क्या सचमुच बनेगा महागठबंधन?

By Independent Mail | Last Updated: Nov 3 2018 9:25PM
क्या सचमुच बनेगा महागठबंधन?

सुनीता मिश्रा, टीवी पत्रकार

तेलुगूदेश के नेता चंद्रबाबू नायडू ने शरद पवार और फारूक अब्दुल्ला के साथ मिलकर गैर-भाजपा दलों के महागठबंधन की संभावनाओं को फिर हवा देने की कोशिश की है। तीनों नेताओं ने पत्रकार-वार्ता की और उसमें मोदी सरकार पर जमकर हमला बोला। कहा कि देश में लोकतंत्र इस समय संकट में है, सरकार लोकतांत्रिक संस्थाओं, मसलन सीबीआई और भारतीय रिजर्व बैंक पर हमले कर रही है। इसके बाद चंद्रबाबू नायडू राहुल गांधी से मिले। इस मुलाकात के बाद राहुल ने भी अपने टि्वटर एकाउंट से मोदी सरकार पर हमला बोला। उन्होंने दावा किया कि राफेल विमान सौदे में घोटाला हुआ है। यह दावा भी खुलकर किया कि मोदी ने अनिल अंबानी को फायदा पहुंचाने के लिए यह घोटाला खुद किया है। जाहिर है कि यह बयानबाजी 2019 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर की गई है। हालांकि, पांच राज्यों के जारी विधानसभा चुनावों से भी उसका संबंध है। ऐसे में इस बात का विश्लेषण किया जाने लगा है कि 2019 से पहले क्या सचमुच महागठबंधन बनेगा? अगर महागठबंधन बनेगा, तो क्या उसमें सभी भाजपा विरोधी दल शामिल हो जाएंगे?

महागठबंधन तो बनेगा

वैसे राजनीति के ज्यादातर जानकारों का मानना है कि महागठबंधन नहीं बनेगा, लेकिन यह अनुमान सही नहीं है। महागठबंधन न बनने का अनुमान ये लोग इस आधार पर लगा रहे हैं कि कांग्रेस मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में बीएसपी से समझौता नहीं कर पाई। मध्य प्रदेश में तो समाजवादी पार्टी भी चुनाव मैदान में है, कुछ सीटों पर। बीएसपी ने छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी के साथ तालमेल करके कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। लेकिन इन राज्यों के विधानसभा चुनाव अलग बात हैं, जबकि लोकसभा चुनाव अलग। राज्य विधानसभा चुनाव में सभी दल अपनी ताकत को अलग-अलग आजमा रहे हैं। अगर बीएसपी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान या फिर इन तीनों में से किसी एक राज्य में बेहतरीन प्रदर्शन करती है, तो उससे दो बातें होंगी। एक तो कांग्रेस दबाव में आ जाएगी और दो, बीएसपी लोकसभा चुनाव के लिए ज्यादा मोलभाव करने की स्थिति में होगी। इन दोनों की स्थितियों में वह महागठबंधन में शामिल हो जाएगी। उसे महागठबंधन में शामिल करने के लिए कांग्रेस को झुकना पड़ेगा। हो इससे उल्टा भी सकता है। अगर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीएसपी कुछ नहीं कर पाएगी, तो वह दबाव में आ जाएगी। तब उसे अपने राष्ट्रव्यापी प्रसार का सपना छोड़ना पड़ेगा और स्वयं के अस्तित्व के सवाल से जूझना पड़ेगा। इसके लिए वह महागठबंधन में शामिल हो जाएगी। बीएसपी का आधार केवल उत्तर प्रदेश में है। इसके बावजूद वहां से उसके पास एक भी लोकसभा सीट नहीं है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी उसका प्रतिनिधित्व कम हो गया है। अत: 2019 में अगर वह ठीक प्रदर्शन नहीं कर पाई, तो पार्टी खत्म हो जाएंगी। मायावती सड़क पर उतरकर संघर्ष भले ही न करती हों, उन्हें जेल जाने से भले ही डर लगता हो, लेकिन उनकी राजनीतिक सूझ-बूझ असंदिग्ध है। वह अपनी पार्टी को खत्म करने के रास्ते पर नहीं चलेंगी।

क्या बीजेपी के साथ जाएंगी माया?

