1953-पूर्व की स्थिति बहाल करना यानि कश्मीर की बर्बादी

By Independent Mail | Last Updated: Apr 7 2019 2:11AM
1953-पूर्व की स्थिति बहाल करना यानि कश्मीर की बर्बादी

प्रो. हरिओम, वरिष्ठ पत्रकार

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 28 मार्च को बयान दिया कि 'अनुच्छेद 35-ए अवैध, भेदभावपूर्ण और संवैधानिक रूप से संवेदनशील' है, और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने 31 मार्च को बयान दिया कि 'अनुच्छेद 35-ए तथा अनुच्छेद 370 खत्म होगा।' इन बयानों पर नेशनल कॉन्फ्रेंस के सर्वेसर्वा पिता-पुत्र फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला तथा पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्षा महबूबा मुफ्ती जैसे कश्मीरी नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया जताई। महबूबा ने कहा कि अनुच्छेद 35-ए और अनुच्छेद-370 को जिस रोज खत्म किया गया तो उसी दिन जम्मू-कश्मीर का भारत से रिश्ता खत्म हो जाएगा। कश्मीरी नेताओं ने यह भी मांग की है कि जम्मू-कश्मीर में 1953 के पूर्व की संवैधानिक स्थिति लाई जाए ताकि जम्मू-कश्मीर को पृथक राष्ट्रपति और पृथक प्रधानमंत्री मिल सके।

अनुच्छेद 35-ए और अनुच्छेद-370 का भारत में जम्मू-कश्मीर के विलयन से कुछ लेना-देना नहीं है। विलय तो 26 अक्टूबर, 1947 को इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट-1947 के तहत हुआ। अनुच्छेद-370 जम्मू-कश्मीर में अस्थाई उपाय के रूप में 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया। अनुच्छेद 35-ए जम्मू-कश्मीर में 14 मई, 1954 को चुपके से लागू कर दिया गया। अनुच्छेद 35-ए पर संसद में कभी चर्चा तक नहीं की गई। इस तरह यह असंवैधानिक है। कश्मीरी नेताओं की मांग में नया कुछ नहीं है। कथित कश्मीर समस्या का स्थाई समाधान राज्य की 1953-पूर्व स्थिति में होने की बात वे कहते रहे हैं। वर्षों से बार-बार कहते रहे हैं कि अनुच्छेद-370 को नई दिल्ली और कश्मीर में बैठे इसके प्रतिनिधियों द्वारा बायपास किए जाने से न केवल कश्मीरी मुस्लिम अलग-थलग पड़ गए बल्कि यही राज्य में उग्रवाद पनपने का मूल कारण है। गौरतलब है कि अनुच्छेद-370 के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा हासिल है।

इसका अपना संविधान और अलग ध्वज है। भारत के अन्य राज्यों के विपरीत जम्मू-कश्मीर अकेला ऐसा राज्य है, जिसके विशेष अधिकार हैं। जम्मू-कश्मीर सरकार की सहमति बिना राज्य में कोई कानून लागू नहीं किया जा सकता। सवाल है कि 1953-पूर्व स्थिति से क्या राज्य में लोकतंत्र मजबूत होगा या कश्मीरियों को उनकी समस्याओं से निजात मिलेगी और उनका पुन: सशक्तिकरण होगा? राज्य में शेख अब्दुल्ला को बर्खास्त करके 9 अगस्त, 1953 को गिरफ्तार करने से पूर्व की स्थिति पर गौर करें तो कह सकते हैं कि ऐसा नहीं होगा। 1953-पूर्व स्थिति बहाल की जाती है तो न केवल निजाम-ए-मुस्तफा और जम्मू-कश्मीर को भारत से पृथक करने की अवधारणा में विश्वास करने वालों की हिम्मत बढ़ेगी, बल्कि राज्य में सभी लोकतांत्रिक संस्थान नष्ट हो जाएंगे, आमजन अपनी नागरिक स्वतंत्रता व राजनीतिक अधिकारों से वंचित हो जाएगा। प्रेस और न्यायपालिका की आजादी छिन जाएगी। इसलिए कि ऐसी नाटकीय पुनर्वापसी से मंत्रियों को विधायी, न्यायिक और प्रशासकीय अधिकार मिल जाएंगे।

