कोफ्त होती। पहले मां पर आंखें तरेरता कि तुम्हारे धीरे चलने के कारण देर हुई और मैं अपनी मन पसंद जगह नहीं लूट सका। फिर मेरा बाल मन तुरंत कोई तरकीब भिड़ाने में लग जाता। मां मेरा मन समझ जाती। वह मुझे फुसलाने की कोशिश करती कि थोड़ा रुक , चाचा आकर कोई व्यवस्था करा देंगे। वे पीछे आ रहे हैं। तुम्हारे लिए कुछ खरीद रहे हैं।

पता ही नहीं चलता कि कब मंजिल आ गयी

मैं महसूस करता कि मायक़े जाने वाली छोटी लाइन के रास्ते पर आते ही मां भी आजाद हो जाती। ससुराल के अपने गाँव से बनाही तक वह पूरे पर्दे में ढकी सकुचायी सी आयी थी। अब मां यहां घूंघट में नहीं होती। मैं तो खैर खुद को तभी से उड़ता हुआ अनुभव करता,जब ननिहाल जाने के लिए मां मुझे गांव पर तैयार करती। मुझे जूता-मोजा और हाफ पैंट तथा कमीज पहना रही होती। यहां अब हम दोनों अपने मन माफिक आजाद सफर से खुश थे। मां अपने मायक़े पहुंचने की याद में मगन थी। इधर मैं डिब्बे के अंदर खिड़की वाली सीट पर बैठने के जुगाड़ में जुट जाता। वैसे भी छोटे चाचा से मुझे कोई बहुत उम्मीद नहीं थी। इस बीच मैंने हिम्मत बटोर कर सामने वाले मुसाफिर से थोड़ा खिसक कर बैठाने की चिरौरी की। वे बुजुर्ग थे। मुझे बच्चा देखा। पहले मुस्कुराये फिर मान गये। उन्होंने खिसक कर अपने पास मुझे खिड़की वाली जगह दे दी। अपनी तरकीब कामयाब होते देख मन ही मन मैं झूम उठा। मैंने खुद ही अपनी पीठ ठोंकी। मां की ओर मैंने एक विजयी मुस्कान फेंका और खिड़की वाली सीट पर शान से कब्जा जमा कर बैठ गया। जैसे, मुझे कोई राज सिंहासन मिला हो। अब कायदे से मेरे सपनों का सफर शुरू होना है। मैं मुंह बाये डिब्बे के बाहर निहारने में मस्त हो जाता। पता ही नहीं चलता कि कब मंजिल आ गयी। मैं तो आरा से लेकर गड़हनी तक रास्ते में पड़ने वाली हर चीज़ को बहुत गौर से देखने में लगा रहा। यह भी मालूम नहीं हुआ कि चाचा कब आकर सामने वाली सीट पर बैठ चुके थे? चीनिया बादाम का ठोंगा उनके हाथ में ही रखा रह गया।

नाकों में टकरा जाती थी गरम पकौड़े और कुरकुरे भजियों की महक

मन में उदवंतनगर एवं कसाप स्टेशनों के बोर्ड चमकने लगे थे। एक-दो सफर के बाद ही गड़हनी तक के स्टेशनों के नाम कंठस्थ हो गये। रास्ते की हर चीज़ मेरे दिमाग में उतरती रही। जबकि उन दिनों पढ़ाई के दौरान बार-बार रट्टा मारने के बाद भी कोई पहाड़ा ठीक से याद नहीं होता था। तब मुझे यह नहीं पता था कि किसी मनचाही चीज़ को दिल-दिमाग में उतारना रट्टा मारने से भी कहीं ज्यादा सरल काम होता है। मुझे आज भी उदवंत नगर और कसाप स्टेशनों की झोपड़ीनुमा वे दुकानें याद हैं। वहां कोयले वाले बड़े चुल्हों पर चढ़े कड़ाहों से तल कर खुली थालों में रखे गरमा गरम पकौड़े तथा कुरकुरे भजियों की महक नाकों में टकरा जाती है। शीशे वाले गोलाकार खोमचों में सजाये देशी मिठाईयों का स्वाद अब भी बेचैन कर जाता है। लोग गाड़ी से उतर कर घर के लिए वहां मिठाई खरीदा करते थे। रास्ते में पड़ने वाला बड़ा स्कूल-भवन, सड़क किनारे बने कुछ पक्के और ज्यादातर कच्चे मकानों की बेतरतीब कतारें भी याद हैं। बीच में दूर तक पसरा खाली सन्नाटा सड़क पर कभी-कभार गुजरती गाड़ियों से टूटता था। खंभों के बीच टेलीफोन के तारों पर बैठी चिड़ियों में मेरी नजर सदा नीलकंठ के दर्शन की तलाश करती। हम उसका दर्शन शुभ मानते। अब सब बदल गया है। आबादी बहुत बढ़ गयी। भीड़भाड़ ज्यादा हो गयी है। हम जिस खिलौने जैसी रेल गाड़ी की बात कर रहे हैं। इसका परिचालन भी कब का बंद हो चुका है। कभी हमारे इलाके में वह शान से सीटी बजाते फर्राटे भरती थी। आरा-सासाराम के बीच की उस इकलौती सवारी गाड़ी में तब रोज हजारों-हजार लोग सफर किया करते थे। थोड़ा बड़े होने के बाद वहां हम कई बार अकेले गये। बहाने बना-बना कर जाते और उसकी सवारी का मजा लेते। अब तो बच्चों को यह परियों की कहानी जैसी लगेगी।

