गांधी को अपनाकर ही बच पाएगी दुनिया

By Independent Mail | Last Updated: Mar 11 2019 7:58PM
गांधी को अपनाकर ही बच पाएगी दुनिया

प्रो. सतीश कुमार

दुनिया आज बुरी तरह से लहूलुहान है। हर दिन लोग बमों से मारे जा रहे हैं। एशिया ज्यादा ही संकट में है। मध्य-पूर्व में सीरिया की समस्या, तो दक्षिण एशिया में पाकिस्तान की दहशतगर्दी जग जाहिर है। यह वही पाकिस्तान है, जिसकी आर्थिक मदद के लिए गांधी ने सत्याग्रह किया था कि बंटवारे के बाद उसे पैसे दिए जाएं, जिसे लेकर कांग्रेस के बड़े नेता नाराज हुए थे। साल 1947 में दिल्ली में एशियाई कॉन्फ्रेंस बुलाई गई थी। उसमें एक ऐसी दुनिया बनाने का सपना देखा गया था, जो एशिया के मूल्यों पर टिकी हो। लेकिन एशिया में भी शांति नहीं आ पाई। चीन पूरी तरह से अमेरिका और अन्य औपनिवेशिक यूरोपीय देशों की तरह आक्रामक है। अफ्रीका से लेकर लैटिन अमेरिका और एशिया के तमाम देश चीन के मकड़जाल में फंसते जा रहे हैं। आज गांधी होते, तो वे बहुत दुखी होते। यूरोप और अमेरिका के विभिन्न विश्वविद्यालयों में गांधी के जिन विचारों को पढ़ाया जाता है, उनकी रूपरेखा एक शांतिपूर्ण विश्व की परिकल्पना है, जहां समस्याओं का निपटारा हिंसा से नहीं, बल्कि बातचीत से किया जाएगा। दुनिया नियमों पर चले और शत्रुता समाप्त हो। लेकिन हुआ ठीक गांधी के विचारों के विपरीत। आज दुनिया के हर कोने में हिंसा है। कभी उत्तर कोरिया परमाणु हथियारों की धमकी देता है, तो कभी पाकिस्तान। चीन भी बाज नहीं आता। चीन ने तो परमाणु कचरे का ढेर इकट्ठा कर एशिया के सारे देशों को खतरे में डाल दिया है। तिब्बत का पहाड़ पीने के पानी का सबसे बड़ा स्रोत है, वहीं चीन ने परमाणु कूड़ा इकट्ठा किया है।

आज विश्व व्यवस्था की रूपरेखा जिन सिद्धांतों पर चलती है, पहले भी चलती थी, उसका मुख्य प्रेरक तत्व शक्ति-सिद्धांत था, अर्थात जिसकी लाठी उसकी भैंस। अमेरिका जब प्रथम विश्व युद्ध के बाद शक्तिशाली बना, तो उसने दुनिया को अपने ढंग से हांकने की कोशिश की। जिन देशों ने प्रतिरोध किया, वहां की सत्ता को जबरन बदल दिया गया। लोकतंत्र और मानवाधिकार के नाम पर घोर अत्याचार शुरू हुआ। अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं को कठपुतली बना दिया गया। किसी देश में कूवत नहीं थी कि अमेरिका का विरोध करे। शीत युद्ध के बाद तो अमेरिका रॉबिनहुड की शक्ल में आ गया। इससे दुनिया दो भागों में बंटी दिखने लगी, एक अमेरिका की पक्षधर और दूसरी अमेरिका की विरोधी। बहरहाल, गांधी ने अपने एक भाषण में कहा था कि अगर पश्चिमी दुनिया पूर्व के देशों को बल और छल से जीतने की कोशिश करेगी, तो वह बहुत दिनों तक टिक नहीं पाएगी। उन्होंने संघर्ष से अलग एक नई दुनिया की सोच विकसित की थी, जिसे नेहरूजी ने गुटनिरपेक्षता के रूप में स्थापित किया था, लेकिन यह संगठन भी चाय-कॉफी का मंच बनकर रह गया। साठ-सत्तर के दशक में उत्तर और दक्षिण के रूप में विश्व के दो केंद्र बन गए। जो गरीब थे, वे दक्षिण की टोली में थे और जो अमीर थे, वे उत्तर की टोली में शामिल थे। एक टोली अन्नदाता बन गई, तो दूसरी निहायत गरीब।

उसके बाद भूमंडलीकरण की आंधी शुरू हुई। जो जितना ही शक्तिमान, वह उतना ही महान। विधाता का नियम है कि कोई भी देश हमेशा श्रेष्ठ नहीं बना रहता, उसका पतन सुनिश्चित है। अमेरिका का भी पतन आरंभ हो गया। यूरोप के हालात पहले से ही खराब थे। इस बीच चीन एक नई शक्ति के रूप में उभरकर आया, जिसके बारे में 18वीं शताब्दी में नेपोलियन ने कहा था कि यह सोया हुआ शेर है, इसे छेड़ो मत, जग गया तो सबकी नींद हराम कर देगा। नेपोलियन की बात सच साबित हुई। अमेरिका आज चीन की गति और शक्ति, दोनों से परेशान है, लेकिन दुखद बात यह है कि दुनिया में शक्ति का ध्रुवीकरण बदल गया, केंद्र पश्चिम से पूर्व की ओर खिसक गया, फिर भी नियामक वही रहे, जो 19वीं और 20वीं शताब्दी में थे।

गांधी ने कहा था कि पूर्व की दुनिया अलग है, इसके मूल्य अलग हैं, यह एक बेहतर सोच पैदा कर सकती है, लेकिन बात बनी नहीं।समाज और हिंसक हो गया। धर्म और जाति के नाम पर सामूहिक कत्लेआम होने लगे। गांधी गीता को सर्वोच्च धर्मग्रंथ मानते थे। उनकी वैश्विक सोच भी गीता के नियमों से सिंचित थी। वह कहते थे, विश्व को जब तक औपनिवेशिक नजरों से देखा जाएगा, तब तक मैं और तुम का अंतर कभी खत्म नहीं होगा। ऐसी दुनिया चाहिए, जिसमें सबको बराबर का हक हो। बंदूक और बारूद के ढेर पर बैठा विश्व आज पूरी तरह से गांधी की सोच से विपरीत है। इसे बदलने के लिए आध्यात्मिक नियमों का पालन जरूरी है, जिसमें हर धर्म को एक रूप में देखा गया हो, जिसमें पूरा विश्व अपना परिवार हो, यह चिंतन और सिद्धांत केवल भारत की सोच में है, गांधी इसी सोच के प्रवर्तक थे। दुनिया को बारूद से बचाना ही होगा।

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