किसान के चेहरे पर लहलहाती फसल भी नहीं ला पाती मुस्कान

By Independent Mail | Last Updated: Dec 6 2018 2:37PM
किसान के चेहरे पर लहलहाती फसल भी नहीं ला पाती मुस्कान

पंकज चतुर्वेदी

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में किसानों ने अपना आलू सड़क पर फेंक दिया। उसे लोगों ने लूटा, जानवरों ने खाया, फिर भी चारों ओर आलू पड़ा है। असल में नए आलू की अच्छी फसल हुई है, जबकि अकेले बाराबंकी जिले के कोल्ड स्टोरेज में 30 हजार बोरा आलू पिछले साल का रखा हुआ है। बाजार में नया आलू 150 से 200 रुपये क्विंटल यानी डेढ़-दो रुपये किलो बिक रहा है, जबकि कोल्ड स्टोरेज से माल निकालकर केवल परिवहन करने का व्यय तीन सौ रुपये क्विंटल पड़ रहा है। किसान मांग कर रहे हैं कि आलू की खरीदी का समर्थन मूल्य कम से कम 487 रुपये हो। उधर, रही-सही कसर तब पूरी हो गई, जब पंजाब से आलू की खेप उत्तर प्रदेश के अलावा दिल्ली जैसे इलाकों में आने लगी। इसके बाद किसान को आलू के इतने दाम भी नहीं मिल रहे हैं, जिससे फसल को खेत से मंडी तक लाने की लागत भी पूरी हो।

बता दें कि किसान 50-55 किलो आलू की एक बोरी बनाता है। इसे कोल्ड स्टोर में रखने का किराया 90 से 110 रुपया तक होता है। खाली बोरी 17 या 18 रुपये में मिलती है। सुतली, पल्लेदारी, ट्रैक्टर का किराया आदि मिलाकर 25 रुपये और खर्च होते हैं। अभी व्यापारी एक बोरी आलू 80 से 90 रुपये में खरीद रहे हैं। इससे कोल्ड स्टोर का किराया ही नहीं निकल रहा है। किराए की बची रकम और बोरी के दाम के साथ मालिकों से लिया गया लोन किसानों पर चढ़ा हुआ है। इस तरह आलू की आर्थिकी किसान को घाटे में डालने के साथ कर्ज को बढ़ाने वाली बन चुकी है। मध्य प्रदेश के नीमच में यही हाल प्याज का हो रहा है। गत दो सप्ताह से वहां मंडी में कई ढेरियां की तो नीलामी ही नहीं हो पा रही हैं। अब मंडी में माल खरीदी के इंतजार के लिए दो-तीन दिन शहर में ठहरना किसान को महंगा पड़ रहा है। दिसंबर महीने के पहले दिन जब सामान्य प्याज की कीमत पचास पैसे किलो मिली, तो किसान अपना माल वैसा ही मंडी में छोड़कर चला गया। रतलाम जिले की सैलाना मंडी में प्याज, लहसुन और मटर की इतनी आवक हुई कि न तो खरीदार मिले और न ही मंडी में माल रखने की जगह। राजस्थान के झालावाड़ में लहसुन का उत्पादन कोई 27 हजार एकड़ में होता है। वहां फसल तो बहुत बढ़िया हुई, लेकिन माल को इतने कम दामों पर खरीदा जा रहा है कि लहसुन के झार से ज्यादा आंसू उसके दाम सुनकर आ रहे हैं।

महाराष्ट्र के अहमदनगर के सकूरी गांव के किसान राजेंद्र बावाके ने तो अपने हाथों से अपने खेत में लगी बैंगन की फसल उखाड़ फेंकी, जब उन्हें दो लाख लागत व दिन-रात मेहनत के बाद उगाए गए बैंगन के दाम महज 65 हजार रुपये मिले। नासिक के एक किसान ने तो 750 किलो प्याज महज 1064 रुपये में बिकने से हताश होकर यह रकम प्रधनमंत्री राहत कोष में भेज दी। यही हाल इन दिनों पूरे देशमें है, कहीं टमाटर तो कहीं मिर्ची की शानदार फसल लागत भी निकाल पा रही है। वहीं दिल्ली-मुंबई तो ठीक ही हैं, भोपाल, जबलपुर, कानपुर, जैसे शहरों में ये सब्जियां मंडी की खरीदी के दाम से चार सौ गुना तक दाम में उपभोक्ताओं को मिल रही हैं।

भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 31.8 प्रतिशत खेती-बाड़ी में तल्लीन कोई 64 फीसद लोगों के पसीने से पैदा होता है। दुखद है कि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सुधारों को भी लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर किसान के श्रम की सुरक्षा पर कभी गंभीरता से सोचा ही नहीं गया। फसल बीमा की कई योजनाएं बनीं, उनका प्रचार हुआ, पर हकीकत में किसान यथावत ठगा जाता रहा, कभी नकली दवा या खाद के फेर में तो कभी मौसम के हाथों। किसान आढ़तियों और बिचौलियों के हाथों लुटता रहता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में कभी टमाटर तो कभी अंगूर, कभी मूंगफली तो कभी गोभी किसानों को इसी तरह हताश करती है। राजस्थान के सिरोही जिले में जब टमाटर मारा-मारा घूमता है, तब वहां से कुछ किलोमीटर दूर गुजरात में लाल टमाटर के दाम ग्राहकों को लाल किए रहते हैं। जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश का किसान आलू सड़क पर फेंकता, तब वहां से कुछ ही दूर दिल्ली में आलू के दाम आसमान पर होते हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के कोई दर्जनभर जिलों में गन्ने की खड़ी फसल जलाने की घटनांए हर दूसरे-तीसरे साल होती रहती हैं। जब गन्ने की पैदावार उम्दा होती है, तब शुगर मिलें या तो गन्ना खरीद पर रोक लगा देती हैं या फिर दाम बहुत नीचा देती हैं, वह भी उधारी पर। ऐसे में गन्ना काटकर खरीदी केंद्र तक ढोकर ले जाना, फिर घूस देकर पर्चा बनवाना और उसके बाद भुगतान के लिए दो-तीन साल चक्कर लगाना किसान को घाटे का सौदा दिखता है। अतः वह खड़ी फसल जलाकर अपने ही सपनों को आग लगा देता है।

संकर बीज, खाद-दवा बेचने वाली कंपनियां शानदार फसल का लोभ दिखाकर अपने उत्पाद किसान को बेच देती हैं। चूंकि किसान को प्रबंधन की सलाह देने वाला कोई होता नहीं, सो वे प्रचार के फेर में फंसकर एक सरीखी फसल उगा लेते हैं। वे न तो अपने गोदाम में रखे माल को बेचना जानते हैं और न ही मंडिया उनके हितों की संरक्षक होती हैं। इससे लहलहाती फसल भी किसान के चेहरे पर मुस्कान नहीं ला पाती। दरअसल, देश में कृषि उपजों के न्यूनतम मूल्य, उत्पाद खरीदी, बिचौलियों की भूमिका, किसान को भंडारण का हक, फसल-प्रबंधन जैसे मुद्दे गौण दिखते हैं। आज जरूरत है कि खेतों में कौन सी फसल और वह कितनी उगाई जाए, पैदा फसल और श्रम के सही मूल्यांकन की नीतियां तालुका या जनपद स्तर पर ही बनें। कोल्ड स्टोरेज या वेअर हाउस पर किसानों का कब्जा हो, साथ ही प्रसंस्करण के कारखाने छोटी-छोटी जगहों पर लगें, तो ही किसानों का भला होगा। इसके साथ ही उपजों को न्यूनतम मूल्य पर खरीदकर उन्हें राशन की दुकानों या मिड-डे मील या आपदा वाले इलाकों में तत्काल भेजने की व्यवस्था भी होनी चाहिए। नष्ट होती फसल केवल पैसे का अपव्यय ही नहीं है, यह श्रम, प्रकृति और देश में हर दिन भूखे सो रहे लाखों लोगों का भी अपमान है।

वरिष्ठ स्तंभकार

image
Copyrights @ 2017 Independent NewsCorp (P) Ltd., Bhopal. All Right Reserved