ध्यान देने की जरूरत है कि 7 सितंबर, 1939 से 26 जनवरी, 1957 के बीच राज्य के शासक और उनके साथी संभ्रांतों के पास जे एंड के कंस्टीट्यूशन एक्ट (जेकेसीए) 1939 से प्रदत्त अधिकार और शक्तियां थीं। शासक हरि सिंह ने इस एक्ट को कश्मीर-आधारिक शेख अब्दुल्ला और उनके समर्थकों द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन को शांत करने के लिए तैयार कराया था। शेख राज्य में राजशाही के स्थान पर लोकतंत्र की स्थापना की मांग को लेकर 1932 से आंदोलन चलाए हुए थे। इस एक्ट के मुताबिक, 75 निर्वाचित और नामित सदस्यों वाली एसेंबली गठित की गई, लेकिन शेख अब्दुल्ला और उनके साथियों ने अपना आंदोलन जारी रखा। सच तो यह है कि उन्होंने जेकेसीए 1939 को नकारते हुए कहा कि वे एक जिम्मेदार सरकार बनने तक आंदोलन जारी रखेंगे। जेकेसीए का विरोध करने के उन्होंने सात कारण गिनाए। पहला, इसमें ऐसे प्रावधान हैं, जिनसे राज्य में एक जिम्मेदार सरकार बनाने में रुकावट होगी। लोगों का शोषण बढ़ेगा। कहा गया कि एक संविधान सभा के बजाय यह एक्ट शासक और उनके साथियों ने बनाया है, जिससे आम लोगों की अनदेखी हुई है। इसमें स्वतंत्र न्यायपालिका के लिए जगह नहीं है। प्रेस की आजादी नहीं है। भारत सरकार के 1909, 1919 और 1935 में तैयार किए गए एक्ट की भांति ही इस एक्ट में सांप्रदायिकता का पुट है। जब उनके 5 साल चले संघर्ष के बावजूद हरि सिंह ने जनसंख्या का सिद्धांत लागू नहीं किया तो शेख अब्दुल्ला और 'लोकतंत्र समर्थक' अन्य नेताओं ने अपने प्रयास तेज कर दिए। 1946 में क्विट कश्मीर मूवमेंट, नेशनल कॉन्फ्रेंस के कार्यकर्ताओं ने खुल्लम-खुल्ला राजा को चुनौती देते हुए उन्हें पद से हटने और जनता की सरकार की स्थापना की मांग करते हुए सरकारी इमारतों और थानों पर हमले किए। पुलिस और सेना ने मोर्चा संभाला और शेख अब्दुल्ला और अन्य प्रमुख नेताओं को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया, तब जाकर हालात सामान्य हो सके।

इन हालात और पाकिस्तान द्वारा बड़े स्तर पर युद्ध छेड़ देने पर जम्मू-कश्मीर ने 26 अक्टूबर, 1947 को भारत में स्वयं को विलयित कर लिया। बाद में शेख अब्दुल्ला ने जेकेसीए को खत्म करने की मांग को छोड़कर अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए इसी कानून को संबल बना लिया। अपने वरिष्ठ सहयोगियों बख्शी गुलाम मोहम्मद, गुलाम मोहम्मद सादिक, मोहिउद्दीन कारा व मौलाना मसूदी को किनारे लगा दिया। जम्मू-कश्मीर प्रेस एंड पब्लिकेशन एक्ट-1932 का बेजा इस्तेमाल करते हुए प्रेस को दबाया। इस प्रकार स्पष्ट है कि 1953-पूर्व की संवैधानिक स्थिति की बहाली से कश्मीर के अवाम के अधिकारों पर कुठाराघात होगा। इसका मतलब होगा भारत से इस राज्य का रिश्ता खत्म। अल्पसंख्यकों, जो जम्मू-कश्मीर की जनसंख्या का 40 फीसद और राज्य के 89 प्रतिशत क्षेत्र पर आबाद हैं, की तबाही। जरूरत तो स्वायत्तता-स्वशासन या 1953-पूर्व स्थिति की बहाली जैसी मांगों को ताक पर रखने की है।

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