साइकिल की रफतार से थोड़ी अधिक थी छुक..छुक गाड़ी की रफतार

हमारा ननिहाल गड़हनी और सेमरांव स्टेशनों के बीच एक गांव में है। वहां से दोनों स्टेशनों की दूरी लगभग डेढ़-दो कोस थी। हम मां के साथ अक्सर वहां जाया करते थे। नानी और मामी -मामा बहुत प्यार करते थे। उन पर हम खुब अपना हक जमाते। अब वे नहीं हैं। मेरी मां भी भगवान को प्यारी हो गयी। पिता जी भी नहीं रहे। मेरे लगभग सारे तार बिखर गये। वहां आना -जाना छूट गया। उधर, आरा-सासाराम छोटी लाइन भी बंद हो चुकी है। बचपन का बचा-खुचा वह आकर्षण भी मिट गया। सालों बाद अब उस मार्ग को बड़ी लाइन से जोड़ा गया है। सड़क मार्ग पहले की तरह चालू है। लेकिन सड़क के बिलकुल समानांतर चलने वाली छोटी रेल लाइन वाली गाड़ी गायब है। उसका आकर्षण एकदम अलग था। मुझे अभी उधर पिछले दिन सड़क मार्ग से वहां जाने का मौका मिला था। सारे रास्ते मेरी आंखें छोटी लाइन के बचे-खुचे कुछ पुराने अवशेषों को ढूंढती रही। पर अब सब कुछ बदल गया था। बमुश्किल कुछ जगहों को देख कर पुरानी यादें बनती एवं मिटती रही। मन उदास हो गया। रास्ते पत्नी को बताता रहा कि कहां-कहां पहले क्या था? पता नहीं वह क्या समझी होगी? पर, मैं तो अपनी धुन में बस बकता रहा। उस रेल गाड़ी की रफ्तार कम होती थी। साइकिल की रफतार से थोड़ी अधिक। थोड़ा बड़े होने के बाद हमलोग कभी-कभी अपनी साइकिल से उसकी गति से मुकाबला कर लेते। चलती गाड़ी में चढ़ना-उतरना हमलोगों का सबसे बड़ा रोमांचक कारनामा होता था। आगे अपने छोटे इंजन से कोयले का धुआँ उगलते हुए छुक..छुक..की आवाज के साथ मदमाती चाल से वह अपनी गति से चलती। हम उसके समानांतर गाड़ी से उतर कर कभी साथी के पीछे साइकिल पर सवार होते, तो कभी उतर कर बोगी में चढ़ जाते। आज भी वह सब सोच कर मन में एक खुशी की लहर दौड़ जाती है। आज वह ट्रेन होती भी तो हम पहले वाले खेल का मजा कहां ले पाते? बढ़ते उम्र का तकाजा जो है। बाकी लोगों की तरह अब हम भी चुपचाप टिकट कटा कर एक स्टेशन पर सवार होते। दूसरे पर उतर जाते। जैसे तब के लोग वहां किया करते थे। हम उस समय अपना बचपना छोड़ जवानी की ओर जो कदम बढ़ा रहे थे। किशोरावस्था की बात दूसरी होती। मन में भारी जोश भरा रहता है। खतरों की परवाह नहीं होती। तब हमलोग कुछ ऐसे ही दौर से गुजर रहे थे।

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