छीनने में नहीं, देने में है खुशी

By Independent Mail | Last Updated: Feb 21 2019 8:17PM
छीनने में नहीं, देने में है खुशी

राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न बचपन में जब खेलते थे, तो लक्ष्मण राम की साइड उनके पीछे होते थे। सामने वाले पाले में भरत शत्रुघ्न होते थे, तब लक्ष्मण हमेशा भरत से बोलते, राम भैया सबसे ज्यादा मुझे प्यार करते हैं, तभी वह हर बार अपने पाले में अपने साथ मुझे रखते हैं। उधर, भरत कहते नहीं, राम भैया सबसे ज्यादा मुझे प्यार करते हैं, तभी वह मुझे सामने वाले पाले में रखते हैं, ताकि हर पल उनकी नजरें मेरे ऊपर रहें। वह मुझे हर पल देख पाएं, क्योंकि साथ वाले को देखने के लिए तो उनको मुड़ना पड़ेगा। फिर जब भरत गेंद को राम की तरफ उछालते, तो राम जान-बूझकर गेंद को छोड़ देते और हार जाते, फिर पूरे नगर में उपहार और मिठाइयां बांटते खुशी मनाते। सब पूछते कि राम जी, आप तो हार गए, फिर आप खुश क्यों हैं। राम बोलते मेरा भरत जीत गया। फिर लोग सोचते, जब हारने वाला इतना कुछ बांट रहा है, तो जीतने वाला भाई तो पता नहीं क्या-क्या देगा? लोग भरत जी के पास जाते हैं, लेकिन भरत तो रो रहे हैं। लोगों ने पूछा, भरत जी, आप तो जीत गए हैं, फिर आप क्यों रो रहे हैं? भरत बोले देखिये, मेरी कैसी विडंबना है, मैं जब भी अपने प्रभु के सामने होता हूं, तभी जीत जाता हूं। मैं उनसे जीतना नहीं, मैं उनसे हारना चाहता हूं।

मैं खुद को हार कर उनको जीतना चाहता हूं। इसलिए कहते हैं, भक्त का कल्याण भगवान को अपना सब कुछ समर्पित करने में है। सब कुछ समर्पित करके ही हम भगवान को पा सकते हैं। एक भाई दूसरे भाई को जिताकर खुश है। दूसरा भाई अपने भाई से जीतकर दुखी है। इसलिए कहते हैं, खुशी लेने में नहीं देने में है। जब एक भाई ने दूसरे भाई के लिए अपना हक छोड़ा, तो रामायण लिखी गई और जब एक भाई ने दूसरे भाई का हक मारा, तो महाभारत हुई। जिस घर में भाई-भाई मिल कर रहते हैं, भाई एक दूसरे का हक नहीं छीनते, उसी घर में राम का वास है। जहां बड़ों की इज्जत है, बड़ों की आज्ञा का पालन होता है, वहीं राम हैं। इसलिए असली खुशी देने में है, छीनने में नहीं। हमें कभी किसी का हक नहीं छीनना चाहिए, न ही झूठ और बेईमानी का सहारा लेना चाहिए। हम जो भी काम करें, उसमे सत्य निष्ठा हो। यही सच्चा जीवन है।

स्वामी सदासुख दास

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