खराब से खराब इंसान को भी बदल देता है अपनापन और प्रेम

By Independent Mail | Last Updated: Sep 2 2019 1:20AM
खराब से खराब इंसान को भी बदल देता है अपनापन और प्रेम
हमारी एक खास आदत होती है। हम अपनों के दोष छिपाते हैं, जबकि उनके गुणों पर खास तौर पर ध्यान देते हैं, उनका बखान करते हैं। कोई भी पिता अपने प्यारे पुत्र, प्यारी पुत्री के दोषों को प्रकट नहीं करता। माता भी यही करती है और दादा-दादी, नाना, नानी भी। ये सब तो उनकी प्रशंसा के पुल ही बांधते रहते हैं। अपने दुर्गुणी बालक को न तो कोई मार डालता है और न ही जेल पहुंचा देता है। वह यही प्रयास करता है कि किसी उपाय से उसके दुर्गुण अगर दूर न हों, तो कम तो हो ही जाएं। अगर यह कोशिश जारी रखी जाए, तो हम निश्चित ही कामयाब हो जाएंगे।
प्रेम एक ऐसा गोंद है, जो टूटे हुए हृदय को जोड़ता है, बिछुड़ों को मिलाता है। प्रेम-पूर्ण व्यवहार बिगड़े हुए आदमी को सुधार सकता है। यदि किसी के साथ हमारा आत्मभाव सच्चा है और नि:स्वार्थ भाव से हम उसके साथ अपनेपन की भावना रखते हैं, तो सच मानिए कि वह हमारा गुलाम बन जाएगा। किसी की एक बुराई देखकर उस पर आग बबूला हो जाना, उसको सभी बुराइयों की जड़ मान लेना ठीक नहीं है। यदि हम ध्यान से देखेंगे, तो मालूम होगा कि हर व्यक्ति में तमाम बुराइयों के साथ कुछ अच्छाइयां भी होती ही हैं। हमारा अपनेपन का दायरा अगर बड़ा है, तो हम उसकी अच्छाइयों को नजरअंदाज नहीं कर पाएंगे। आत्मोन्नति यही तो है कि अपनेपन के दायरे को छोटे से बड़ा बनाया जाए।
जिनका अपनापन केवल अपने शरीर तक ही सीमित है, वे कीट, पतंगों जैसी निम्न श्रेणी के होते हैं। जो अपनी संतान तक अपने आत्मभाव को बढ़ाते हैं, वे पशु-पक्षी से कुछ ऊंचे हैं। जिनका अपनापन कुटुम्ब तक सीमित है, वे असुर श्रेणी के हैं। जिनका अपनापन अपने राष्ट्र तक है, वे मनुष्य हैं। जो समस्त मानव जाति को अपनेपन से ओत-प्रोत देखते हैं, वे देवता हैं। जिनकी आत्मीयता चर-अचर तक फैली है, वे जीवनमुक्त परमसिद्ध हैं। जो आत्मभाव का जितना विस्तार करता है, अधिक लोगों को अपना समझता है, दूसरों की सेवा-सहायता करता है, उनके सुख-दु:ख में अपना सुख-दु:ख मानता है, वह ईश्वर के उतने ही निकट होता है।
आत्म-विस्तार और ईश्वर की आराधना एक ही क्रिया के दो नाम हैं। एक उदार व्यक्ति पड़ोसी के बच्चों को खिलाकर बिना खर्च के उतना ही आनन्द प्राप्त कर लेता है, जितना बहुत खर्च और कष्ट के साथ अपने बालकों को खिलाने के बाद प्राप्त कर पाता है। अपने हंसते हुए बालकों को देखकर हमारी छाती गुदगुदाने लगती है, पड़ोसी के उससे भी सुन्दर फूल से हंसते हुए बालक को देखकर हमारे दिल की कली नहीं खिलती है? इसका कारण यह है कि हम खुद अपने हाथों अपनी एक निजी दुनिया बसाना चाहते हैं। उसी से संबंध रखना चाहते हैं, उसकी ही उन्नति देखकर प्रसन्न होना चाहते हैं।
  • आचार्य श्रीराम शर्मा 
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