जातिवाद के सहारे बिहार जीतने की फिराक में नीतीश

By Independent Mail | Last Updated: Dec 6 2018 10:57PM
जातिवाद के सहारे बिहार जीतने की फिराक में नीतीश

गौतम चौधरी

विगत दिनों बिहार के मुजफ्फरपुर में किसी ने पूर्व महापौर की हत्या कर दी। हत्या क्यों की गयी, इसके पीछे किसका हाथ है, स्पष्ट नहीं है लेकिन जो बिहार पुलिस बिना किसी तहकीकात के तहरीर के आधार पर राजस्थान से आरोपी पत्रकार को पकड़कर बिहार के जेल में बंद कर देती है, उस पुलिस के हाथ अब भी खाली हैं। यानी, पुलिस अंधेरे में तीर चला रही है। इस हत्या को लेकर न तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कोई बयान आया और न ही भाजपा के कोटे से बनाए गए प्रदेश के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी की कोई संवेदना-संदेश आया। हां, जूनियर मोदी ने यह जरूर कहा कि हम बिहार के अपराधियों से विनम्र निवेदन करते हैं कि कृपया पितृपक्ष में अपराध न करें। मुझे लगता है कि सुशील मोदी ने यह बयान जारी कर यह साबित कर दिया कि अपराध पर नियंत्रण करना बिहार सरकार के बस की बात नहीं है। यह एक प्रकार का समझौता है और जिस प्रकार आतंवादियों से सरकार युद्धविराम समझौते के बाद कुछ दिनों के लिए हथियार छोड़ने की अपील करती है, उसी प्रकार उपमुख्यमंत्री प्रदेश के अपराधियों से अपील कर रहे हैं। मतलब साफ है कि सरकार का अपराधियों के साथ कोई गुप्त समझौत है और सरकार उसी समझौते के तहत यह अपील कर रही है। यह बिहार जैसे प्रदेश के लिए बेहद खतरनाक है।

दूसरी बात यह है कि इन दिनों बिहार सरकर माओवादी चरमपंथियों के प्रति लिबरल एप्रोच दिखा रही है। विगत दिनों कई हार्डकोर माओवादियों को सराकर ने छोड़ा है। ऐन चुनाव से पहले हार्डकोर माओवादियों का छोड़ा जाना नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली बिहार सरकार की नीयत पर संदेह खड़ा कर रहा है। नीतीश कुमार पर पहले भी माओवादियों के साथ समझौते के आरोप लगते रहे हैं। इस बार भी संभवतः नीतीश कुमार वही खेल खेलने जा रहे हैं, जो खेल लालू प्रसाद यादव खेला करते थे। नीतीश कुमार माओवादियों को संभवतः बिहार की सत्ता में भागीदार बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं और यही कारण है कि बिहार में माओवादियों को छोड़ा जा रहा है। इसका दोतरफा प्रभाव पड़ेगा। एक तो बिहार में कथित उच्चवर्गीय नेतृत्व के खिलाफ मोर्चेबंदी होगी, दूसरी ओर पिछड़ी जातियों में नए सिरे से ध्रुवीकरण होगा। नीतीश इस रणनीति के माहिर खिलाड़ी हैं। इस रणनीति का प्रणेता नीतीश कुमार को ही कहा जाता है। उन्होंने ही लालू प्रसाद यादव को इस रणनीति के लिए उकसाया और कालांतर में जैसे ही भेद खुलने लगा, लालू से उन्होंने पल्ला झाड़ लिया। हालांकि, लालू को नीतीश का हिडेन एजेंडा बाद में पता चला। लालू यादव ने संभालने की कोशिश तो की, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी और नीतीश सत्ता पर काबिज हो गए। अबकी बार नीतीश उसी पुराने हथियार को आजमाना चाहते हैं। उन्हें भरोसा है कि इस बार भी यह हथियार कारगर साबित होगा। नीतीश कुमार यह मान कर चल रहे हैं कि भाजपा के साथ समझौते के कारण उच्चवर्गीय जातियों का थोड़ा वोट वे काट लेंगे और इस प्रकार एक बार फिर बिहार की सत्ता पर काबिज हो जाएंगे। जमीनी स्तर पर माओवादियों का उन्हें समर्थन मिल जाएगा, जिनकी बिहार में अभी भी जबरदस्त धमक है। सांगठनिक संरचना भी उनकी बेहद मजबूत है। इधर भाजपा को लगता है कि यदि नीतीश बिहार में इस रणनीति को साध पाए, तो उसे झारखंड में इसका लाभ मिल जाएगा। खैर, जो होना होगा वही होगा, लेकिन इससे बिहार में एक बार फिर जातीय उन्माद की पृष्ठभूमि तैयार हो गयी है।

