समुद्री जीवों पर आई विपत्ति के बारे में भी सोचें

By Independent Mail | Last Updated: Apr 8 2019 12:15AM
समुद्री जीवों पर आई विपत्ति के बारे में भी सोचें

चंद्रभूषण

अगर आप अपने इर्द-गिर्द पर्यावरण ध्वंस से परेशान हैं तो जरा समुद्री जीवों पर आई विपत्ति के बारे में भी सोचें। टेक्नॉलजी ने जलजीवों के शिकार की क्षमता बहुत बढ़ा दी है और गहरे समुद्रों में जैविक विध्वंस पर नजर रखने को कोई सरकार भी नहीं है। ऊपर से ग्लोबल वॉर्मिंग ने विशाल समुद्री इलाकों की ऑक्सीजन चूसकर उन्हें बंजर बना दिया है। समुद्री जीव वहां रहना तो दूर उधर से गुजरने में भी डरते हैं। इन बुरी खबरों के बीच अकेली अच्छी खबर यह है कि लगातार घटती समुद्री पकड़ ने सरकारों को जता दिया है कि किस्सा यूं ही चला तो अगले 10- 20 वर्षों में ह्वेलिंग के अलावा समुद्रों से मछली, केकड़ा, झींगा पकड़ने के कारोबारों पर भी ताला पड़ जाएगा। इससे कई छोटी अर्थव्यवस्थाएं तबाह होंगी और मानव जाति प्रोटीन के सबसे बड़े स्रोत से वंचित हो जाएगी। पर्यावरण पर इसका क्या असर पड़ेगा, कोई नहीं जानता? इन आशंकाओं के मद्देनजर तीन वैज्ञानिक समूहों ने ग्रीनपीस, प्यू ट्रस्ट और नेशनल ज्योग्राफिक की परियोजनाओं के तहत सारे समुद्रों का सर्वे किया और अभी अपनी रिपोर्टें संयुक्त राष्ट्र के सामने पेश करने की तैयारी में हैं। इन रिपोर्टों में समुद्री सतह के नीचे मौजूद सारे पर्वतों, गर्तों और गर्म पानी के स्रोतों के ब्यौरे शामिल हैं और यह जिक्र भी है कि किस जीवजाति के सर्वाइवल के लिए कौन सा इलाका ज्यादा महत्वपूर्ण है। वैज्ञानिकों का कहना है कि एक वैश्विक संधि के जरिए अगर 40 फीसद गहरे समुद्रों में शिकार और उत्खनन पर रोक लगाई जा सके तो 30 फीसद समुद्री जीव-जातियों की निरंतरता सुनिश्चित की जा सकेगी। लेकिन इंसान द्वारा समुद्र में लगातार किए जा रहे अतिक्रमण और गंदगी से कई समुद्री जीवों का जीवन अब लगभग खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है। यदि विश्व के सभी देशों द्वारा जल्द ही इस गंभीर मुद्दे पर विचार-विमर्श कर कोई हल नहीं निकाला गया तो समुद्री जीवों की कई जातियां ऐसे गुम हो जाएंगी, जैसे वह कभी थी ही नहीं। यह एक गंभीर मुद्दा है और इस पर जल्द से जल्द विचार-विमर्श किया जाना चाहिए।

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