हम स्वयं को अच्छा इंसान बनाएं

By Independent Mail | Last Updated: Jan 9 2019 11:25PM
हम स्वयं को अच्छा इंसान बनाएं

पांडवों और कौरवों को शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा देते समय एक बार गुरु द्रोणाचार्य को अपने शिष्यों की परीक्षा लेने का ख्याल आया। परीक्षा का विषय क्या हो, इस पर विचार करते हुए उनके दिमाग में एक युक्ति सूझी कि क्यों न राजकुमारों की वैचारिक प्रगति और व्यावहारिकता की परीक्षा ली जाए। दूसरे दिन सुबह आचार्य ने राजकुमार दुर्योधन को अपने पास बुलाया और कहा कि वत्स, तुम समाज से एक अच्छे आदमी की परख करके उसको मेरे सामने पेश करो। दुर्योधन ने कहा, जैसी आपकी आज्ञा और वह अच्छे आदमी की खोज में निकल गया। कुछ दिनों बाद वापस दुर्योधन आचार्य के पास आया और कहा कि मैने कई नगरों और गांवों का भ्रमण किया, लेकिन मुझे कहीं भी कोई अच्छा आदमी नहीं मिला। द्रोण ने पूछा, इतने बड़े समाज में आपको एक भी अच्छा इंसान नहीं मिला? दुर्योधन ने कहा, नहीं गुरुदेव। द्रोण ने सुना और मुस्करा दिए। हालांकि, उन्होंने कहा कुछ भी नहीं।

इसके बाद आचार्य द्रोण ने युधिष्ठिर को बुलाया और कहा वत्स, इस पृथ्वी पर कोई बुरा आदमी मिले, तो उसे ढूंढकर मेरे पास लाओ। युधिष्ठिर ने आचार्य को प्रणाम किया और कहा कि आचार्य मैं कोशिश करता हूं और युधिष्ठिर बुरे आदमी की खोज में निकल गए। काफी दिनों बाद वह लौटकर आए तो आचार्य ने पूछा कि किसी बुरे आदमी को ढूंढकर लाए हो? युधिष्ठिर ने कहा कि आचार्य मैंने धरती के कोने-कोने में बुरा आदमी खोजा, लेकिन मुझे कोई नहीं मिला। इसलिए मैं खाली हाथ लौट आया। द्रोण ने युधिष्ठिर की बात सुनी और मुस्करा दिए। आश्रम में मौजूद सभी शिष्य गुरु की मुस्कान देखकर आश्चर्य में पड़ गए कि जब दुर्योधन को कोई अच्छा आदमी नहीं मिला था, तब भी गुरु जी मुस्कराए थे और अब जबकि युधिष्ठिर किसी बुरे आदमी को नहीं खोज पाए, तो भी वह मुस्करा रहे हैं। इसके बाद सभी शिष्यों ने गुरु द्रोणाचार्य से पूछा कि आचार्य ऐसा क्यों हुआ कि दुर्योधन को कोई अच्छा आदमी नहीं मिला और युधिष्ठिर को कोई बुरा आदमी नहीं मिला। आचार्य ने इस सवाल का जवाब दिया और कहा कि जो इंसान जैसा होता है, उसको दुनिया में सभी वैसे ही दिखाई देते हैं। इसलिए दुर्योधन को कोई अच्छा आदमी नहीं मिला और युधिष्ठिर को कोई बुरा आदमी नहीं मिला। वास्तव में हम जैसे होते हैं, वैसी ही हमारी धारणा भी बन जाती है। जब उस धारणा को आगे रखकर हम किसी व्यक्ति को देखते हैं, तो उसे अपना ही प्रतिबिंब पाते हैं। इसीलिए हम जैसे होते हैं, उसे भी वैसा ही मान लेते हैं। जो लोग अच्छे होते हैं, उन्हें दुनिया में एक भी बुरा आदमी नहीं मिलता। सज्जन लोग तो अपने ही गिरेबां में झांकते हैं और स्वयं को देखते हैं कि वे कैसे हैं। कबीर ने कहा भी है, बुरा जो देखने मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, जो दिल देखा आपना, मुझ से बुरा न होय। जो दुर्जन होते हैं, उन्हें पूरी ही दुनिया खराब दिखती है। दुर्योधन को इसीलिए एक भी अच्छा इंसान नहीं मिला, तो युधिष्ठिर धर्मराज थे, इसीलिए उन्हें एक भी दुर्जन पूरी दुनिया में नहीं मिला।नरेश लक्ष्यकार

 

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