क्या कांग्रेस को मजबूर से मजबूत बना पाएंगी प्रियंका?

By Independent Mail | Last Updated: Feb 6 2019 7:43PM
क्या कांग्रेस को मजबूर से मजबूत बना पाएंगी प्रियंका?

राजकुमार सिंह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर मायावती-अखिलेश यादव तक से दरपेश चुनौतियों का कांग्रेस को एक ही जवाब सूझा है, प्रियंका गांधी। प्रियंका के सक्रिय राजनीति में आने की अटकलें उससे भी पहले से लगायी जा रही थीं, जब राहुल गांधी ने राजनीति में कदम रखा। 47 साल की उम्र में सक्रिय राजनीति में कदम रखने वाली प्रियंका की भूमिका फिलहाल आगामी लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश और उसमें भी पूर्वी क्षेत्र तक सीमित रहेगी। माना जा रहा है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के ऐतिहासिक पराभव के बाद दरपेश राजनीतिक चुनौतियों से अकेले दम पार पाने में कारगर नजर नहीं आ रहे राहुल गांधी के लिए प्रियंका मददगार की भूमिका निभाएंगी, पर ऐसी भूमिका तो वह पहले से निभाती आ रही हैं।

एक दशक से भी ज्यादा समय से प्रियंका ही अपनी मां सोनिया गांधी के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली और भाई राहुल के निर्वाचन क्षेत्र अमेठी में जन संपर्क करती हैं। राहुल गांधी के भाषणों की विषय वस्तु से लेकर राजनीतिक प्रबंधन तक में भी परदे के पीछे प्रियंका की भूमिका रहती है। पिछले दिनों जीत के बाद जब राजस्थान और मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री चयन में राहुल गांधी को मुश्किलें आ रही थीं, तब प्रियंका बाकायदा संबंधित बैठकों में भाग लेती देखी गईं। इसके बावजूद अगर उन्हें अब कांग्रेस महासचिव नियुक्त कर पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी गई है, तो जाहिर है कि कांग्रेस को अपने भविष्य ही नहीं, अस्तित्व के खतरे का अहसास हो गया है। इस खतरे का मुकाबला करने के लिए एक बार फिर नेहरू परिवार के अंदर से ही समाधान खोजने की कवायद से साफ हो गया कि हाल-फिलहाल तो कांग्रेस नेतृत्व के लिए इस परिवार से बाहर झांकने के लिए कोई तैयार नहीं है। साफ कहें तो परिवार और पार्टी ने खुद को एक-दूसरे का पर्याय मान लिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह मजबूरी कांग्रेस की मजबूती बन सकती है?

पहले प्रियंका के प्रति कांग्रेस के आकर्षण की बात करें। इस आकर्षण का पहला कारण तो उनका नेहरू परिवार का सदस्य होना ही है। किसी को अच्छा लगे या बुरा, पर कांग्रेस ने नेहरू परिवार में ही अपना तारणहार खोजने को अपनी नियति मान लिया है। नब्बे के दशक में नेहरू परिवार से नेतृत्व बाहर निकलने पर कांग्रेस में जो कुछ हुआ, उससे भी इस आम धारणा को बल ही मिला है कि नेहरू परिवार का नेतृत्व ही उसे एकजुट रख सकता है। यह अलोकतांत्रिक लग सकता है, पर एक-दूसरे के विरुद्ध शह-मात का खेल खेलने वाले कांग्रेसी नेहरू परिवार के नेतृत्व को आंख मूंद कर स्वीकार कर लेते हैं। चुनावी पराभवों के चलते पीवी नरसिंह राव और सीताराम केसरी के नेतृत्व को फजीहत के साथ दरकिनार करने वाले कांग्रेसियों ने चुनाव-दर-चुनाव पराजय के बाद भी कभी राहुल की नेतृत्व क्षमता पर सवाल नहीं उठाया।

प्रियंका के प्रति आकर्षण का दूसरा कारण उनके हावभाव इंदिरा गांधी से मिलना माना जाता है। उनके विरोधी भी मानते हैं कि राहुल गांधी की तुलना में प्रियंका राजनीति में ज्यादा सहज नजर आती हैं। कटु आलोचना और ज्वलंत मुद्दों पर भी वह बिना आवेश में आए जिस तरह प्रतिक्रिया देती हैं, उससे उनकी राजनीतिक समझ का संकेत मिलता है, लेकिन क्या राजनीति में बड़ी सफलता के लिए इतना ही पर्याप्त है? अगर यह मान लिया जाए कि प्रियंका न सिर्फ एक दशक से भी ज्यादा समय से रायबरेली और अमेठी में जन संपर्क की कमान संभालती रही हैं, बल्कि राहुल के राजनीतिक प्रबंधन में भी परदे के पीछे उनकी भूमिका रही है, तब कांग्रेस की नाकामियों की जिम्मेदारी-जवाबदेही से वह पूरी तरह मुक्त कैसे हो सकती हैं? अगर प्रियंका की राजनीतिक समझ राहुल से बेहतर है, तो उन्होंने कांग्रेस को जनाधार से कट कर पराभव की फिसलन पर जाने से रोकने की समय रहते कोई पहल क्यों नहीं की?

