समाज को रास्ता नहीं दिखा पा रही है रामकथा

By Independent Mail | Last Updated: Jan 10 2019 4:06PM
समाज को रास्ता नहीं दिखा पा रही है रामकथा

लगभग प्रत्येक भारतीय भाषा ने राम की कथा कहने वाली रामायण से कुछ न कुछ प्रेरणा ग्रहण की है और यही कारण है कि राम देश के जनमानस में गहरे रचे-बसे हैैं। राम कथा लोगों को इतना मुग्ध करती है कि वे उनकी महिमा का बार-बार बखान सुनने को लालायित रहते हैैं। राम ने अपना सारा जीवन आदर्श स्थापित करने में खपा दिया। उन्होंने जीवन में जो कुछ किया, अपने लिए नहीं, औरों के लिए किया। अपने इसी गुण के कारण वह मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। उनका जीवन आज भी लोगों को सम्मोहित करता है, तो इसीलिए कि हर कोई अपने आस-पास आदर्शों की स्थापना होते देखना चाहता है। यह चाहत ही भगवान राम की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण है और भारत आज भी राममय है। राम कथा केवल भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी लोकप्रिय है। इंडोनेशिया में रामकियेन व रामयत, जावा में रामायण काकाविन, बाली में रामायण, मलेशिया में हिकायत सेरीनाम के नाम से राम कथा प्रचलित है। अरब से लेकर यूरोप तक के साहित्य में राम कथा का कोई न कोई रूप मिलता है। मिशनरी जे. फेनिचियो ने वर्ष 1609 में लिब्रो डा सैटा नाम से राम कथा का अनुवाद किया था। ए. रोजेरियस ने 'द ओपेन रोरे' नाम से डच में राम कथा अनूदित की। जेवी टावर्निये ने 1676 में फ्रेंच में राम कथा का अनुवाद किया था। वानश्लेगेन ने 1829 में रामायण का लैटिन में अनुवाद किया था। 1840 में सिंगनर गोरेसिउ ने इटैलियन में राम कथा का अनुवाद किया। विलियम केटी ने 1806 में यही काम अंग्रेजी में शुरू किया था जिसे बाद में मार्शमैन, ग्रिफिथ, व्हीलर ने पूरा किया। रूसी विद्वान वारान्निकोव ने बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में रामचरितमानस का रूसी भाषा में अनुवाद किया था। बेल्जियम में जन्मे फादर कामिल बुल्के ने तो भारत आकर रामकथा पर शोध भी किया।

जनमानस में राम कथा क्यों रची-बसी है? इसलिए कि राम का चरित्र आदर्श पुत्र, शिष्य, भाई, आदर्श मित्र, आदर्श वीर और राजा के रूप में सभी को आकर्षित करता है। राम एक ऐसे व्यक्तित्व हैं, जो सहज भी हैं और विराट भी। इसीलिए उनकी कथा सदियों से हमें प्रभावित करती चली आ रही है। केवल तुलसी कृत रामचरितमानस की बात करें तो उसके जितने संस्करण छपे हैं, जितनी टीकाएं लिखी गई हैं, उतनी किसी अन्य काव्यकृति पर नहीं। तुलसी ने रामचरितमानस को समय के साथ ऐसा जोड़ा कि वह हमेशा प्रासंगिक बना रहा। जब मानस इतनी बड़ी आबादी पर प्रभाव पैदा करता है, तो उसका उपयोग सामाजिक परिवर्तन के लिए क्यों नहीं किया जाता? यह विचार सबसे पहले राममनोहर लोहिया के मन में आया था। जयप्रकाश नारायण ने भी तुलसी काव्य के महत्व को समझा था और सात जनवरी, 1974 को काशी हिंदू विश्वविद्यालय में कहा था, मानस नए सिरे से इतिहास लेखन का प्रयास है। यदि हम कहते हैं कि तुलसी अकबर के जमाने में हुए, तो गलत है। हमें कहना होगा कि तुलसी के जमाने में अकबर हुए यानी, हरि अनंत हरिकथा अनंता...।

कृपाशंकर चौबे

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