किताबों से दूर होती युवा पीढ़ी

By Independent Mail | Last Updated: Nov 5 2018 10:05PM
किताबों से दूर होती युवा पीढ़ी

पुस्तकों को समय का सबसे अच्छा दस्तावेज माना जाता है, लेकिन वे कोई जड़ दस्तावेज नहीं होतीं। हमेशा से वे समय के साथ बदलती रही हैं। एक जमाना ताड़पत्रों और ताम्रपत्रों की किताबों का था। फिर आया कागज का जमाना, तो ये बंधन काफी कुछ टूट गए। अब किसी भी आकार-प्रकार और मोटाई की किताब छापना संभव हो गया था, पर ऐसा नहीं है कि हर आकार की किताबें बाजार में आ गईं। किताबों के आकार के कुछ मानक बने। जैसे स्क्वॉयर, डिमाई, डाइजेस्ट वगैरह। हर जरूरत के लिए एक अलग आकार बना। विश्वकोश के लिए अलग मानक था, शब्दकोश के लिए अलग, तो कविता की किताब के लिए अलग। याद कीजिए उस रामायण का आकार, जिसे आपकी दादी मां पढ़ती थीं और उस किताब का आकार, जिससे आपने कक्षा आठ के गणित के सबक सीखे थे। दोनों के ही आकर अलग थे। हर आकार की किताब बनाना संभव था, लेकिन हर आकर की किताबें बाजार में आईं नहीं। इसलिए कि इनका आकार बहुत कुछ छापने की मशीनों से तय होने लगा और बहुत कुछ इससे कि किस आकार की किताब छापना सस्ता पड़ेगा। यानी यह आकार बाजार की जरूरत से तय हुआ। जब काम और जरूरतों के लिहाज से लोगों का आवागमन बढ़ा, तो पॉकेट बुक्स का चलन बढ़ गया, यानी ऐसी किताबें, जो आसानी से कोट की जेब में रखी जा सकें। 21वीं सदी में ये किताबें एक बार फिर अपना आकार बदल रही हैं। अब यह स्मार्टफोन पर उपलब्ध हैं। इससे किताब उद्योग चिंतित है। प्रकाशकों ने इसका मुकाबला करने के लिए दो तरह की रणनीति अपनानी शुरू की है। एक तो उन्होंने ऐसी किताबें प्रकाशित करनी शुरू कर दी हैं, जो स्मार्टफोन पर ही पढ़ी जा सकें। हालांकि, अभी इन किताबों का चलन इतना भी नहीं बढ़ा कि इस दौर को स्मार्टफोन बुक्स का युग घोषित किया जा सके। इस बीच कागज की किताबों के नए प्रयोग शुरू हो गए हैं। अब बहुत छोटे आकार की किताबें छापने की तैयारी है। लगभग उसी आकार की, जिस आकर का स्मार्टफोन होता है। माना जा रहा है कि यह नई पीढ़ी का सर्वस्वीकृत आकार है। इस आकार की किताबें उसमें ज्यादा लोकप्रिय हो सकती हैं। चुनौती सिर्फ आकार की नहीं है। चुनौती यह है कि स्मार्टफोन में रम गई पीढ़ी के हाथों में किताबें कैसे पहुंचें? क्या छोटे आकार की किताबें उसे मोबाइल की दुनिया से विमुख कर सकेंगी? कुछ तो करना होगा कि किताबें युवाओं की पसंद बनें।

लेखिका डॉ. मोनिका शर्मा के ब्लॉग से...

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