कट्टरपंथ की आग में झुलसता पाकिस्तान

By Independent Mail | Last Updated: Nov 5 2018 10:05PM
कट्टरपंथ की आग में झुलसता पाकिस्तान

सुशांत सरीन

पाकिस्तान की आला अदालत ने ईशनिंदा के आरोपों से ईसाई महिला आसिया बीबी को बरी क्या किया, पूरा देश जैसे उबल पड़ा है। सरकार, अदालत और फौज के खिलाफ जमकर नारेबाजी और विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। लोगों को 'मार-काट मचाने' के लिए भी उकसाया जा रहा है। इस पूरे आंदोलन में वैसे तो कई संगठन सक्रिय हैं, पर नेतृत्व मुख्यत: तहरीक-ए-लबैक पाकिस्तान के हाथों में है। इस तंजीम का जन्म महज तीन साल पहले 2015 में हुआ है, जब ईशनिंदा कानून में सुधार की मांग करने वाले पंजाब सूबे के गवर्नर सलमान तासीर की 2011 में हत्या करने वाले मुमताज कादरी को फांसी दी गई थी। मुमताज इस संगठन की नजर में 'शहीद' है। लोगों पर इसके प्रभाव का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसी साल जुलाई में हुए आम चुनाव और फिर उपचुनाव के बाद वोटों के मामले में यह पाकिस्तान की सबसे बड़ी मजहबी जमात बन गई है।

सवाल यह है कि जिसे पाकिस्तान के अदालती इतिहास का एक 'प्रगतिशील' फैसला कहा जा रहा है, उसके खिलाफ लोग सड़कों पर क्यों हैं? हालांकि, मैं इसे प्रगतिशील नहीं, बल्कि मजबूरी में दिया गया आदेश मानता हूं। अगर ऐसा नहीं होता, तो राजनेताओं के खिलाफ सख्त रुख अपनाने वाले जज भी उपद्रवियों के आगे रहम की मुद्रा नहीं अपनाते। आसिया को रिहा करना अदालत (परोक्ष रूप से सरकार) के लिए जरूरी था, क्योंकि ऐसा न करने पर पाकिस्तान की मिट्टी पलीद होती। इस पूरे मामले पर यूरोपीय संघ की नजर है। आसिया पर प्रतिकूल फैसला पाकिस्तान को 'जीएसपी प्लस' यानी जेनरलाइज्ड स्कीम ऑफ प्रेफरेंस से बाहर कर सकता था, जिसका लाभ यूरोपीय संघ अपने यहां आयात होने वाले उत्पादों पर नाममात्र उत्पाद शुल्क या शुल्क में छूट के रूप में देता है। इससे निर्यातक देश को कम कीमत पर एक बड़ा बाजार मिल जाता है। अभी जब पाकिस्तान की आर्थिक सेहत बेहद खस्ता है, तब वह आसिया बीबी को सजा देकर यह बाजार खोना नहीं चाहता था। रही बात चीफ जस्टिस साकिब निसार की, तो उनकी मजहबी सोच के सुबूत उनकी पुरानी तकरीरों में मिलते हैं। उन्होंने कहा ही है कि आजादी के समय 'दो कौमी नजरिये थे। एक तरफ मुसलमान थे, जो अपने हक की बात कर रहे थे, तो दूसरी तरफ वे लोग (हिंदू), जिनका नाम भी मैं अपनी जुबान पर नहीं लाना चाहता, क्योंकि मेरी जुबान खराब हो जाएगी।' इसलिए उनसे किसी 'प्रगतिशील फैसले' की उम्मीद पालना बेमानी है।

साफ है, आसिया पाकिस्तान के लिए गले की हड्डी बन गई है। मुमकिन है कि उनके खिलाफ फिर अदालत में अपील की जाए। हालांकि, तब भी उन्हें माफी ही मिलेगी। दूसरी तरफ, समाज में ऐसी कट्टरपंथी ताकतें भी हैं, जो अब इतनी ताकतवर हो गई हैं कि खुलकर फौज व हुकूमत से टकराने लगी हैं। इसी आंदोलन में मातहतों को जजों का कत्ल करने के लिए उकसाया जा रहा है, तो फौज को सेना प्रमुख के खिलाफ खड़े होने को। वहां की हुकूमत को भी 'गैर-इस्लामी' करार दिया जा चुका है। पाकिस्तान की रियासत इन सबको दरकिनार करने का खतरा नहीं उठाना चाहेगी।

