'स्वस्थ शरीर में ही छिपा है सार्थक जीवन का रहस्य'

By Independent Mail | Last Updated: Apr 10 2019 12:06AM
'स्वस्थ शरीर में ही छिपा है सार्थक जीवन का रहस्य'

चिकित्सकों ने एक बीमार व्यक्ति को बार-बार सलाह दी कि जान बचानी है तो शराब को पूरी तरह छोड़ दो। वह समझ चुका था कि शराब ही उसकी बीमारी का मुख्य कारण है और इससे उसके अंदरूनी अंग नष्ट हो रहे हैं। पर वह शराब नहीं छोड़ पाया। एक दिन वह जीवन से ही हाथ धो बैठा। शंकराचार्य विरचित 'स्तोत्ररत्नावली' के चर्पटपंजिरिकास्तोत्रम् में मानवाचार की इस विडंबना का उल्लेख है कि अनुचित, आपत्तिजनक कार्य या व्यवहार में लिप्त व्यक्तियों को अंतत: दुर्दशा में गिरते देखकर भी देखने वालों की आंखें नहीं खुलतीं। मनुष्य रूप में जीवात्मा अपने विवेक, सूझ-बूझ व सत्कार्यों से सार्थक जीवन जी कर अन्य लोगों के लिए रोल मॉडल बन सकता है और अपना भविष्य और परलोक दोनों सुधार सकता है। लेकिन सभी कार्य सुचारू तौर पर निभाने के लिए शरीर को स्वस्थ और मन को प्रफुल्लित रखना होगा। तन व्याधिग्रस्त हो या मस्तिष्क तनावग्रस्त हो तो ध्यान, पूजा-अर्चना भी भलीभांति नहीं होगी। इन्हें फलदायी बनाने के लिए शारीरिक स्फूर्ति और मानसिक एकाग्रता, समर्पित भाव और ग्राही मुद्रा आवश्यक है। दूसरी बात, मन और शरीर एक-दूसरे पर पूर्ण रूप से निर्भर हैं। एक के अस्वस्थ रहने पर दूसरा स्वस्थ नहीं रह सकता। प्रबंधशास्त्र में पिछले तीन दशकों से लोकप्रिय न्यूरो लिंग्विस्टिक प्रोग्रामिंग की भी आधारभूत मान्यता है कि शरीर और मन एक ही अस्मिता के दो पाट हैं। किसी वस्तु की अनुपस्थिति में उसकी अहमियत का विशेष एहसास होता है। जैसे पतझड़ में भूमि पर गिरे पुष्प-पत्तों को देखकर तनिक मलाल होता है कि एक समय ये पेड़ कितने सुंदर थे। डॉ. थॉमस फुल्लर ने कहा है, अच्छे स्वास्थ्य की भूमिका का एहसास हमें तब होता है जब बीमारी लग जाती है। समस्त चराचर जगत एक शानदार सामंजस्य के सिद्धांत पर टिका है। दैनंदिन जीवन में स्वास्थ्य के प्रति ढिलाई न बरती जाए, इस उद्देश्य से शारीरिक देखरेख को धार्मिक दायित्व से जोड़ दिया गया है। 

शरीरम् हि धर्म खलु साधनम्। यानि शरीर अभीष्ट और आध्यात्मिक लक्ष्य हासिल करने का साधन या वाहक भर है। इस कर्तव्य की अनदेखी से हमारे अन्य कार्य भी सुचारू रूप से नहीं होंगे। स्वास्थ्य ठीक न रहने पर तमाम धन-दौलत, ज्ञान, कौशल, समझदारी धरी रह जाती है। आध्यात्मिक रूप से सुदृढ़ और स्वस्थ व्यक्ति को ईश्वरीय शक्ति का संबल निरंतर उपलब्ध रहता है। इसीलिए वह ऐसा अलौकिक कार्य निष्पादित करने में समर्थ होता है जिन्हें साधारण बुद्धि  नहीं समझ सकती। मनुष्य का असल स्वरूप शुद्ध आत्मा है, जो उसे परमात्मा से निरंतर जोड़े रहती है। सृष्टि के आरंभ में सभी वस्तुओं का स्वरूप शुद्ध आध्यात्मिक था। संसार में जो भी मौजूद है, उसके अमूर्त मॉडल पहले से आध्यात्मिक लोक में विद्यमान बताए गए हैं। अनंत क्षेत्र में व्यापक ब्रह्मांड ही हमारा स्थाई ठौर है, जहां हम मानसिक स्तर पर विचरण करते हैं, वर्गफुट तक परिसीमित फ्लैट में नहीं। आंकलन यह करना  होगा कि उस मानसिक ड्राइंग रूम को  हम कितना सुसज्जित और विद्वेष भावों  से मुक्त रखते हैं।

  •  हरीश बड़थ्वाल 
image
Copyrights @ 2017 Independent NewsCorp (P) Ltd., Bhopal. All Right Reserved