मुठभेड़ों पर सुप्रीम कोर्ट की गंभीरता सुखद

By Independent Mail | Last Updated: Jan 25 2019 12:58AM
मुठभेड़ों पर सुप्रीम कोर्ट की गंभीरता सुखद

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार को कथित फर्जी मुठभेड़ों के मामले में नोटिस जारी कर दिया। इससे पहले संयुक्त राष्ट्रसंघ के चार मानवाधिकार विशेषज्ञ उत्तर प्रदेश में मार्च 2017 से अब तक हुई पुलिस मुठभेड़ों पर चिंता जता चुके हैं। बता दें कि मार्च-2017 से अब तक यूपी में कम से कम 59 लोगों की मौत मुठभेड़ों में हुई है। हम संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों की राय को विदेशियों की सोच बताकर खारिज नहीं कर सकते। यूपी पुलिस खुद बता चुकी है कि योगी के मुख्यमंत्री बनने केबाद से अब तक राज्य में 1,038 एनकाउंटर हुए, जिनमें 32 लोग मारे गए। यानी, पुलिस मुठभेड़ों की बात स्वीकार करती है, लेकिन उन्हें फर्जी नहीं मानती। उसकी दलील रहती है कि गोलियां उसने आत्मरक्षा में चलाईं। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि मुठभेड़ के बाद एक एफआईआर दर्ज करनी होगी और फिर उसकी वैधता साबित करनी होगी। दरअसल, सोच-समझकर मारने और आत्मरक्षा के लिए चली गोलियों में मारे जाने में फर्क इतना बारीक होता है कि इस बारे में पुख्ता राय बड़ी मुश्किल से ही बनाई जा सकती है। मानवाधिकारवादी यही मानते हैं कि पुलिस सोच-समझकर अपराधों के आरोपियों को मारती है। वर्ष 2017 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पिछले 12 साल का आंकड़ा जारी किया था, जिसमें देश भर से फर्जी मुठभेड़ों की कुल 1241 शिकायतें आयोग के पास पहुंची थीं। इनमें अकेले 455 मामले यूपी पुलिस के खिलाफ थे। जब राज्य नेतृत्व अपराधियों से सख्ती से निपटने की बात करता है, तो पुलिस इसे अपने लिए एक तरह की छूट के तौर पर देखने लगती है। इसके बाद कथित अपराधियों को मारकर वाहवाही पाने की कोशिश शुरू हो जाती है। कई पुलिस अधिकारी जनता की नजर में हीरो बनने या मेडल-प्रमोशन पाने के लिए फर्जी मुठभेड़ का सहारा लेने लगते हैं। कई बार यह धंधा भी बन जाता है। कुछ स्टिंग ऑपरेशनों से यूपी पुलिस पर पैसे लेकर लोगों को मारने के आरोप भी लगे हैं। किसी लोक कल्याणकारी व्यवस्था के लिए यह स्थिति ठीक नहीं है। माना कि पुलिस जिन लोगों को मारती होगी, वे अपराधी प्रवृत्ति के होते होंगे, लेकिन कानून पुलिस को अपराधियों को मारने का अधिकार नहीं देता। ऐसे में यह ठीक ही है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया।

मानवाधिकार कार्यकर्ता समर अनार्य के ब्लॉग से...

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