मायावती अगर बीजेपी के साथ चली गईं तो उनका जनाधार तो अवश्य खिसक जाएगा। धीरे-धीरे बीजेपी उनके मतदाताओं को अपने पाले में कर लेंगी, लेकिन मायावती ऐसी नेता नहीं हैं जो बीजेपी से परहेज करती हों। उन्होंने उत्तर प्रदेश में बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई है। 2002 के दंगों के बाद गुजरात में हुए चुनाव में मायावती विपक्ष की ऐसी इकलौती नेता थीं जो भाजपा के चुनाव प्रचार के लिए गुजरात पहुंची थीं। उनके दिवंगत प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ अच्छे रिश्ते रहे हैं। नरेंद्र मोदी और मायावती के रिश्ते भी खराब नहीं हैं। फिर, अमित शाह यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि उन्हें किस पार्टी या नेता को भाजपा के साथ लाना है और किस तरह से लाना है। इसलिए मायावती के भाजपा के साथ जाने की संभावना को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। हां, यह जरूर ध्यान रखा जाना चाहिए कि अपना वोट बैंक हमेशा-हमेशा के लिए खिसकने के डर से मायावती फैसला बहुत सोच-समझकर लेंगीं।

तीसरा मोर्चा भी बन सकता है\

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव एक ऐसा मोर्चा बनाने की कोशिश करते रहे हैं, जिसमें शामिल दल भाजपा और कांग्रेस से समान दूरी बनाकर चलेंगे। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, ओडिसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और द्रमुक नेता एमके स्टालिन उनके इसके प्रयास से सैद्धांतिक तौर पर सहमत रहे हैं। दरअसल, स्टालिन को छोड़कर ये सभी नेता वैसे हैं, जो कांग्रेस से भी उतने ही डरते हैं, जितने भाजपा से। कांग्रेस इनकी मूल प्रतिद्वंद्वी अब भी है। हालांकि, ओडिसा में भाजपा का जनाधार बढ़ रहा है, लेकिन वहां नवीन पटनायक की मूल प्रतिद्वंद्वी अब भी कांग्रेस ही है। पश्चिम बंगाल में न कांग्रेस का खास जनाधार है, न भाजपा का, वहां ममता बनर्जी को वामपंथी दलों के साथ प्रतिद्वंद्विता करनी पड़ती है। ऐसे में ममता का रुख आगे क्या होगा, यह अभी से नहीं कहा जा सकता, लेकिन उनके मन में प्रधानमंत्री बनने का सपना पल रहा है। इस सपने का बीज उनमें लालू प्रसाद यादव ने बाेया था। इस बार जब ममता बनर्जी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, तो उस समारोह में लालू प्रसाद यादव भी शामिल हुए थे और उन्होंने अपने भाषण में कहा था कि ममता बनर्जी सक्षम नेता हैं, इतनी कि वह देश की प्रधानमंत्री बन सकती हैं। ममता तभी से इसी सपने के साथ राजनीति कर रही हैं। ऐसे में अगर उन्हें प्रधानमंत्री का पद महागठबंधन देगा, तो वह उसके साथ चलीं जाएंगी और तीसरा मोर्चा देगा, तो उसके साथ। तीसरे मोर्चे के संबंध में एक तथ्य और गौरतलब है। भाजपा कभी नहीं चाहेगी कि उसके विरोधी वोट एकजुट हों। अत: वह चंद्रशेखर राव में तीसरा मोर्चा बनाने की हवा भरती रहेगी। इस समय महागठबंधन की पहल जो लोग कर रहे हैं, उनमें फारूक अब्दुल्ला ऐसे हैं जिनकी बात को बहुत ज्यादा वजन नहीं दिया जाता। शरद पवार और चंद्रबाबू नायडू की चंद्रशेखर राव से पटरी नहीं बैठती है। इसीलिए उन्हें अपने पाले में लेने वाला फिलहाल कोई नहीं हैं। उन्हें ममता बनर्जी और नवीन पटनायक ही महागठबंधन में शामिल कर सकते हैं और ये दोनों नेता फिलहाल तो गैर-कांंग्रेस, गैर-भाजपा वाले तीसरे मोर्चे के पक्ष में हैं।

प्रधानमंत्री कौन बनेगा?

अगर हम भाजपा विरोधी महागठबंधन की संभावना के आधार पर ही आगे बढ़ें, तो इसका सबसे कमजोर पक्ष यह है कि यह प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की स्थिति में नहीं है। चंद्रबाबू नायडू, शरद पवार और फारूक अब्दुल्ला ने अपनी पत्रकार-वार्ता में यही तो कहा कि चुनाव परिणाम आने के बाद तय किया जाएगा कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक बार इच्छा जताई थी कि अगर विपक्ष चाहेगा, तो वह प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार हैं, जिस पर ममता बनर्जी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। इसके बाद पी. चिदंबरम ने मोर्चा संभाला और कहा कि यह चुनाव के बाद तय किया जाएगा कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा। महागठबंधन की रणनीति में धार तभी आएगी, जब वह प्रधानमंत्री पद का चेहरा पहले बताए, लेकिन वह इस स्थिति में नहीं है। चंद्रबाबू नायडू अपने हाथ आया प्रधानमंत्री का पद एक बार छोड़ चुके हैं। एचडी देवेगौड़ा को उन्होंने ही अपनी जगह प्रधानमंत्री बनवा दिया था। इस बार भी उनके मन में प्रधानमंत्री बनने की कोई इच्छा नहीं दिख रही है, लेकिन बाकी तो विपक्ष का हाल एक अनार सौ बीमार वाला है। शरद पवार खुद प्रधानमंत्री बनने का सपना देखते हैं।

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