अपराध की जांच के लिए हो अलग प्रकोष्ठ

By Independent Mail | Last Updated: Mar 14 2019 1:16AM
अपराध की जांच के लिए हो अलग प्रकोष्ठ

अनूप भटनागर

देश की शीर्ष अदालत ने महाराष्ट्र के जालना शहर में करीब 16 साल पहले पांच व्यक्तियों की हत्या और एक महिला से बलात्कार के अपराध में मौत की सजा का सामना कर रहे महाराष्ट्र के छह व्यक्तियों को पिछले सप्ताह बरी करते हुए उनके पुनर्वास के लिए उन्हें पांच-पांच लाख रुपये मुआवजा देने का फैसला सुनाया। न्यायालय के इस फैसले ने एक बार फिर इस तथ्य को इंगित किया है कि अब हर स्तर पर पुलिस में कानून व्यवस्था और अपराधों की जांच के लिए अलग-अलग प्रकोष्ठ आवश्यक है। न्यायालय ने पाया कि वास्तव में इस अपराध में इन व्यक्तियों की कोई भूमिका थी ही नहीं और पुलिस ने वास्तविक अपराधियों की बजाय निर्दोष लोगों को फंसा दिया। ये व्यक्ति 16 साल से जेल में बंद थे। ऐसे अनेक मामले सामने आये हैं, जिनमें अदालत ने पाया है कि जांच एजेन्सियों ने अपनी लचर कार्यशैली की वजह से निर्दोष व्यक्तियों को आरोपी बनाकर जेल में डाल दिया। फिर मुकदमे की सुनवाई के दौरान जांच एजेन्सियों की दोषपूर्ण कार्यशैली की कलई खुली। यह भी दिलचस्प है कि इस मामले में शीर्ष अदालत ने अपने ही करीब एक दशक पुराने फैसले पर पुनर्विचार के दौरान यह पाया कि जांच एजेन्सी और अभियोजन ने सही तरीके से अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं किया। न्यायालय ने इस मामले में तीन दोषियों की इस अपील पर सुनवाई करने का निश्चय किया था कि शीर्ष अदालत ने 30 अप्रैल, 2009 को तीन अन्य दोषियों की मौत की सजा बरकरार रखते वक्त उनका पक्ष सुना ही नहीं। न्यायालय ने तीन दोषियों की अपील खारिज करने संबंधी अप्रैल 2009 का फैसला वापस लेकर सारे मामले पर पुनर्विचार करने का निश्चय किया क्योंकि इस अपराध के साक्ष्य एक ही थे।

इनकी अपील पर पुनर्विचार के दौरान न्यायालय ने पाया कि पुलिस ने उन चार व्यक्तियों को कानून की पकड़ से बच निकलने दिया, जिनकी पहचान इस वारदात में जीवित बची महिला ने 2003 में ही की थी। न्यायालय ने कहा कि ऐसा सिर्फ सही तरीके से जांच नहीं करने की वजह से हुआ। अब न्यायालय ने वारदात की चश्मदीद गवाह द्वारा पहचाने गये चार खतरनाक अपराधियों के मामले में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173 (8) के तहत आगे जांच के निर्देश दिये हैं ताकि वास्तविक अपराधियों को सजा दिलायी जा सके। शीर्ष अदालत ने गैरजिम्मेदाराना तरीके से जांच और असल अपराधियों को बचकर निकलने के लिये पुलिस को कड़ी फटकार ही नहीं लगाई बल्कि राज्य के मुख्य सचिव को इस मामले में अभी भी सेवा में कार्यरत अधिकारियों के खिलाफ तीन महीने के भीतर विभागीय कार्रवाई के भी आदेश दिये हैं। यह पहला मौका नहीं है जब न्यायालय ने संगीन से संगीन अपराध की जांच में खामियों के लिये पुलिस और जांच एजेन्सियों को फटकार लगायी है।

शीर्ष अदालत का यह निर्णय एक बार फिर पुलिस विभाग में कानून व्यवस्था और अपराधों की जांच के लिये अलग-अलग प्रकोष्ठ की आवश्यकता को इंगित करता है। उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह की जनहित याचिका पर शीर्ष अदालत ने 22 सितंबर, 2006 को पुलिस व्यवस्था में सुधार के बारे में अनेक महत्वपूर्ण निर्देश दिये थे। न्यायमूर्ति वाई. के. सभरवाल, न्यायमूर्ति सी. के. ठक्कर और न्यायमूर्ति पी. के. बालासुब्रमण्यन की पीठ ने केन्द्र और सभी राज्यों को पुलिस सुधार के बारे में अनेक निर्देश दिये थे, जिनमें कानून व्यवस्था और अपराधों की जांच के लिये अलग-अलग प्रकोष्ठ बनाना भी शामिल था। न्यायालय ने कहा था कि किसी भी अपराध की तत्परता और दक्षता के साथ जांच सुनिश्चित करने के लिये अपराध की जांच करने वाली पुलिस को कानून व्यवस्था का काम देखने वाली पुलिस से अलग करना होगा लेकिन इसके बावजूद दोनों प्रकोष्ठों के बीच पूरा समन्वय बनाये रखने की आवश्यकता होगी। न्यायालय ने कहा था कि शुरू में दस लाख या इससे अधिक की आबादी वाले शहरों में पुलिस के कानून व्यवस्था और अपराध की जांच के प्रकोष्ठ को अलग-अलग किया जाये और धीरे-धीरे यह व्यवस्था छोटे शहरों और कस्बों में भी लागू की जाये। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है राज्य सरकारें किसी न किसी बहाने से इन पर पूरी तरह अमल नहीं कर रही हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि अक्सर पुलिस और जांच एजेन्सियों की जांच में अदालतों को खामियां मिलती हैं। इस तरह के मामलों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर जरूरी है कि पुलिस की जांच प्रकोष्ठ में शामिल कार्मिकों और अधिकारियों को उनकी अपनी जिम्मेदारियों के साथ ही नागरिकों के अधिकारों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाया जाए।

  • वरिष्ठ पत्रकार
image
Copyrights @ 2017 Independent NewsCorp (P) Ltd., Bhopal. All Right Reserved