मुजफ्फरपुर के पूर्व महापैर समीर कुमार की हत्या पर चाहे कोई भी कुछ कह ले, लेकिन इस हत्या के पीछे कई कारणों में से एक कारण राजनीतिक भी हो सकता है। समीर मुजफ्फरपुर के भूमिहार नेता के रूप में स्थापित हो रहे थे। अभी हाल ही में उन्होंने भाजपा को छोड़ दिया था। उनके नजदीकी सूत्रों का कहना है कि वह कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय होने की योजना बना रहे थे। सूत्रों पर भरोसा करें तो कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं से उन्होंने संपर्क भी किया था। मुजफ्फरपुर में रघुनाथ पांडेय की मृत्यु के बाद समीर ही ऐसे नेता थे, जो भूमिहारों के बीच बड़ी तेजी से अपनी पैठ बना रहे थे। आने वाले समय में समीर मुजफ्फरपुर में बड़े नेता के रूप में स्थापित हो सकते थे। हालांकि, उनके ऊपर भी कई प्रकार के आरोप थे। यहां तक कि नवअरुण्या हत्या मामले में भी उनके ऊपर कुछ आरोप लगे थे। इसके बावजूद वह मुजफ्फरपुर में तेजी से आगे बढ़ रहे थे। हालांकि, उनकी हत्या में जमीन की दलाली को कारण बताया जा रहा है, लेकिन उनकी हत्या के पीछे एक सुनियोजित राजनीतिक कारण साफ दिख रहा है। साथ ही कुछ लोगों का मानना है कि इस हत्या के पीछे नवरुण्या कांड के भी तार जुड़े हो सकते हैं और षड्यंत्रकारी हत्या में संलिप्त अपराधी को बचाने के लिए अनुसंधान की दिशा बदले की कोशिश कर रहा हो। मामला चाहे जो भी हो, लेकिन इस हत्या ने बिहार पुलिस की विफलता को उजागर किया है। कोई एके-47 राइफल लेकर भीड़-भाड़ वाले बाजार में घुस जाता है और किसी व्यक्ति को व्यवस्थित तरीके से गोली मारकर चला जाता है। यह पुलिस, सरकार और गुप्तचर संस्थाओं पर पर प्रश्न खड़े करता है। अभी हाल ही में सीतामढ़ी में एक अपराधी की हत्या अपराधियों ने पुलिस अभिरक्षण में कर दी। यह भी हत्या चौंकाने वाली थी। बिहार में इस प्रकार की हत्याएं कोई नहीं हैं। ब्रजबिहारी प्रसाद को भी इसी प्रकार मार दिया गया था। वह पुलिस सुरक्षा में थे, लेकिन मारे गए। अब वही खेल फिर से प्रारंभ हो गया है। आरोप चाहे किसी पर लगा दिया जाए, लेकिन हत्या की साजिश कहीं न कहीं राजनीति से प्रभावित दिख रही है और इसके परिणाम बेहद खतरनाक होंगे।

आने वाले समय में सत्ता पक्ष जो चाह रहा है, यदि वह नहीं हुआ और राजनीतिक परिणाम उसके उलट हो गया, तो लेने के देने भी पड़ सकते हैं। जैसे लालू प्रसाद यादव को पड़ गए, इसलिए सत्ता पक्ष को प्रशासन में स्थापित जातीय गोलबंदी को तोड़ने की जरूरत है, न कि उसे और ज्यादा मजबूत करने की, साथ ही माओवादियों के साथ समझौता देश की संप्रभुता के लिए खतरा है। इस बात को याद रखने की जरूरत है। ऐसा नहीं होगा तो घाटा केवल एक पक्ष को नहीं होगा। उसका नकारात्मक प्रभाव पूरे समाज को भुगतना पड़ेगा। जैसे पंजाब में देखने को मिला। इसलिए सतर्क रहना चाहिए। साथ ही केन्द्रीय एजेसियों को भी इस मामले में संज्ञान लेना चाहिए।

वरिष्ठ स्तंभकार

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