गुरु की कृपा के बिना परमात्मा से मिलन असंभव

By Independent Mail | Last Updated: Feb 27 2019 9:19PM
गुरु की कृपा के बिना परमात्मा से मिलन असंभव

जब से यह दुनिया बनी, तब से इंसान इस सवाल को हल करने में लगा हुआ है कि मैं कौन हूं? यह दुनिया कैसे बनी? इसे बनाने वाला कौन है? अनेक संत-महात्मा इस संसार में आए और उन्होंने इंसान को इस आत्म-ज्ञान से रूबरू कराया। आत्म-ज्ञान वह है, जो इस सवाल को हल करे कि आत्मा क्या है और उसका परमात्मा से क्या संबंध है? जिसका अनुभव हम केवल अपने अंतर में जाकर ही कर सकते हैं। सभी संत-महात्माओं ने इसे पराविद्या कहा है। इसके अलावा और जितने भी बाहरी साधन है, जैसे- जप-तप, पूजा-पाठ, हवन-दान और तीर्थ यात्रा आदि को अपराविद्या कहा गया है। इन सभी का संबंध सिर्फ हमारे शरीर के साथ है, न कि आत्मा के साथ। पूर्ण संतों की नजर में दूसरे विज्ञानों की तरह पराविद्या भी एक व्यावहारिक विज्ञान है, जिसका आंतरिक अनुभव केवल पूर्ण गुरु की शरण में जाकर ही मिल सकता है। इंसान ने बड़ी तरक्की की है। लेकिन आत्मा, जो शरीर और मन दोनों को चलाने वाली ताकत है, के बारे में हम कुछ भी नहीं जानते। आत्म-विश्लेषण या मन व इंद्रियों से ऊपर उठकर आत्मा के वास्तविक स्वरूप का दर्शन करना ही आत्मा का अनुभव करना है। लेकिन उस परमात्मा को, जिसने इस सृष्टि की रचना की है, क्या हम देख सकते हैं? क्या हम उससे बातें कर सकते हैं? इन सभी प्रश्नों के उत्तर हमें पूर्ण गुरु देते हैं। वे हमें बताते हैं कि हां, हम उस परम-सत्ता को देख भी सकते हैं और उससे बातें भी कर सकते हैं, यदि हम उतने ही ऊंचे उठ जाएं, जितना परमात्मा खुद है तो। यह कोई अचरज की बात नहीं, बल्कि कुदरत के नियमों के अनुसार है। उसी ने हमें परमात्मा के बराबर होने की ताकत प्रदान की है। संतों के मुताबिक किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कुदरत का एक कानून होता है, एक उसूल होता है तथा साथ में एक विधि होती है, जिससे हम अपनी कोशिशों के नतीजों की जांच कर सकते हैं, उन्हें परख सकते हैं। यही बात रूहानियत के क्षेत्र में भी लागू होती है। अगर ध्यान से सभी धर्मग्रंथों का अध्ययन किया जाए, तो सभी धर्मों में एक ही बात का जिक्र होता है, लेकिन धर्मग्रंथों को केवल पढ़ लेना और कथा-कीर्तन कर लेना ही काफी नहीं है। हमें भी वहां तक पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए, जहां तक वह महापुरुष पहुंचे, जिन्होंने अपने अनुभव धर्मग्रंथों में लिखे हैं। जो एक इंसान कर सकता है, वह दूसरा भी कर सकता है, अगर उसे उचित मदद व मार्गदर्शन प्राप्त हो तो। सही मायनों में सच्चा इंसान बनने के लिए एक पूर्ण गुरु का सत्संग कर समझना होगा कि वह शरीर नहीं, बल्कि इसमें बसती हुई एक आत्मा है, जो परमात्मा का अंश है और वह आत्मा ही इस शरीर को चला रही है। लेकिन इस माया की दुनिया में आकर हम अपने मूल स्वरूप, जो आत्मिक है, को भूल बैठे हैं। जब हम एक पूर्ण गुरु की शरण में पहुंच कर उनसे दीक्षा लेते हैं, तो वह हमें सिर्फ इसका बौद्धिक ज्ञान ही नहीं, इसका आंतरिक तजुर्बा भी देते हैं। इससे मैं कौन हूं और कहां से आया हूं, जैसे प्रश्नों का उत्तर हमें बड़ी आसानी से मिल जाता है। हम इस जन्म-मरण के चक्र और आवागमन से मुक्त हो जाते हैं।

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