सोशल मीडिया को न बनने दें अफवाह तंत्र

By Independent Mail | Last Updated: Jan 4 2019 1:20PM
सोशल मीडिया को न बनने दें अफवाह तंत्र

अभिषेक कुमार सिंह, साइबर एक्सपर्ट, दूसरा लेख

बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता कादर खान आखिर चले गए। लेकिन नए साल के पहले दिन ही उनके निधन की अफवाह फैल गई थी। लिहाजा उनके बेटे को साफ करना पड़ा था कि कादर खान बीमार हैं और अस्पताल में भर्ती जरूर हैं, लेकिन वह जीवित हैं। इस बार भले ही अफवाह एक सच में बदल गई हो, लेकिन कादर खान की मौत की फर्जी खबरें पहले भी कई बार आईं। फरवरी 2014, मार्च-अप्रैल 2016, मई 2017 और अप्रैल 2018 में भी उनके नहीं रहने की अफवाह सोशल मीडिया के रास्ते पूरे सूचना-तंत्र में फैल गई थी। इन अफवाहों से परेशान होकर खुद कादर खान को कहना पड़ा था कि वह जिंदा हैं। सिर्फ कादर खान ही नहीं, कई अभिनेताओं-कलाकारों और चर्चित व्यक्तियों के बारे में भी ऐसी अफवाहें अनगिनत बार फैल चुकी हैं।

हस्तियों के निधन से ज्यादा गंभीर वे अफवाहें हैं, जो देश के सांप्रदायिक माहौल से लेकर अर्थव्यवस्था तक को बिगाड़ती हैं। यही कारण है कि सरकार अब अफवाहों को लेकर गंभीर हुई है और उसने सोशल मीडिया कंपनियों को सख्त हिदायत देकर अफवाहें रोकने का तंत्र बनाने को कहा है। बहरहाल, आज के दौर में कुछ झूठ तमाम तरीकों से इतनी बार दोहराए जाते हैं कि वे सच लगने लगते हैं। कई मर्तबा इनके कारण दंगे-फसादों की नौबत तक आ जाती है। कुल मिलाकर देश में अफवाहों का डिजिटलीकरण एक नई समस्या बनकर उठ खड़ा हुआ है। समस्या ऐसे सोशल मंचों पर झूठ के दोहराव की है, जो असत्य को भी सच बनाकर पेश कर डालता है। खास तौर पर सांप्रदायिक मामलों में तो अफवाहों की तासीर कुछ ज्यादा ही गर्म रहती है। एक धर्म के कुछ अराजक लोग दूसरे मजहब के लोगों के बारे में कोई मनगढ़ंत, लेकिन तन-मन में आग लगाने वाली बात सोशल मीडिया के जरिये फैला देते हैं, जिससे देखते ही देखते अमन-चैन को पलीता लग जाता है। सवाल यह है कि आखिर हमारा समाज अफवाहों को लेकर इतना असंवेदनशील क्यों हो गया है और इनकी रोकथाम की कोशिशें कारगर साबित नहीं हो रही हैं? जब से आम लोगों को सोशल मीडिया जैसा शानदार जरिया मिला है, जिस पर जब चाहें, जैसी चाहें कोई सूचना, तस्वीर या वीडियो अपने समूह से लेकर दुनिया के किसी भी कोने तक पहुंचा सकते हैं, सनसनी क्रिएट करने की चाहत निचले स्तर तक पहुंच गई है। वैसे तो खबर देने का काम पत्रकारों का होता है। चौबीसों घंटे चलने वाले मीडिया पर खबरें ब्रेक करने का जो दबाव होता है, वह भी कई बार मीडिया के लोगों को सोशल मीडिया जैसे सूचना स्रोतों की तरफ ले जाता है। चूंकि सोशल मीडिया का चरित्र ही ऐसा है कि वह तेज होता है, असावधान होता है, अक्सर सही नहीं होता और बहुत खराब समझ पर खड़ा होता है, इसलिए कई बार प्रसारित कर दी गई कोई खबर अंतत: आधारहीन साबित हो जाती है। लेकिन ट्विटर, व्हाट्सऐप जैसी चीजों ने तो आम लोगों को भी खबरें ब्रेक करने का मंच मुहैया करा दिया है। ऐसी जगह उन्हें ऐसा करने से या तो खुद उनकी समझ-जागरूकता रोक सकती है या फिर कानून। कोई फर्जी टेलीफोन कॉल, एसएमएस, फेसबुक, ट्विटर या यूट्यूब पर फैली सूचना महज अफवाह होने के बावजूद दहशत क्यों फैला देती है, इसके कुछ अहम कारण हैं। पहली वजह तो यही है कि इंटरनेट तक लोगों की पहुंच काफी आसान हो गई है। स्मार्टफोनों की बदौलत देश में करीब 40 करोड़ लोग इंटरनेट से किसी न किसी रूप में जुड़े हैं। देश के करीब 29.4 करोड़ लोग फेसबुक से जुड़े हुए हैं। ऐसे में यदि कुछ शरारती तत्व किसी अफवाह को सुनियोजित ढंग से फैलाना चाहें, तो उन्हें इसमें कोई खास देर नहीं लगती। अफवाहों का समाजशास्त्रीय अध्ययन कहता है कि कई बार लोग यह अपराध इसलिए करते हैं कि उन्हें इस बारे में कानून की जानकारी नहीं होती। अगर उन्हें पता हो कि झूठी सूचना देने पर दो साल तक की सजा हो सकती है, तो लोग ऐसी हरकत करने से बाज आएंगे। दरअसल, देश में इतने संसाधन नहीं हैं कि हर संवेदनशील जगह पर सतत निगरानी रखी जा सके। अभी यह सुनिश्चित नहीं हुआ है कि सरकार का बनाया सिस्टम कोई अफवाह फैलने पर किस तरह काम करेगा। पुलिस तंत्र में साइबर सेल सक्रिय हो चुकी है, पर अभी या तो उनमें तैनात होने वाले लोगों की ट्रेनिंग की समस्या है या फिर उन्हें इससे जुड़े खतरों का अंदाजा नहीं है। यही कारण है कि समस्या और गंभीर होती चली जा रही है।

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