खुशी समाप्त होने के कारण

By Independent Mail | Last Updated: Feb 11 2019 2:53PM
खुशी समाप्त होने के कारण

प्रसन्नता या खुशी एक छोटा-सा शब्द है, पर इसके रंग अनेक हैं। उसी तरह जीवन के भी अनेक रंग हैं। खुशी एक अनुभूतिजन्य शब्द है लेकिन इसको महसूस करने के लिए हम उन अनेक आयामों में जाते हैं जिनके केंद्र में रहकर हम चरम सीमा तक सकारात्मक अनुभव करते हैं। हालांकि, खुशी की परिभाषा बहुत विस्तृत है लेकिन उसमें कुछ विकृतियां भी आ गयी हैं। बहुत से लोग अब दूसरों की तकलीफ देखकर प्रसन्न होने लगे हैं। दरअसल, हम एक अजीब स्पर्धा के समय में जी रहे हैं। कभी रेल में साधारण दर्जे की यात्रा करते वक्त बैठने और रेल के चल देते ही सहयात्रियों में आपस में बातचीत होने लगती थी, कहां से आ रहे हैं, कहां जा रहे हैं और इसी में लोगों को खुशी मिल जाती थी। अगर गंतव्य एक हुआ, तो वहां के मोहल्ले और जान-पहचान वालों, प्रसिद्ध लोगों का नाम लेकर हम एक-दूसरे से जुड़ जाते थे। जब खाने के समय सब अपनी-अपनी पोटली और डिब्बे खोलते थे, तब यह डर कहां हुआ करता था कि कहीं खाने में कुछ मिला न हो। स्टेशनों पर एक-दूसरे के लिए चाय भी बड़े उदार मन से ले ली जाती थी। आज तो रेलयात्री साथ में यात्रा करते हुए अपने खूब रिजर्व होने का परिचय देते हैं। खाने-पीने की तो बात ही छोड़िए, अब यह जोखिम कोई नहीं लेता क्योंकि प्रसाद से लेकर पेड़े तक में खिला-पिलाकर लूट लेने की सैकड़ों घटनाएं आए दिन होने लगी हैं।

इसका कारण यह है कि हमारा समय एक अजीब किस्म की दौड़ से भर गया है। पहले पड़ोसी के दर्द से हमारी भी आह निकलती थी, अब उसकी आह पर हम खुशी मनाते हैं। सचमुच हम एक निर्मम और संवेदनहीन समाज में बदलते जा रहे हैं और जब पूरी तरह बदल जाएंगे, तो क्या होगा? पहले हम हम सौ साल के जीवन को बहुत मान लिया करते थे, लगभग अमरत्व का पर्याय। थोड़ा पैसा आ गया और हम खुश हो गये लेकिन अब धनलोलुपता भी हम में पीढ़ियों तक को समृद्ध कर देने की हद तक देखी जाती है, जबकि जीवन का कोई भरोसा नहीं है। इस क्षणभंगुरता के बावजूद हम दशकों तक के लिए योजनाएं बनाते हैं। हम सब इस दुनिया में उसी तरह से हैं, जैसे रेस्टोरेंट में खाना खाने जाते हैं और साफ-सुथरी मेज के सामने बैठते हैं। हमसे पहले जो आया, वह हमारे लिए एक अच्छी दुनिया छोड़ कर गया है, हमारा भी फर्ज है कि हमारे बाद जो आये, उसे भी अच्छी दुनिया जो हमारे द्वारा छोड़ी गयी हो, वह मिले। बुद्ध की जातक कथाओं में जीवन का सारतत्व समाहित है। बुद्ध को बुद्ध होने में 547 जन्म लेने पड़े थे। उनके हर जन्म की एक कथा है जो हर मनुष्य के लिए प्रेरक है। यदि बुद्ध ने सिंह के रूप में जन्म लिया, तो उनके राज्य में छोटे से छोटे प्राणी को भी अभय था। गजमोक्ष नामक एक नाटक जो एक लालची आदमी और हाथी की मैत्री पर है, उसमें लालची आदमी हाथी की सदाशयता का फायदा उठाकर उसके दांत मांग लेता है। हाथी उसे अपने दांत दे देता है जो उसके द्वारा निर्ममता से काट लिया जाता है। हम स्वार्थी होते चले जा रहे हैं, इसलिए हमारे जीवन से खुशी काफूर हो गयी है।

  • भंते ज्ञानदीप
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