टूट रही है किम जोंग की खतरनाक खामोशी

By Independent Mail | Last Updated: Jan 10 2019 4:03PM
टूट रही है किम जोंग की खतरनाक खामोशी

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में नॉन-जीरो-सम-गेम का एक सिद्धांत होता है। इस खेल में खिलाड़ी साथ-साथ जीत सकते हैं और साथ-साथ पराजित भी हो सकते हैं। अत: एक की विजय और दूसरे की पराजय बिल्कुल नहीं होती। ट्रम्प और किम जोंग-उन इस गेम के दो माहिर खिलाड़ी हैं जो अपने हितों की रक्षा के लिए किसी भी समय साथ-साथ या आमने-सामने नजर आ सकते हैं। ये दोनों राष्ट्राध्यक्ष युद्ध और अर्थव्यवस्था के समन्वय को बनाए रखना भी बखूबी जानते हैं। हालांकि परिस्थितयां किम जोंग-उन के लिए ज्यादा प्रतिकूल हैं, इसलिए वह बिना युद्ध की विभीषिका के मनोवैज्ञानिक युद्धकला के जरिये सबकुछ हासिल करने को ज्यादा तत्पर दिखाई देते हैं। दरअसल, किम जोंग-उन ने नए साल के देश के नाम प्रथम संबोधन में अमेरिका को चेताया है कि अगर वह उनके देश पर अपने प्रतिबंध बरकरार रखता है, तो उनका इरादा बदल भी सकता है। किम और डोनाल्ड ट्रंप ने जून 2018 में परमाणु हथियार नष्ट करने को लेकर मुलाकात की थी, लेकिन इसके अपेक्षित परिणाम उत्तर कोरिया के पक्ष में न आने से उत्तेजित होकर किम ने ताजा धमकी दी है। अब तक यह देखा गया है कि किम जोंग-उन युद्ध कला का वह माहिर खिलाड़ी है, जो परमाणु हथियारों से उत्पन्न मनोवैज्ञानिक हिंसा की बदौलत महाशक्तियों को नतमस्तक कर देता है। इसके पहले पिछले साल उन्होंने परमाणु परीक्षण न करने की घोषणा कर दुनिया को चौंका दिया था। तानाशाह के पागलपन से पस्त दुनिया के लिए यह खबर बेहद सुकून देने वाली मानी जा रही थी और प्रतिद्वंदी अमेरिका ने भी इस समाचार का स्वागत किया था। ट्रम्प ने ट्विटर पर उत्तर कोरिया और दुनिया के लिए इसे बहुत ही अच्छी खबर बताया था।

इन सबके बीच इतिहास रहा है कि उत्तर कोरिया की शांति की कोशिशें महज कुछ समय का कूटनीतिक युद्ध विराम होती हैं और इस बेलगाम देश की असामान्य नीतियों को देखते हुए इससे ज्यादा उम्मीदें की भी नहीं जा सकतीं। इस समय उत्तर कोरिया कड़े प्रतिबंधों से गुजर रहा है। नवम्बर 2017 में प्योंगयांग ने अंतरमहाद्वीपीय बैलेस्टिक मिसाइल का परीक्षण कर दुनिया को ठेंगा दिखाने की कोशिश की थी, जिसके जवाब में संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद ने उत्तर कोरिया की पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति पर कड़े प्रतिबन्ध लगाए थे। इन प्रतिबंधों में खास तौर पर पेट्रोलियम पदार्थों को शामिल किया गया था। ऐसा माना जाता है कि उत्तर कोरिया अधिकांश पेट्रोलियम पदार्थों का इस्तेमाल अपने अवैध परमाणु और बैलेस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को पूरा करने के लिए करता है। इस समय पेट्रोल और डीजल की प्रतिबन्धात्मक कटौती से यह देश संकट में है। दक्षिण कोरिया के एक राजनयिक ने साल 2017 में दावा किया था कि उत्तर कोरियाई नागरिक पहले से ही आर्थिक बदहाली में जी रहे हैं। सड़कों से कारें कम हो गई हैं, जहां तक हो सके कम ईंधन से काम चलाया जा रहा है, जरूरत के सामानों में लगातार कमी आती जा रही है। यहीं नहीं, अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए की वेबसाइट पर अनुमान लगाया गया है कि उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था करीब 40 अरब डॉलर की है। यह करीब उतनी ही बड़ी अर्थव्यवस्था है जितनी की होंडुरास जैसे छोटे और पिछड़े देश की। जिन चीजों का निर्यात उत्तर कोरिया करता है, उनमें खनिज, धातुओं से बने सामान, युद्ध का साजो-सामान, कपड़े, कृषि उत्पाद और मछलियां शामिल हैं। अर्थव्यवस्था के मामलें में रवांडा और हैती जैसे गरीब देशों की बराबरी पर आने वाला उत्तर कोरिया दुनिया के 230 देशों की सूची में 208 वें नंबर पर है। गरीब देशों की अर्थव्यवस्था वाला यह देश परमाणु कार्यक्रम का खर्च उठाकर आर्थिक रूप से पस्त हो चुका है।

