भारत में भी अब 'ट्रेड वॉर' की दस्तक

By Independent Mail | Last Updated: Apr 9 2019 11:55PM
भारत में भी अब ''ट्रेड वॉर'' की दस्तक

डॉ. विमल कश्यप

जिस तरह से आर्थिक मोर्चे पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को झटका दिया था, उससे साफ हो गया था कि भारत में भी अब 'ट्रेड वार' की शुरुआत हो चुकी है। अपनी अमेरिका फर्स्ट नीति के तहत ट्रंप ने भारत पर अमेरिकी व्यापारिक हितों के प्रतिकूल व्यवहार करने का आरोप लगाया था। इसी क्रम में उन्होंने भारत और टर्की से 60 दिनों के भीतर जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज (जीएसपी) को समाप्त करने का प्रस्ताव संसद में पेश कर दिया था। अब ट्रंप खुद बैकफुट पर आ गए हैं, भारत समर्थक लॉबी तथा राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार तुलसी गब्बार्ड ने इस प्रस्ताव को तत्काल टालने की अपील की है तो इसे लागू करने की समय सीमा बढ़ सकती है। इसके अंतर्गत ट्रंप भारत को मिली, तरजीही व्यापार दर्जे में कटौती करना चाहते थे। इसके मायने थे कि भारत द्वारा अमेरिका को किए जाने वाले कुल निर्यात में मिलने वाले 5.7 अरब डॉलर की ड्यूटी फ्री छूट बंद हो जाती। जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज व्यवस्था मुक्त व्यापार संबंधित एक अमेरिकी व्यवस्था है, जो 1 जनवरी, 1976 से कार्य कर रही है। इसके तहत, अमेरिका विकासशील देशों के तीव्र आर्थिक विकास के लिए उनके व्यापार पर कुछ रियायतें देता है। इसका लाभ यह होता है कि इससे विकासशील देश अमेरिकी बाजारों में अपनी पहुंच बना पाते हैं, और अपने कुछ उत्पादों की कर मुक्त बिक्री भी कर पाते हैं। इस व्यवस्था के तहत 129 देशों के लगभग 4,800 वस्तुओं को अमेरिकी बाजारों में ड्यूटी फ्री प्रवेश मिलता है। 

मूल रूप से यह कोई संधि न होकर विकासशील देशों को मिलने वाली एक प्रकार की अमेरिकी सहायता है। अगर भारत के संदर्भ में देखा जाए तो इस व्यवस्था में उसके लगभग 50 उत्पाद शामिल हैं। केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद से ही वह लगातार व्यापार को सुगम बनाने वाली नीतियों पर ध्यान केंद्रित कर रही है। यही कारण है कि भारत ने 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' तालिका में उल्लेखनीय सुधार किया है। इससे ट्रंप का भारत पर आरोप लगाना कि भारत, अमेरिकी उत्पादों के लिए विषम परिस्थितियां पैदा कर रहा है, सही नहीं लगता। अमेरिकी राष्ट्रपति भारत के साथ बढ़ते व्यापार घाटे को लेकर चिंतित नजर आते हैं। वास्तव में अमेरिका का असल व्यापार घाटा तो चीन के साथ है, जो बढ़कर 419 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। अमेरिका को उसकी चिंता करनी चाहिए। अमेरिका भारत पर लगातार दबाव बनाता रहा है कि भारतीय बाजार अमेरिकी डेयरी उत्पादों के लिए खोले पर भारत की अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याएं हैं। यहां बहुत से लोग जीवनयापन के लिए पहले से ही डेयरी उत्पादों के व्यापार में संलग्न हैं। साथ ही हमारी कछ धार्मिक भावनाएं भी आहत हो सकती हैं, क्योंकि कहना मुश्किल होगा कि अमेरिकी डेयरी प्रोडक्ट्स भारतीय भावनाओं के अनुरूप होंगे या नहीं। 

अमेरिका में पशुओं को चारे के रूप में मांस भी खिलाया जाता है जिससे भारत चिंतित रहता है। भारत ने पिछले एक दशक में चिकित्सीय क्षेत्र में काफी तरक्की की है, लेकिन नियंत्रण स्तर पर चिकित्सीय उपकरणों और प्रत्यारोपण में इस्तेमाल होने वाले कृत्रिम अंग बनाने में अमेरिकी और जर्मन कंपनियों का वर्चस्व है। ये अपने उत्पाद भारत में भारी कीमत पर बेचती हैं। भारत ने घुटनों के प्रत्यारोपण से संबंधित कृत्रिम अंगों की कीमत निर्धारित कर दी हैं ताकि ये कंपनियां मनमानी न कर सकें, इससे ट्रंप पर लगातार दबाव रहा। बड़ा सवाल है कि अमेरिका के इस कड़े कदम से भारत की अर्थव्यवस्था और बाजार पर क्या असर पड़ेगा और भारत और अमेरिका के रणनीतिक संबंधों पर भी क्या कोई नकारात्मक असर पड़ेगा? कहा जा सकता है कि लागू होने की स्थिति में भी भारत पर इसका इतना व्यापक असर नहीं होता जितने कयास लगाए जा रहे हैं। जिस तरह भारत में भी अब ट्रेड वार की धमक हो चुकी है तो भारत को अधिक प्रतिस्पर्धी होने के लिए कमर कस लेनी चाहिए। भारत से अमेरिका  को निर्यातित आभूषण और रत्न तथा दवाओं पर दबाव बनेगा, जिसका फायदा अन्य देश उठाना चाहेंगे। भारत के पास डब्लूटीओ जाने का विकल्प था, पर बेहतर होगा कि दोनों देश थोड़ी बहुत रियायतें देकर आपसी समझ से विवाद सुलझाएं। क्योंकि पिछले कुछ सालों में भारत और अमेरिका के रिश्ते पहले से ज्यादा प्रगाढ़ हुए हैं। भारत भी अमेरिकी उत्पादों पर प्रतिक्रिया स्वरूप ड्यूटी लगा सकता है पर इससे क्रिया-प्रतिक्रिया चलती रहेगी। ट्रंप अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारी दबाव में हैं, जिन्हें नियंत्रण स्तर पर अपने वर्चस्व खोने और स्थानीय हस्तक्षेप की चिंता सताए जा रही हैं।  

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