अतीत की छोड़ अगर वर्तमान और भविष्य की ही बात करें, तब भी प्रियंका की राह बहुत आसान नजर नहीं आती। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश को पूर्वी और पश्चिमी, दो हिस्सों में बांट कर प्रभारी महासचिव बनाने से अगर इस राज्य के प्रति राहुल की गंभीरता का संकेत मिलता है, तो यह प्रियंका की सीमाओं और कांग्रेस की मुश्किलों की स्वीकारोक्ति भी है। प्रियंका को पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान सौंपते हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रभार ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंपा गया है। सिंधिया का पश्चिमी उत्तर प्रदेश से क्या-कैसा राजनीतिक-सामाजिक रिश्ता रहा है, यह राहुल गांधी ही बेहतर जानते होंगे। हां, रायबरेली-अमेठी के बहाने प्रियंका अवश्य पूर्वी उत्तर प्रदेश में ज्यादा सक्रिय रही हैं, पर कटु सत्य यह भी है कि सपा-बसपा द्वारा आपस में ही लोकसभा सीटों का बंटवारा कर लेने और अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल के भी उनके गठबंधन में शामिल हो जाने के बाद पूरे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए रास्ता तो दूर, पगडंडी तक नहीं बची है। नेहरू परिवार की परंपरागत मानी जाने वाली लोकसभा सीटों: रायबरेली और अमेठी में कांग्रेस जीतती अवश्य रही है, लेकिन जमीनी सच इससे समझा जा सकता है कि उनके अंतर्गत पड़ने वाली विधानसभा सीटें लगातार उसके हाथ से फिसलती गयी हैं।

माना जाता है कि इस सबसे बुरे वक्त में भी देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के पास हर जगह इतना मत प्रतिशत बचा है, जो गठबंधन की राजनीति में निर्णायक बन सकता है। यह बात पूरी तरह गलत भी नहीं है, लेकिन यह स्थिति कांग्रेस की सीमाओं का संकेतक भी है कि भाजपा से सीधे मुकाबले वाले राज्यों के अलावा उसकी हैसियत जोड़तोड़ में अहमियत तक ही सिमट गयी है। यह बात पहले भी लिखी जाती रही है कि सपा, बसपा, रालोद, राजद सरीखी मझोली जातियों और दलित-अल्पसंख्यक जनाधार वाली पार्टियां कांग्रेस के ही मूल जनाधार पर खड़ी हैं। इसलिए वे कभी नहीं चाहेंगी कि कांग्रेस मजबूत हो, क्योंकि उसकी मजबूती का अर्थ होगा उनकी कमजोरी। यही कारण है कि संकटकाल में लालू यादव का सबसे पहले साथ देने वाली कांग्रेस को दरकिनार करने वाली सपा-बसपा से एकजुटता दिखाने में लालू के राजनीतिक वारिस तेजस्वी ने देर नहीं लगायी।

चुनाव बाद जो भी समीकरण बनें-बदलें, लेकिन उनका आधार भी तो चुनावी सफलता से हासिल ताकत ही बनेगी। इसलिए प्रियंका की पहली परीक्षा कांग्रेस को पूर्वी उत्तर प्रदेश में उसके पैरों पर खड़ा करने की होगी और यह काम आसान नहीं है। किसी को भी यह गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए कि प्रियंका के नाम पर कांग्रेस की आंधी चलने लगेगी। हां, उनकी सक्रियता हताश कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नए जोश का संचार अवश्य कर सकती है, पर उसे किस हद तक वोटों में तब्दील किया जा सकेगा, यह देखना दिलचस्प होगा। सपा-बसपा के प्रतिबद्ध जनाधार में प्रियंका सेंध लगा पाएंगी, इसकी उम्मीद कम ही है। तब क्या वह उस उच्च वर्ग को आकर्षित कर पाएंगी, जो असंतुष्ट होते हुए भी भाजपा के साथ है? गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण से लेकर मोदी सरकार की तमाम कवायदें इसी वर्ग को मनाने की कोशिश हैं। फिर भी उत्तर प्रदेश में अगर तीन-साढ़े तीन फीसद मत भी अलग हो गए, तो भाजपा का खेल बिगड़ जाएगा। क्या प्रियंका इतना भर कर पाएंगी?

  • वरिष्ठ पत्रकार
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