अंतरिक्ष में युद्ध क्षमता बढ़ाने में जोरशोर से जुटा भारत

By Independent Mail | Last Updated: Apr 7 2019 11:46PM
अंतरिक्ष में युद्ध क्षमता बढ़ाने में जोरशोर से जुटा भारत

एजेंसी, नई दिल्ली। भारत पिछले महीने एंटी-सैटेलाइट मिसाइल के सफल परीक्षण के बाद अब अंतरिक्ष में दुश्मन के इरादों को चकनाचूर करने की क्षमता विकसित करने के कई अन्य विकल्पों पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। इनमें डायरेक्टेड एनर्जी वेपंस और को-ऑर्बिटल किलर्स की मौजूदगी के साथ-साथ अपने उपग्रहों को इलेक्ट्रॉनिक या फिजिकल अटैक्स से बचाने की क्षमता पैदा करने जैसे उपाय शामिल हैं।

स्पेस टेक्नोलॉजी की दिशा में तेजी से बढ़ रहा देश

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के प्रमुख जी सतीश रेड्डी ने बताया, हम DEWs, लेजर्स, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक पल्स (ईएमपी) और को-ऑर्बिटल वेपंस समेत कई तकनीक पर काम कर रहे हैं। मैं इसकी विस्तृत जानकारी नहीं दे सकता, लेकिन हम इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। 27 मार्च को लो-अर्थ ऑर्बिट (एलईओ) में 283 किलोमीटर की दूरी से माइक्रोसैट-आर सैटेलाइट को मार गिराने वाला एएसएटी मिसाइल दिशा-निर्देशित गतिमान मारक हथियार (डायरेक्टसेंट, काइनेटिक किल वेपन) था। डीआरडीओ चीफ ने कहा कि अंतरिक्ष में 1,000 किलोमीटर तक की दूरी तय कर सकनेवाले त्रीस्तरीय इंटरसेप्टर मिसाइल की एकसाथ कई लॉन्चिंग से कई उपग्रहों को भेदा जा सकता है।

चीन भी कर रहा है तैयारी

को-ऑर्बिटल वेपन मूलरूप से एक उपग्रह ही होता है जिसमें कुछ विस्फोटक, हथियार या डीईडब्ल्यू डिवाइस लगे होते हैं। को-ऑर्बिटल वेपन को पहले अंतरिक्ष की कक्षा में रखा जाता है और फिर इससे दुश्मन के उपग्रहों को निशाना बनाया जाता है। चीन इन काइनेटिक किल वेपंस के अलावा अन्य एंटी-सैटेलाइट वेपंस, मसलन लेजर्स जैमर्स, ईएमपी और हाई-पावर्ड माइक्रोवेव्स आदि तेजी से तैयार कर रहा है। उसने पहली बार एंटी-सैटेलाइट मिसाइल का परीक्षण 2007 में एक लो-ऑर्बिट वेदर सैटलाइट को भेदकर किया था।

भविष्य की तैयारी में जुटे हैं वैज्ञानिक

सूत्रों का कहना है कि भारत प्रतिस्पर्धा में कड़ी टक्कर देने के साथ-साथ दोनों, एलईओ और जीईओ सिंक्रोनस ऑर्बिट्स, में मौजूद उपग्रहों के खिलाफ एएसएटी वेपंस विकसित करने के दूरगामी लक्ष्य पर काम कर रहा है ताकि अंतरिक्ष में अपनी बढ़ती सामरिक संपदा पर उभरते खतरों से निपट सके। ईएमपी हमारे सैटेलाइट्स और सेंसर्स को सुरक्षा कवच प्रदान कर रहे हैं और इनका इस्तेमाल उन्हें अपने दुश्मनों से सुरक्षित रखने में किया जा सकता है। दुश्मन द्वारा हमारे मुख्य उपग्रहों को निशाना बनाए जाने की स्थिति में सेना की मांग पर छोटे-छोटे उपग्रहों की लॉन्चिंग की योजना पर भी काम हो रहा है।

फुलफ्लेज्ड एयरोस्पेस मिलिट्री कमांड की तैयारी?

डीआरडीओ चीफ जी सतीश रेड्डी ने कहा कि एंटी-सैटेलाइट सिस्टम्स के शस्त्रीकरण (वेपनाइजेशन) या एक फुलफ्लेज्ड एयरोस्पेस मिलिट्री कमांड बनाने जैसे मुद्दे पर आखिरी फैसला सरकार को लेना है। उन्होंने कहा, सैन्य क्षमता के लिहाज से अंतरिक्ष का महत्व बढ़ गया है। सुरक्षा सुनिश्चित करने का सर्वोत्तम उपाय प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना है। डीआरडीओ चीफ ने स्पष्ट किया कि अब फिलहाल नए एंटी-सैटेलाइट मिसाइल परीक्षण पर काम नहीं हो रहा है। उन्होंने कहा, मिशन शक्ति के सफल प्रदर्शन से भारत एएसएटी क्षमता वाले तीन देशों (अमेरिका, चीन और रूस) के एलिट क्लब में शामिल हो गया है।

नासा के दावे को इसरो ने नकारा

रेड्डी ने कहा, क्षमता प्रदर्शन के लिए परीक्षण हेतु करीब 300 किलोमीटर की कक्षा चुनी और इसका मकसद वैश्विक अंतिरक्षीय संपत्तियों को मलबे से खतरा पहुंचाने से रोकना है। उन्होंने कहा, परीक्षण के बाद पैदा हुआ मलबा कुछ हफ्तों में नष्ट हो जाएगा। मंगलवार को नासा ने उसके एक उपग्रह को भारत की तरफ से मार गिराए जाने को 'भयावह' बताया और कहा कि इस मिशन के चलते अंतरिक्ष में मलबे के 400 टुकड़े बिखर गए।

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