जिसका आत्मविश्वास मजबूत है, उसे कोई नहीं हरा सकता

By Independent Mail | Last Updated: Nov 8 2018 7:36PM
जिसका आत्मविश्वास मजबूत है, उसे कोई नहीं हरा सकता

घटना है, वर्ष 1960 की है। स्थान था यूरोप का भव्य ऐतिहासिक नगर तथा इटली की राजधानी रोम। सारे विश्व की निगाहें 20 अगस्त से 11 सितंबर तक होने वाले ओलंपिक खेलों पर टिकी हुई थीं। इन्हीं ओलंपिक खेलों में एक बीस वर्षीय अश्वेत बालिका भी भाग ले रही थी। वह इतनी तेज दौड़ी, इतनी तेज दौड़ी कि 1960 के ओलंपिक मुकाबलों में तीन स्वर्ण पदक जीत कर दुनिया की सबसे तेज धाविका बन गई। उसकी इस जीत की दुनिया भर में चर्चा हुई। जिसने उसकी उपलब्धि के बारे में सुना, उसी ने उस बालिका को सराहा।

जबकि इससे पहले तो रोम ओलंपिक में लोग 83 देशों के 5346 खिलाड़ियों में इस बीस वर्षीय बालिका का असाधारण पराक्रम देखने के लिए इसलिए उत्सुक नहीं थे कि विल्मा रुडोल्फ नाम की यह बालिका अश्वेत थी। यह वह बालिका थी जिसे चार वर्ष की आयु में डबल निमोनिया और काला बुखार होने से पोलियो हो गया और फलस्वरूप उसे पैरों में ब्रेस पहननी पड़ी। इसीलिए सभी लोग यही मानकर चल रहे थे कि वह कुछ नहीं कर पाएगी। एक पोलियो ग्रस्त रही लड़की भला कैसे दौड़ेगी? बताना जरूरी है कि विल्मा रुडोल्फ ग्यारह वर्ष की उम्र तक चल-फिर भी नहीं सकती थी, लेकिन उसने एक सपना पाल रखा था कि उसे दुनिया की सबसे तेज धाविका बनना है। उस सपने को यथार्थ में परिवर्तित होते देखने के लिए वह मानसिक तौर पर तैयार थी, लेकिन उसे किसी का भी सहयोग नहीं मिल रहा था। लेकिन कहते ही हैं कि संकल्पवान हमेशा जीतता है, वह कभी पस्त नहीं पड़ता।

डॉक्टर के मना करने के बावजूद विल्मा रुडोल्फ ने अपने पैरों की ब्रेस उतार फेंकी और स्वयं को मानसिक रूप से तैयार कर अभ्यास में जुट गई। अपने सपने को मन में प्रगाढ़ किए हुए वह निरंतर अभ्यास करती रही। उसने अपने आत्मविश्वास को इतना ऊंचा कर लिया कि असंभव-सी बात पूरी कर दिखा दी। उसने एक साथ तीन स्वर्ण पदक हासिल कर दिखाए। यदि व्यक्ति में पूर्ण आत्मविश्वास है, तो शारीरिक विकलांगता भी उसकी राह में बाधा नहीं बन सकती। सफलता उन्हें ही मिलती है, जो अपने आत्मविश्वास को मजबूत करते हैं। ऐसे लोगों को कोई विचलित नहीं कर पाता। जब हम अपने रास्ते से विचलित नहीं होते, तो लक्ष्य को प्राप्त कर लेते हैं। आचार्य चाणक्य ने भी अपनी नीति में कहा है कि सभी इंसानों को अपना आत्मविश्वास मजबूत रखना चाहिए। जब विषय परिस्थितियों में हमारा आत्मविश्वास डगमगा जाता है, तो हम कमजोर पड़ जाते हैं। अगर विषम परिस्थिति को देखकर हम अपना आत्मविश्वास कायम रख सकें, तो जीत हमारी ही होगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन समस्या यह है कि हम में से ज्यादातर लोग अपना आत्मविश्वास खो देते हैं। संकट आते ही हम घबरा जाते हैं, इसलिए सामने आई मुसीबत थोड़ी और विकराल हो जाती है। ऐसे में विल्मा रुडोल्फ का हौसला हमारे लिए प्रेरणास्रोत बन सकता है। यह घटना है तो बहुत पुरानी, लेकिन अाज भी हमें प्रेरणा देती है। हमें संकट देखकर हतोत्साहित न होने की सीख देती है। अगर हम यह शिक्षा ले सके तो जीत भी हमारी होगी।

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