मायावती की मूर्तियों पर कोर्ट की टिप्पणी उचित

By Independent Mail | Last Updated: Feb 10 2019 11:04PM
मायावती की मूर्तियों पर कोर्ट की टिप्पणी उचित

प्रमोद भार्गव

सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की पीठ ने नेताओं को एक अहम नसीहत दी है। बसपा अध्यक्ष मायावती ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए अपने दल के चुनाव निशान हाथी, डॉ. अंबेडकर, कांशीराम और स्वयं की आदमकद प्रतिमाएं नोएडा एवं लखनऊ के उद्यानों में लगवाई थीं, जिन पर 685 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। इस फिजूलखर्ची के खिलाफ 10 साल पहले जनहित याचिका दायर की गई थी, जिस पर अब सुनवाई प्रारंभ करते हुए कोर्ट ने कहा है कि हम इस बात पर विचार कर रहे हैं कि मायावती मूर्तियों के खर्च का भुगतान अपनी जेब से करें। याचिका की अंतिम सुनवाई दो अप्रैल को होगी। यह याचिका 2009 में वकील रविकांत ने दायर की थी। न्यायालय अंतिम सुनवाई में यदि प्रतिमाओं पर खर्च किया गया धन मायावती या उनके दल से वसूलने का फैसला दे देता है, तो यह नेताओं के लिए एक सबक होगा।

हालांकि, बसपा ही नहीं, सभी राजनीतिक दल अपने नायकों की मूर्तियां लगाने की होड़ में लगे रहते हैं। सामंती घरानों के जो लोग राजनीति में आए हैं, वे अपने उन पूर्वजों की मूर्तियां भी सार्वजनिक स्थलों पर लगवाते हैं, जिनका आजादी की लड़ाई में कोई योगदान नहीं था। यही नहीं, उन्होंने अंग्रेजों को सरंक्षण दिया और क्रांतिकारियों के विरुद्ध लड़ाई में सेना सहित शामिल हुए। यह बुराई सभी दलों में है। आजादी के बाद से ही महान नेताओं के स्मारक बनाने की शुरुआत हुई। सरकारों ने महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, लाला लाजपत राय, भीमराव अंबेडकर, लाल बहादुर शास्त्री, भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद की मूर्तियां लगवाईं। दक्षिण भारत में तो नेताओं ने अपने जीवित रहते हुए ही मूर्तियां लगवाने का सिलसिला प्रारंभ कर दिया था। इसमें सबसे आगे तमिलनाडु के द्रविड़ दल रहे। के. कामराज ने स्वयं अपनी मूर्ति स्थापित कराई थी। शायद उन्हीं से प्रेरणा लेकर मायावती ने अपनी मूर्तियां लगवाईं। जिन पर विवाद है, उनमें मायावती की मूर्तियां ही प्रमुख हैं। अपने शासनकाल में मायावती दलित हितों से दूर भागीं और मूर्तियां लगवाने में जुटी रहीं। दरअसल, वह दलितों को मानसिक रूप से चैतन्य और आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की जगह इस कोशिश में लगी रही थीं कि उत्तर प्रदेश के 22 फीसद दलितों को अपने पाले में कैसे रखा जाए। वैसे भी जिस तरह से उन्होंने अंबेडकर, कांशीराम और खुद की मूर्तियां लगाकर प्रतीक गढ़ने की जो कवायद की थी, हकीकत में ऐसी ही कोशिशें दलितों को कमजोर बनाती हैं। मूर्तियों पर खर्च की गई 685 करोड़ की धनराशि को यदि बुंदेलखंड की गरीबी दूर करने पर खर्च किया जाता, तो खेती-किसानी की माली हालत में निखार आता और किसान आत्महत्या के अभिशाप से बचते। मायावती की कार्यप्रणाली में न तो कभी अंबेडकर का दर्शन दिखाई दिया और न ही कांशीराम का।

