विपन्नता नहीं रोक सकी बाॅक्सर रजनी की राह

By Independent Mail | Last Updated: Jan 4 2019 10:06PM
विपन्नता नहीं रोक सकी बाॅक्सर रजनी की राह

अरुण नैथानी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि वह अपने रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में राजनीति से इतर कई गुमनाम प्रतिभाओं का जिक्र करते हैं, फिर उनके बारे में आम लोग खोजबीन करने लगते हैं। अपने पिछले कार्यक्रम में उन्होंने हरियाणा के पानीपत की एक नवोदित बॉक्सर रजनी कश्यप का जिक्र किया, जिनके पिता ठेले पर लस्सी बेचते हैं और मां मजदूरी करती हैं। मां का हाथ बंटाने के लिए खेतों में मजदूरी करने वाली रजनी ने हाल ही में जूनियर महिला बॉक्सिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता। वह सर्बिया में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय बॉक्सिंग स्पर्धा में सर्वश्रेष्ठ बॉक्सर का खिताब हासिल कर चुकी हैं। आज हर जुबान पर 'गुदड़ी की लाल' रजनी की चर्चा है, जिसके जुनून को देखते हुए खेल पंडित उसे भविष्य की मैरीकॉम कह रहे हैं, जो इन्हीं हालात में तपकर कुंदन हुई हैं। पानीपत जिले के बुआना लाखू गांव की रहने वाली 16 वर्षीय रजनी विपन्नता की तपिश में निखरी हैं। पांच बहनों व एक भाई वाले परिवार का भरण-पोषण पिता जसमेर सिंह ठेले पर कभी लस्सी तो कभी फल-सब्जी बेचकर करते हैं। लेकिन जब रजनी ने पिता जसमेर सिंह से बॉक्सिंग में किस्मत आजमाने की बात कही, तो उन्होंने अपनी हैसियत से आगे जाकर उसके सपनों को जिंदा रखा और बड़ी सोच का परिचय दिया। उसने मां से कहा मुझे कुछ नहीं चाहिए, बॉक्सर बनने दें। मां ने भी हां कह दी। रजनी मां का हाथ बंटाने खेतों में मजदूरी भी करती, पढ़ाई भी और बॉक्सिंग की तैयारी भी। यही वजह है कि मन की बात कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी ने पिता जसमेर सिंह और माता उषा रानी को नमन किया। कारण साफ है कि तमाम मजबूरियों में भी उनकी सोच बड़ी थी। रजनी ने भी माता-पिता की इस बड़ी सोच का भरपूर सम्मान किया। जब रजनी ने जूनियर महिला मुक्केबाजी चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता, तो वह तुरंत पास के एक दूध के स्टाल पर पहुंचीं और एक गिलास दूध पिया। इसके उपरांत पदक को कपड़े में लपेटा और अपने बैग में रख लिया। यह सब उन्होंने अपने पिता के सम्मान में किया। उनका कहना था कि पिता ने उन्हें पालने में बड़े कष्ट उठाए। जब सुबह हम भाई-बहन सोकर उठते थे, उससे पहले पापा काम पर निकल जाते थे। उन्होंने आगे बढ़ने के लिए मेरा मनोबल बढ़ाया। रजनी ने पानीपत पहुंचकर पदक पिता को समर्पित किया। सोने की चमक पिता की आंखों में थी। हमारे आसपास की कोई घटना किसी का जीवन किस तरह बदल देती है, रजनी उसकी मिसाल हैं। रजनी जब पांच साल की थीं, तो उनका रुझान बॉक्सिंग की तरफ हुआ। एक बार जब राज्यस्तरीय बॉक्सिंग प्रतियोगिता के विजेता सुरेंद्र सिंह का नोटों और फूलों की माला से स्वागत हुआ, तो रजनी ने ठान लिया कि वह भी बॉक्सिंग में मेडल लाएंगी। तब उनका स्वागत भी नोटों की माला से होगा। बॉक्सिंग कोच सुरेंद्र सिंह ने उन्हें बॉक्सिंग की प्रेरणा दी। मां के साथ खेतों में काम करने के अलावा रजनी पढ़ाई भी करती और सुबह-शाम मुक्केबाजी की प्रैक्टिस। वह दबंग तो वह बचपन से थी। छेड़ने पर सहपाठियों व भाई-बहनों को मुक्केबाजी का पंच का अहसास करा देती। लोग आज रजनी में दुनिया की चोटी की मुक्केबाज मैरीकॉम का अक्स देखते हैं। वह भी अभावों में पलीं, खेतों में काम किया और उनके दिल में कुछ कर गुजरने की आग ने उन्हें मैरीकॉम बना दिया। रजनी भी छह बार की बॉक्सिंग विश्व चैंपियन मेरीकॉम को अपना आदर्श मानती हैं और उनसे मिलना चाहती हैं। लोग कहने लगे हैं कि बुआना लाखू में दूसरी मैरीकॉम पैदा हुई है। रजनी के पिता जसमेर सिंह कहते हैं कि रजनी बचपन से ही निडर प्रवृत्ति की थी। कोई बात बुरी लगती तो सहेलियों और बहनों को सबक सिखाने में भी नहीं चूकतीं। जब उसने मुक्केबाजी में भविष्य तलाशने की बात कही, तो मुझे लग गया था कि बेटी कुछ करेगी। हमारे पास साधन नहीं थे। उसने पुराने गलव्स से ही अभ्यास किया। लोगों ने डराया कि मुक्केबाजी से चेहरा खराब हो जाएगा, उससे फिर कौन शादी करेगा। लेकिन इन बातों पर रजनी ने कान नहीं दिया। मैंने भी उसे नहीं रोका। इतना ही नहीं, उसने पढ़ाई भी मन लगाकर की। हाई स्कूल में उसने प्रथम श्रेणी हासिल की। साथ ही मुक्केबाजी में पदक भी जीते। मुझे अपनी बिटिया पर नाज है। इधर, हरियाणा में मुक्केबाजी के प्रति युवाओं में खासा जुनून पैदा हुआ है। सरकार की नई खेल नीति भी उनका आकर्षण बढ़ाती है। हरियाणा के कई खिलाड़ी अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाजी स्पर्धाओं में चमके हैं। जरूरत है, तो रजनी जैसी प्रतिभाओं की पहचान करने और उनके खेल को निखारने की।

वरिष्ठ स्तंभकार

image
Copyrights @ 2017 Independent NewsCorp (P) Ltd., Bhopal. All Right Reserved