हर उपलब्धि के लिए उसका मूल्य चुकाना पड़ता है...

By Independent Mail | Last Updated: May 11 2019 8:20AM
हर उपलब्धि के लिए उसका मूल्य चुकाना पड़ता है...

बाजार में विभिन्न तरह की वस्तुएं दुकानों में सजी होती हैं, पर उन्हें कोई मुफ्त में कहां प्राप्त कर पाता है? अनुनय विनय करने वाले तो भीख जैसी नगण्य उपलब्धि ही करतलगत कर पाते हैं। पात्रता के आधार पर ही शिक्षा, नौकरी, व्यवसाय आदि क्षेत्रों में भी विभिन्न स्तर की भौतिक उपलब्धियां हस्तगत करते सर्वत्र देखा जा सकता है। अध्यात्म क्षेत्र में भी यही सिद्धांत लागू होता है। भौतिक क्षेत्र की तुलना में अध्यात्म के प्रतिफल कई गुना अधिक महत्त्वपूर्ण, सामर्यवान और चमत्कारी हैं। किन्हीं-किन्हीं महापुरुषों को देख एवं सुनकर हर व्यक्ति के मुंह में पानी भर आता है और उन्हें प्राप्त करने के लिए मन ललचाता है, पर अभीष्ट स्तर का आध्यात्मिक पुरुषार्थ न कर पाने के कारण उस ललक की आपूर्ति नहीं हो पाती। पात्रता के अभाव में अधिकांश को दिव्य आध्यात्मिक विभूतियों से वंचित रह जाना पड़ता है, जबकि पात्रता विकसित हो जाने पर बिना मांगे ही वे साधक पर बरसती हैं। उन्हें किसी प्रकार का अनुनय विनय नहीं करना पड़ता है। दैवी शक्तियां परीक्षा तो लेती हैं, पर पात्रता की कसौटी पर खरा सिद्ध होने वालों को मुक्तहस्त से अनुदान भी देती हैं। यह सच है कि अध्यात्म का, साधना का चरम लक्ष्य सिद्धियां-चमत्कारों की प्राप्ति नहीं है, पर जिस प्रकार अध्यवसाय में लगे छात्र को डिग्री की उपलब्धि के साथ-साथ बुद्धि की प्रखरता का अतिरिक्त अनुदान सहज ही मिलता रहता है, उसी तरह आत्मोत्कर्ष की प्रचंड साधना में लगे साधकों को उन विभूतियों का भी अतिरिक्त अनुदान मिलता रहता है, जिसे लोक-व्यवहार की भाषा में सिद्धि एवं चमत्कार के रूप में जाना जाता है। पर चमत्कारी होते हुए भी ये प्रकाश की छाया जैसी ही हैं। प्रकाश की ओर चलने पर छाया पीछे-पीछे अनुगमन करती है। अगर किसी को जीवन में महान बनना है तो उसके लिए उसे बड़ी से बड़ी कठिनाई का सामना भी करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। साथ ही महान बनने के बाद उस महानता को उसे हजम करने की कला भी आना चाहिए, क्योंकि जिसके जो व्यक्ति अपने आपको जितना महान समझता है उसके शत्रु भी उतने ही अधिक होते हैं। महानता का भाव एक प्रकार का मानसिक रोग है। जो व्यक्ति अपने आपको महान समझता है वह अंतर्मन से असंतुष्ट रहता है। उसके मन में भारी अंतर्द्वंद्व होता रहता है। वह बड़े-बड़े काम का आयोजन करता है। उसके सभी काम असामान्य होते हैं। वह संसार को ही गलत मार्ग पर चलते हुए देखता है और उसके सुधार करने की धुन में लग जाता है। जीवन को बहुत ही संभल कर सावधानी पूर्वक जीना चाहिए, जिससे आने वाली कठिनाइयों का अंत वह विवेक पूर्ण तरीके से कर सके।

  • श्रीराम आचार्य  
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