अपने साथ समाधान लेकर भी आती हैं समस्याएं

By Independent Mail | Last Updated: Nov 27 2018 11:38PM
अपने साथ समाधान लेकर भी आती हैं समस्याएं

तथागत अक्सर अपने शिष्यों को शिक्षा प्रदान किया करते थे। अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए वह कहानियों और उदाहरणों का सहारा भी लेते थे। एक दिन बहुत से भिक्षु उनका प्रवचन सुनने के लिए बैठे थे। बुद्ध समय पर सभा में पहुंचे लेकिन आज शिष्य उन्हें देखकर चकित रह गये क्योंकि आज पहली बार वह अपने हाथ में कुछ लेकर आये थे। करीब आने पर शिष्यों ने देखा कि उनके हाथ में एक रस्सी है। बुद्ध ने आसन ग्रहण किया और बिना किसी से कुछ कहे वह रस्सी में गांठ बांधने लगे। सभा में उपस्थित भिक्षु बुद्ध को गांठें लगाते देखकर सोच रहे थे कि वह आगे क्या करेंगे? तभी तथागत ने सभी से एक प्रश्न किया, मैंने इस रस्सी में तीन गांठें लगा दी हैं। अब मैं आपसे यह जानना चाहता हूं कि क्या यह वही रस्सी है जो गांठें लगने से पूर्व थी? एक शिष्य ने कहा, तथागत! इसका उत्तर देना थोड़ा कठिन है, यह वास्तव में हमारे देखने के तरीके पर निर्भर करेगा। एक दृष्टिकोण से देखें, तो रस्सी वही है, इसमें कोई बदलाव नहीं आया है। दूसरी तरह से देखें, तो अब इसमें तीन गांठें लगी हुई हैं जो पहले नहीं थीं, अत: इसे बदला हुआ कह सकते हैं लेकिन यह बात भी ध्यान देने वाली है कि बाहर से देखने में भले ही रस्सी बदली हुई प्रतीत हो रही है।

हालांकि, अंदर से तो यह वही है जो पहले थी। इसका बुनियादी स्वरूप अपरिवर्तित है। बुद्ध ने कहा, आपकी बात सत्य है। अब मैं गांठों को खोल देता हूं। यह कहकर बुद्ध रस्सी के दोनों सिरों को एक-दूसरे से दूर खींचने लगे। उन्होंने पूछा, तुम्हें क्या लगता है, इस प्रकार इसे खींचने से क्या मैं इन गांठों को खोल सकता हूं? नहीं-नहीं, ऐसा करने से तो गांठें और भी कस जाएंगी और इन्हें खोलना और मुश्किल हो जाएगा, एक शिष्य ने शीघ्रता से उत्तर दिया। बुद्ध ने कहा, ठीक है, अब एक आखिरी प्रश्न। यह बताओ कि इन गांठों को खोलने के लिए हमें क्या करना होगा? शिष्य बोला, इसके लिए हमें इन गांठों को गौर से देखना होगा, ताकि हम जान सकें कि इन्हें कैसे लगाया गया था और फिर इन्हें खोला जा सकता है। बुद्ध ने कहा, मैं यही तो सुनना चाहता था। मूल प्रश्न यही है कि जिस समस्या में तुम फंसे हो, उसका कारण क्या है, यह जाने बिना समस्या का निवारण असंभव है, जबकि लोग बिना कारण जाने ही निवारण करना चाहते हैं। कोई मुझसे यह नहीं पूछता कि मुझे क्रोध क्यों आता है। लोग पूछते हैं कि मैं अपने क्रोध का अंत कैसे करूं? कोई यह प्रश्न नहीं करता कि मेरे अंदर अंहकार का बीज कहां से आया। लोग पूछते हैं कि मैं अपना अहंकार कैसे खत्म करूं? जिस प्रकार रस्सी में गांठें लग जाने पर भी उसका बुनियादी स्वरूप नहीं बदलता, उसी प्रकार मनुष्य में भी कुछ विकार आ जाने पर उसके अंदर के अच्छाई के बीज खत्म नहीं होते। जैसे हम रस्सी की गांठें खोल सकते हैं, वैसे ही हम अपनी समस्याएं भी हल कर सकते हैं। जीवन है तो समस्याएं भी होंगी ही और समस्याएं हैं, तो समाधान भी अवश्य होगा। हर समस्या में उसका समाधान भी छिपा होता है।

भंते ज्ञानदीप

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