प्रतीक पूजा के लिए गढ़ी गई प्रस्तर शिलाओं ने मानवता को अपाहिज बनाने का ही काम किया है। जब किसी व्यक्ति की निजी महत्वाकांक्षा सामाजिक सरोकारों से बड़ी हो जाती है, तो उसकी दिशा बदल जाती है। जब इंसान ईश्वर की खोज करते-करते हार जाता है, तो वह एक मूर्ति गढ़कर उसी को ईश्वर मानने लगता है, जबकि यथार्थबाद से पलायन प्रतीकवाद की ओर ले जाता है। मायावती भी इसी स्थिति की शिकार हो गई थीं। अंबेडकर के समाजवादी आंदोलन को यदि सबसे ज्यादा किसी ने हानि पहुंचाई है, तो वह बुद्धवाद है। जिस तरह से बुद्ध ने सांमतवाद से संघर्ष कर रहे अंगुलिमाल से हथियार डलवाकर राजसत्ता के विरूद्ध जारी जंग को खत्म करवा दिया था, उसी तर्ज पर दलितों के बुद्धवाद ने व्यवस्था के खिलाफ समूची लड़ाई को कमजोर कर दिया। बीएसपी को वजूद में लाने से पहले कांशीराम ने लंबे समय तक दलितों के हितों की मुहिम डीएस-4 के माध्यम से चलाई थी। इस डीएस-4 का सांगठनिक ढांचा खड़ा करने के वक्त बसपा की बुनियाद पड़ी और पूरे हिंदी क्षेत्र में उसकी संरचना तैयार किए जाने की कोशिशें प्रारंभ हुईं। कांशीराम के वैचारिक दर्शन में अंबेडकर से आगे जाने की सोच तो थी ही, दलित और वंचितों को करिश्माई अंदाज में लुभाने की प्रभावशाली शक्ति भी थी। यही कारण रहा कि बसपा दलित संगठन के रूप में सामने आई, लेकिन मायावती की पद-लोलुपता ने बसपा में विभिन्न प्रयोगों का तड़का लगाकर उसके बुनियादी सिद्धांतों के साथ खिलवाड़ किया। इसीलिए आज की बसपा सवर्ण और दलित तथा शोषक और शोषितों का बेमेल गठजोड़ है। बसपा के इस संस्करण से सांगठनिक संरचना नदारद है। प्रधानमंत्री पद की प्रतिस्पर्धा मायावती के लिए इतनी महत्वपूर्ण हो गई है कि वह उन नीतियों को भी तवज्जो नहीं देतीं, जो सामाजिक, शैक्षिक व आर्थिक विषमताएं दूर कर सकती हैं।

सवर्ण नेतृत्व को दरकिनार कर पिछड़ा और दलित नेतृत्व दो दशक पहले इस आधार पर उभरा था कि पिछले कई दशकों से केंद्र व राज्यों में काबिज रही कांग्रेस ने न तो सबके लिए शिक्षा, रोजगार और न्याय के अवसर उपलब्ध कराए और न ही सांमतवादी व जातिवादी संरचना को तोड़ा। इसीलिए सामाजिक व आर्थिक विषमता का दायरा आजादी के बाद और विस्तृत होता चला गया। अब जरूरी यह था कि पिछड़े, आदिवासी व दलित राजनीति व प्रशासन की मुख्यधारा में आएं और जड़ताओं को तोड़ें, अस्पृश्यता व अंधविश्वासों के खिलाफ लड़ें। लेकिन दलित और पिछड़ा नेतृत्व यह जरूरी काम कर नहीं पाया।

बहरहाल, मूर्तियों में जो धन खर्च किया जाता है, वह आम जनता की कमाई का होता है। इसलिए सरकार किसी भी दल या नेता की हो, उसका दायित्व बनता है कि वह इस धन को विकास पर खर्च करे। मगर ऐसा कम ही देखने में आता है। ज्यादातर दल सरकार में आने के बाद या तो इस धन को विरासत संवारने के बहाने अपने नायकों के स्मारक स्थल बनाने में खर्च करते हैं अथवा सरकारी कर्मचारियों व स्वयं के वेतन-भत्ते बढ़ाने में। 'सबका साथ, सबका विकास' के बहाने अपने दल और नेता की छवि चमकाने के लिए प्रचार-प्रसार में भी यह फिजूलखर्ची खूब की गई है। यदि नेता वाकई संवैधानिक दायित्व का निर्वाह करना चाहते हैं, तो उन्हें सरकारी धन का दुरुपयोग बंद करना होगा। प्रत्येक सरकार की प्राथमिकता में वह वंचित आदमी होना चाहिए, जो विकास से दूर अंतिम छोर पर खड़ा है। यदि मूर्तियां लगाया जाना जरूरी लगता भी है, तो यह धन निजी या दल के खजाने से खर्च किया जाना चाहिए। जबकि वे नेता भी विधायक और सांसद-निधियों से अपने पूर्वजों की मूर्तियां लगवा रहे हैं, जो निर्वाचन प्रक्रिया के दौरान अपने पास अरबों की दौलत होने की घोषणा करते हैं। संभव है कि अदालत की टिप्पणी के बाद ये नेता सुधर जाएं।

  • वरिष्ठ पत्रकार
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