वहां आसिया के बहाने ईशनिंदा कानून पर जरूर बात हो रही है, मगर मेरी नजर में मसला ईशनिंदा कानून नहीं है। दुनिया के तमाम मुल्कों में अच्छे-बुरे कानून मौजूद हैं। लेकिन जब समाज में खोखलापन आ जाए, तो ऐसे कानून कहीं अधिक बुरे तरीके से इस्तेमाल होने लगते हैं। पाकिस्तान में ईशनिंदा कानून 'मौत का वारंट' है। 'ईशनिंदा' सुनते ही वहां का समाज उत्तेजित हो जाता है। अव्वल तो केस खत्म होने से पहले ही आरोपी को मार दिया जाता है और अगर वह बच जाए या बरी हो जाए, तो पाकिस्तान में उसका रहना असंभव होता है। आसिया बीबी को भी जेल से रिहा करने के तुरंत बाद पूरे परिवार के साथ विदेश भेजने की योजना है। मुल्क को इस हद तक कट्टर बनाने का श्रेय वहां के हुक्मरानों को ही जाता है। इस वक्त उपद्रव मचाने वाली तंजीम तहरीक-ए-लबैक पाकिस्तान का विकास भी इसी तरह हुआ है। बेशक, इस तरह के संगठनों के पास दहशतगर्द जमातों की तरह हथियार नहीं होते और उन्हें खदेड़ना आसान होता है, पर मुश्किल यह है कि यदि इनका दमन किया गया, तो फिर जवाबी प्रतिक्रिया ज्यादा तीखी होगी और सुलह-सफाई की सूरत में इन तंजीमों की ताकत बढ़ेगी।

इन संगठनों का ताकतवर बनना कई दूसरी परेशानियां बढ़ा सकता है। ये लोगों को 'लोन वुल्फ अटैक' यानी अकेले हमला करने की रणनीति अपनाने के लिए उकसा सकते हैं। इसका अर्थ यह है कि कौन, कहां, किस पर हमला कर दे, यह किसी को पता नहीं। पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पर मार्च महीने में जूते उछाले गए थे। तब के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ के चेहरे पर भी स्याही डाली गई थी। मई में तत्कालीन गृह मंत्री एहसान इकबाल पर जानलेवा हमला किया गया था। मौजूदा प्रधानमंत्री इमरान खान के लिए मुश्किल यह है कि विपक्ष में रहते हुए उन्होंने इसका समर्थन लेकर तमाम उपद्रव मचाए हैं। उनके कई मंत्री तब आसिया को सजा देने के पक्ष में पोस्टर तक चिपका चुके हैं। इमरान खान के लिए इस इतिहास से पीछा छुड़ाना आसान नहीं होगा।

तब फिर क्या किया जाए? इमरान अभी उपद्रवियों के साथ जोर-जबर्दस्ती भी नहीं कर सकते और न खुले तौर पर उनका समर्थन कर सकते हैं। ऐसे में, थोड़ी-बहुत सख्ती दिखाकर प्रदर्शनकारियों को खदेड़ने की कोशिश की जाएगी और फिर उनकी नाराजगी को शांत करने का प्रयास किया जाएगा। इस पूरे आंदोलन में भले ही कुछ अमीर लोग भी हैं, लेकिन यह मूलत: पसमांदा मुसलमानों का आंदोलन है। ये निचले तबके के लोग होते हैं। इमरान इनका गुस्सा मोल लेने से बचना चाहेंगे। हालांकि जरूरत मजहबी कट्टरपंथी तंजीमों को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की नीति पर भी चोट करने की है। अन्यथा, एक खादिम हुसैन रिजवी (तहरीक-ए-लबैक पाकिस्तान का मुखिया) खत्म होगा, तो दूसरा सामने आ जाएगा और यह दूसरा पहले से कहीं ज्यादा ताकतवर और खतरनाक होगा। साफ है, पाकिस्तान में अंदर ही अंदर लावा उबल रहा है। कहीं न कहीं यह फटेगा जरूर। पाकिस्तान के वजीर-ए-आजम को इसे ही संभालना है।

विदेशी मामलों के जानकार

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