बदलना होगा खेती को देखने का नजरिया

By Independent Mail | Last Updated: Dec 3 2018 11:28PM
बदलना होगा खेती को देखने का नजरिया

वरुण गांधी

हाल ही में दिल्ली में हजारों किसानों ने अपनी मांगों के समर्थन में आंदोलन किया। इससे पहले महाराष्ट्र के किसान भी आंदोलित हो चुके हैं। इससे भी पहले 30 हजार से ज्यादा किसानों ने एक लाख रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से कर्ज माफी के साथ 50 हजार रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से सूखे के मुआवजे की मांग को लेकर ठाणे से मुंबई तक मार्च किया। इस समय नासिक और मराठवाड़ा जिले के अलग-अलग हिस्सों में कई गांवों को पानी की कमी (औसतन 30 फीसद) का सामना करना पड़ रहा है, जबकि यहां के किसान पहले से ही कम फायदेमंद खरीफ की फसलों में निवेश के चलते कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं। अब यहां के ग्रामीणों को मजदूरी की तलाश में रोजाना आसपास के शहरी इलाकों में भटकते देखा जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में विदर्भ और देश के बहुत से दूसरे उपेक्षित इलाकों की अपनी यात्राओं के दौरान सीमांत किसानों की खस्ता हालत और कृषि कर्ज माफी के लिए उनकी जरूरतों से मेरा सामना हुआ है। इस साल कम बारिश को देखते हुए आगामी रबी की फसल से भी कम ही उम्मीद है।

यह कोई नई बात नहीं है। अभी हाल ही में बंगलुरु में हजारों किसानों ने कृषि ऋण माफी की मांग के साथ विधानसभा का घेराव किया था। इस बीच, नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस की 2013 की एक रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब में प्रति व्यक्ति औसत बकाया ऋण तकरीबन एक लाख 19 हजार 500 रुपये है। पीटीआई की नवंबर महीने की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब में किसानों द्वारा फसल ऋण का भुगतान नहीं करने के मामले निरंतर बढ़ रहे हैं, जिस कारण कृषि क्षेत्र में गैर-निष्पादित संपत्ति (एनपीए) बढ़कर नौ हजार करोड़ रुपये से अधिक हो गई है।

कृषि संकट से निपटने के लिए हमें अपनी व्यवस्था को फिर से दुरुस्त करना होगा। आजादी के बाद भारत में कृषि ऋण माफी नियमित रूप से इस्तेमाल की जाने वाली नीतिगत उपकरण रही है। यहां तक कि पंजाब जैसी जगहों पर, जहां दशकों से कृषि विकास निश्चित रूप से सबसे अच्छा रहा है, कृषि से जुड़ी अनिश्चितताओं से निपटने के लिए संस्थागत उपाय महत्वपूर्ण रूप से विकसित किए गए हैं। किसी भी विचारधारा की सरकार हो, सभी अक्सर संस्थागत ऋण के लिए ऋण माफी का सहारा लेती हैं। यह अलग बात है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बड़ी हिस्सेदारी गैर-संस्थागत ऋण (साहूकारों के ऋण) की है।जिला ऋण निपटान फोरम (पंजाब कृषि कर्जदारी समाधान अधिनियम, 2016) के अलावा ऋण समझौता बोर्ड (पंजाब कर्जदारी से राहत अधिनियम, 1934 के तहत) दशकों से अस्तित्व में है, लेकिन ऐसे संस्थान (उनके हाल में अस्तित्व में आए नए अवतारों- मंडलीय ऋण निपटान फोरम) फंड और प्रतिभा की कमी के कारण किसी काम के नहीं रह गए हैं। इसके मुकाबले केरल को देखें, जहां राज्य ऋण राहत आयोग संस्थागत और गैर-संस्थागत ऋण, दोनों तरह के मामले देखता है। इसके पास किसी क्षेत्र को आपदा-प्रभावित क्षेत्र घोषित करने के साथ ही सबके लिए ऋण वसूली पर एकतरफा रोक का आदेश जारी करने का भी अधिकार है।

