रावण की भक्ति में भी था अहंकार

By Independent Mail | Last Updated: Feb 22 2019 9:54PM
रावण की भक्ति में भी था अहंकार

सद्गुरु जग्गी वासुदेव

रावण शिव का महान भक्त था। उसके बारे में अनेक कहानियां प्रचलित हैं। एक भक्त को महान नहीं होना चाहिए, लेकिन वह एक महान भक्त था। वह दक्षिण से लंबी दूरी तय कर कैलाश पर्वत पहुंचा। मैं चाहता हूं कि आप बस कल्पना करें कि वह लंबी दूरी तय करके शिव की पूजा करने कैलाश गया। वहां पहुंचकर वह शिव की प्रशंसा में स्तुति गाने लगा। उसके पास एक ड्रम था, जिसकी ताल पर उसने तुरंत ही 1008 छंदों की रचना कर डाली, जिसे शिव तांडव स्तोत्र के नाम से जाना जाता है। उसके संगीत को सुनकर शिव बहुत ही आनंदित और मोहित हो गए। रावण गाता जा रहा था और गाने के साथ-साथ उसने दक्षिण की ओर से कैलाश पर चढ़ना शुरू कर दिया। जब रावण लगभग ऊपर तक आ गया और शिव उसके संगीत में मंत्रमुग्ध थे, तो पार्वती ने देखा कि एक व्यक्ति ऊपर आ रहा है और ऊपर यानी शिखर पर केवल दो लोगों के लिए ही जगह है। पार्वती को रावण का ऊपर आना अच्छा नहीं लगा। उन्होंने शिव को उनके हर्षोन्माद से बाहर लाने की कोशिश की। वह बोलीं, वह व्यक्ति बिल्कुल ऊपर ही आ गया है। अगर वह वहां तक आ गया, जहां हम हैं, तो उसे कहां बैठाया जाएगा। लेकिन शिव अब भी संगीत और काव्य की मस्ती में लीन थे। आखिरकार, पार्वती उनको संगीत के रोमांच से बाहर लाने में सफल हुईं। वह भोलेबाबा को यह समझाने में कामयाब रहीं कि अगर रावण ऊपर आ गया, तो उससे क्या-क्या नुकसान हो सकता है। शिव की समझ में बात आ गई और जब रावण शिखर तक पहुंच गया, तो शिव ने उसे अपने पैर से धक्का मार कर नीचे गिरा दिया। रावण कैलाश के दक्षिणी मुख से फिसलते हुए नीचे की ओर गिरा। ऐसा कहा जाता है कि उसका ड्रम उसके पीछे घिसट रहा था और जैसे-जैसे रावण नीचे जाता गया, उसका ड्रम पर्वत पर ऊपर से नीचे तक, एक लकीर खींचता गया। अगर आप कैलाश के दक्षिणी मुख को देखें, तो आप बीच में से ऊपर से नीचे की तरफ आता एक निशान देख सकते हैं। माना जाता है कि यह वही निशान है, जो रावण के ड्रम के कारण पड़ गया था। कैलाश के एक और दूसरे मुख के बीच अंतर या भेदभाव करना ठीक नहीं है, लेकिन कैलाश का दक्षिण मुख हमें ज्यादा प्रिय है, क्योंकि अगस्त्य मुनि कैलाश के दक्षिणी मुख में विलीन हो गए थे। मुझे यह भी लगता है कि कैलाश का दक्षिणी मुख सबसे ज्यादा सुंदर है। यह सबसे ज्यादा श्वेत भी है, क्योंकि वहां बहुत ज्यादा बर्फ है। इस मुख में सबसे ज्यादा तीव्रता है, सबसे ज्यादा ओज है, लेकिन बहुत ही कम लोग ऐसे हैं, जो कैलाश के दक्षिणी मुख की ओर जा सकते हैं। यह बहुत ही दुर्गम है और वहां पहुंचना कम लोगों के लिए संभव है, क्योंकि इसका मार्ग अन्य मुखों की तुलना में बहुत ज्यादा कठिन है। लेकिन रावण यहीं से गया। कल्पना कीजिए कि वह कितनी कठिनाई से इस रास्ते से ऊपर की ओर आगे बढ़ा होगा। मजे की बात यह है कि वह बीच में नहीं रुका। उसने वहां पहुंचने की कोशिश की, जहां शिव थे। भगवान की जगह लेने की कल्पना कोई अहंकारी भक्त ही कर सकता है। आप रावण की भक्ति में भी अहंकार देख सकते हैं।

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