इन सबके बीच उत्तर कोरिया की साम्यवादी स्थिति को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वास्तव में किम जोंग-उन चीन और रूस के इशारों पर चलने वाला ऐसा तानाशाह है, जिसके जरिये साम्यवादी शक्तियां अपने हितों का भरपूर संवर्द्धन करती हैं। उत्तर कोरिया का यह तानाशाह हिटलर की विदेश नीति पर चलता है, जिसके अनुसार यदि अपनी पसंद के अनुसार समझौता न हो सके, तो युद्ध का सहारा लेना चाहिए। दूसरी और साम्यवाद से जो बच सकता है, उसे बचाओ का अमेरिकी सिद्धांत उत्तर कोरिया के मामलें में पस्त है। इस हालात में चीन की भूमिका बेहद कुटिल और खतरनाक है। वह बड़ी चालाकी से एशिया प्रशांत क्षेत्र के अपने विरोधियों को धमकाने के लिए उत्तर कोरिया को सामने कर रहा है। इसलिए उसने उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षण और बेलेस्टिक मिसाइलों से हमले की धमकी के बाद भी उसे संयुक्त राष्ट्र या अमेरिका के किसी सैन्य आक्रमण से लगातार बचाए रखा है। युद्धोन्माद की कूटनीति के बाद उत्तर कोरिया की शांति की नीति के पीछे अर्थव्यवस्था सुधारने की मजबूरी ही है। आर्थिक बदहाली से त्रस्त लोगों के जीवन स्तर को सुधारने और आम जनता की नाराजगी दूर करने के लिए किम जोंग-उन ने पहले बातचीत का दांव खेला और अब उससे मुकरने को धमका भी रहा है। उसकी अर्थव्यवस्था चीन और रूस की सहायता से समुद्र में होने वाली तस्करी से चल रही है।कोरियाई प्रायद्वीप में समुद्र के रास्ते तस्करी करने की भौगोलिक संभावनाएं उत्तर कोरिया के लिए मुफीद हैं। इसके पश्चिम में पीला सागर है, पूर्वी चीन सागर दक्षिण में है और जापान सागर इसके पूर्व में है। अंतर्राष्ट्रीय नजरों से बचकर समुद्री रास्तों से ही उत्तर कोरिया के हितों की पूर्ति हो जाए, इसके लिए उसने अपने द्वीपों को भी विकसित कर लिया है। उत्तर कोरिया की हथियारों की तस्करी में संलिप्तता के साथ दुनिया को यह नहीं भूलना चाहिए की वह शांति के करार करने और उन्हें तोड़ने का माहिर खिलाड़ी है। इस देश में 1990 के दशक में भारी अकाल आया था, तो उससे उबरने के लिए उसने विश्व के साथ सहयोग का दिखावा किया था। इसके अंतर्गत 1994 में परमाणु हथियारों के परीक्षण रोकने के लिए अमेरिका के साथ समझौता किया था और 1999 में मिसाइल टेस्टिंग प्रतिबंध पर उसने सहमति भी जताई थी। लेकिन परिस्थितियां मुफीद होते ही 2006 में उसने समझौता तोड़ दिया। इस बार उत्तर कोरिया का सामना अमेरिका के उस राष्ट्रपति से है जो अपनी सनक से दुनिया को हैरान किए हुए है। ट्रम्प ने बड़ी चालाकी से पिछले साल किम की पीठ थपथपाते हुए शांति का पाठ भी पढ़ा दिया और प्रतिबंधों को भी बरकरार रखा। लेकिन किम बिना आर्थिक लाभ के अपने परमाणु परीक्षण को ज्यादा समय तक बंद रखे, इसकी संभावना कम ही नजर आती है। अपनी व्यापारिक और सामरिक नीतियों के कारण चीन इस समय अमेरिका के निशाने पर है। इसके साथ ही चीन और रूस के मजबूत होते रिश्तों का प्रभाव अमेरिका और उत्तर कोरिया के कमजोर संबंधों पर भी पड़ेगा। जाहिर है, अमेरिका पर दबाव डालने के लिए किम जोंग-उन किसी भी समय साम्यवाद का मजबूत हथियार बन सकता है और बेलगाम उत्तर कोरिया का मतलब दुनिया की बर्बादी है।

डॉ. ब्रह्मदीप अलूने, शिक्षाविद्

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