राज्य सरकारों को केरल मॉडल से सीख लेनी चाहिए, जिसने भरपूर फंड के साथ ऐसा ऋण राहत आयोग बनाया है, जो पहले से काम के बोझ तले दबी और उदासीन सरकारी मशीनरी पर ऐसे कामों का बोझ डालने के बजाय फौरी राहत प्रक्रिया शुरू कर सकता है। ग्रामीण दिवालियापन की पीड़ारहित घोषणा के लिए एक व्यापक ऋण निपटान मॉडल कानून की जरूरत है। हमें किसानों को खुद को दिवालिया घोषित करने की अनुमति देने से कतई हिचकिचाना नहीं चाहिए। निजी तौर पर किसानों के लिए एक नई शुरुआत मुमकिन होनी चाहिए, आखिरकार हालिया बैंकिंग एनपीए पर औद्योगिक घरानों को ऐसा करने की इजाजत दी जा रही है। जो राहत औद्योगिक घरानों को दी जा रही है, वह किसानों को क्यों नहीं दी जा सकती?

दूसरी तरफ, माइक्रो-फाइनेंस में और सुधार जरूरी हैं। हमें स्व-सहायता समूहों को प्रोत्साहित करना चाहिए, जो बचत के लिए एक सुरक्षित मौका देते हैं और जो छोटे बैंकों की तरह काम करते हैं, सदस्यों को पैसे देते हैं। इनका सकारात्मक आर्थिक प्रभाव अच्छी तरह प्रमाणित है, खासतौर से बैंकिंग की आदत डालते हुए औसत शुद्ध आय और रोजगार जैसे मानकों पर। हालांकि, बैंक स्व-सहायता समूहों को बढ़ावा देने में अपना फायदा पहचान पाने में नाकाम रहे हैं। स्व-सहायता समूहों के माध्यम से गरीबों को उधार देने में कम लागत है और यह गलत चयन व नैतिक संकट से मुक्त है। स्व-सहायता समूह और बैंकिंग क्षेत्र के बीच का रिश्ता महत्वपूर्ण है। अध्ययनों ने दिखाया है कि आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में फेडरेशन बनाकर काम करने से स्व-सहायता समूह वित्तीय रूप से फायदेमंद हो सकते हैं और अर्थव्यवस्था को आगे ले जा सकते हैं। इसके साथ ही, पायलट प्रोजेक्ट के माध्यम से नियमित व निर्बाध आधारभूत आय बढ़ाना सीमांत किसानों के लिए फायदेमंद होगा। सेवा, यूनिसेफ 2014 के अध्ययन का कहना है कि नियमित बुनियादी आय होने से सीमांत किसानों को संकट के हालात (जैसे कि बीमारी या भुखमरी) में कर्ज के दुष्चक्र में फंसने के बजाय, प्रभावी रूप से निपटने में मदद मिलेगी। यह बाल मजदूरी प्रथा को भी कम कर सकता है और माता-पिता को अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रोत्साहित करेगा। इस तरह गांवों में बदलाव आएगा और वहां के लोगों की आय में नियमित बढ़ोतरी होगी।

किसान ऋण पर चर्चा के हमारे अंदाज में भी बदलाव की जरूरत है। भारत के वित्तीय विशेषज्ञों में किसानों को दी गई किसी भी सरकारी मदद (अनुदान, भोजन का अधिकार, ऋण माफी) की पेशकश को खारिज करने की तीव्र इच्छा दिखाई देती है, जबकि उद्योग को छूट देने पर उनका रुख नरमी भरा होता है। हमें अपने राष्ट्रीय बजट को कृषि की दिशा में मोड़ने की जरूरत है। कृषि क्षेत्र में मांग वाले उपकरणों का सुधार कार्यक्रम (जैसे कि मौजूदा सिंचाई पंप की जगह एनर्जी-सेवर मॉडल लाना) लागू करना होगा। हमें दीर्घकालिक ग्रामीण ऋण नीति को बढ़ावा देना चाहिए, जिसमें सूखे और बाढ़ की घटनाओं के प्रति लचीलापन हो। सरकार द्वारा प्रस्तावित फसल बीमा, बाजार और मौसम की अनिश्चितता के खिलाफ बीमा की आदत को संस्थागत बनाने की दिशा में एक स्वागतयोग्य कदम है। इसके साथ और भी बहुत कुछ ऐसा किया जा सकता है जिससे किसानों को राहत मिल सकती है। इन उपायों को करने के लिए हमें किसानों को देखने का नजरिया बदलना पड़ेगा। अभी उनके प्रति हमारा नजरिया ठीक नहीं है।

भाजपा सांसद

image
Copyrights @ 2017 Independent NewsCorp (P) Ltd., Bhopal. All Right Reserved