आधुनिक दौर में बहुत कुछ बदल गया

By Independent Mail | Last Updated: Feb 10 2019 10:08PM
आधुनिक दौर में बहुत कुछ बदल गया

एक शादी के सिलसिले में गांव जाना हुआ। पता चला कि वहां औरतों के बीच टीवी पर आने वाले धारावाहिक बेहद लोकप्रिय हैं। एक बदलाव यह महसूस हुआ कि अब वहां औरतों की वैसी बैठकें नहीं होतीं, जिन्हें पहले अक्सर महिला पंचायत कहा जाता था। शहरों में यही काम मोहल्लों में होता था, खासकर सर्दियों में धूप सेंकने के नाम पर। अब शहरों की तरह ही गांवों की महिलाएं भी खूब टीवी देखती हैं। बदलाव सिर्फ महिलाओं की दिनचर्या में ही नहीं आया, हमारे परिवारों में और भी बहुत कुछ है, जो बदल गया है। इस दौर में एक तो संयुक्त परिवार बहुत कम रह गए हैं और दूसरे वक्त ने दादी-नानी की भूमिका को भी बदल दिया है। पहले छोटी उम्र में शादियां हो जाती थीं। पचास की उम्र तक आते-आते औरतें सास और दादी-नानी बन जाती थीं। तब उनका काम घर में रहने वाली बहुओं के कामों की निगरानी करना और उनके बच्चों को बहलाना होता था। रात को दादी के इर्द-गिर्द ही बच्चे रहते थे। वह उन्हें तरह-तरह की कहानियां सुनाकर सुलाती थीं। ये कहानियां उन्हें अपनी विरासत से मिली होती थीं। आज परिवार के विभाजित हो जाने के कारण ज्यादातर परिवारों में ऐसा माहौल नहीं रह गया। बहुत सी महिलाएं, यहां तक कि दादी-नानी भी पढ़ी-लिखी हैं। अब इन महिलाओं का एकमात्र लक्ष्य पहले की दादी-नानियों की तरह अपनी अगली पीढ़ी को पालना नहीं है। इसीलिए किस्से-कहानी सुनाने की परंपरा न केवल हमारे बच्चों, बल्कि हम सबके जीवन से गायब होती जा रही है। आजकल अधिकांश शहरी परिवारों में जोड़े माता-पिता से अलग रहते हैं। संयुक्त परिवार अब उस तरह से नहीं रहे, जहां कई पीढ़ियां एक साथ रहती थीं। जो परिवार साथ भी रहते हैं, वहां दादी-नानी की उम्र की महिलाओं की दुनिया अब सिर्फ नाती-पोतों तक सीमित नहीं है। नाती-पोते भी वे नहीं रहे, जिन्हें रात के कहानियां सुनने की आदत थी। यह स्मार्ट बच्चाें का दाैर है। जिस मात्रा में कहानियां हमारे परिवार से दूर होती जा रही हैं, उसी अनुपात में स्टोरी टेलिंग सेशन बढ़ते जा रहे हैं। अक्सर बच्चों से संबंधित कार्यक्रमों, स्कूलों में ये सेशन आयोजित किए जाते हैं। वहां एक से एक पेशेवर कहानी सुनाने वाले आते हैं। वे सुलाने के लिए कहानियां नहीं सुनाते, बल्कि बाकायदा पूरे एक्शन के साथ कहानियां सुनाते हैं। दादी-नानी की भूमिका में अब पैसे लेकर कहानी सुनाने वाले मौजूद हैं। इसके लिए दास्तानगोई जैसी पुरानी रवायतों को फिर से जीवित किया गया है। हालांकि, ये कहानी सुनाने वाले भी कई बार बच्चों को पसंद नहीं आते और वे बोर-बोर चिल्लाते हैं। इसका कारण वही है कि बच्चों को संगीत और एक्शन से भरी कहानियां अब तमाम तरह की तकनीक ने उपलब्ध करा दी हैं। वे उन्हें देखना पसंद करने लगे हैं। देखने और सुनने में यही फर्क भी है। अब बच्चों की पसंद दादी का बिस्तर नहीं, यू-ट्यूब है। इसके साथ बहुत सारे खतरे हैं। लेकिन समाज बदल रहा है। बदलाव ही सच है, लेकिन इसमें हम अपना बहुत कुछ खो भी रहे हैं।

  • साहित्यकार क्षमा शर्मा के ब्लॉग से...
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