स्नाइपर आतंकवाद की नई चुनौती

By Independent Mail | Last Updated: Nov 4 2018 11:04PM
स्नाइपर आतंकवाद की नई चुनौती

सैयद अता हसनैन

थलसेना अध्यक्ष बिपिन रावत एकदम सही हैं, जब वह कहते हैं कि फिलहाल यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी संगठनों की स्नाइपर स्क्वायड जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ कर चुकी हैं और सुरक्षाकर्मियों को विशेष रूप से साधकर बहुत दूर से गोली का निशाना बनाने वाली घटनाओं में एकाएक बढ़ोतरी इनका कारनामा है। इस तरह के कयासों में सेना ठोस प्रमाण के आधार पर ही कोई धारणा बनाती है, जिसका मतलब है, स्नाइपर राइफल की बरामदगी होना या नाइट विजन दूरबीन का मिलना, जिनका इस्तेमाल उक्त हमलों में किया गया हो। हालांकि, यह भी सच है कि खुलेआम अपने काम को अंजाम देने वाले आतंकियों के साथ मिलकर एक या दो स्नाइपर स्क्वायड अंदरखाने काम कर रही हैं, इनको खत्म करने अथवा इनसे हथियार बरामदगी में काफी लंबा समय लग सकता है।

इसे सही परिप्रेक्ष्य में यूं समझा जाए: श्रीनगर के बाहरी इलाके नौगाम स्थित वगूरा पॉवर ग्रिड की सुरक्षा हेतु केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल का एक एएसआई तैनात था, उसकी जिंदगी अचानक कहीं दूर से दागी गई गोली ने लील ली थी। ठीक इसी तरीके से कुछ दिन पहले त्राल तहसील में सेना का एक जवान और विशेष सुरक्षा बल का एक सिपाही भी शहीद हुए हैं। आतंकियों द्वारा इस ढंग से किए गए पहले हमले की सूचना 18 सितंबर को पुलवामा के नेवा से मिली थी, जहां केंद्रीय आरक्षी सुरक्षा बल का एक सिपाही जख्मी हुआ था।

स्नाइपिंग का मतलब है, अज्ञात स्रोत से हुआ वह हमला जो टारगेट पर सुरक्षित दूरी से किया गया हो। सुरक्षा बल इन हमलों की समीक्षा कर रहे हैं। यहां यह जानना महत्वपूर्ण है कि नवीनतम आतंकवादी हमलों की प्रकृति किस तरह की है और विगत के तौर-तरीकों से इसका क्या संदर्भ-नाता है। जम्मू-कश्मीर में पाक प्रायोजित आतंकियों के साथ मिलकर चल रहा छद्म युद्ध 28 साल पुराना है और इस वक्फे में समय-समय पर अनेकानेक चौंकाने वाले चलन देखे गए हैं। 90 के दशक में जब आतंकियों की गिनती बनिस्बत काफी ज्यादा थी, तब सुरक्षा बलों, विशेषकर सेना, जिसकी उपस्थिति ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों और दूर-दराज में थी, उन पर बड़ी संख्याबल वाले गुटों द्वारा घात लगाकर किए गए हमले या फिर आमने-सामने के मुकाबले आम बात थी। आतंकियों की होने वाली मौतें उन्हें हतोत्साहित नहीं करती थीं, क्योंकि वे जल्द ही अपनी गिनती की भरपाई स्थानीय युवकों को भर्ती करके और उन्हें पाक-अधिकृत कश्मीर में प्रशिक्षण करवाते हुए पूरी कर लेते थे। इसके अलावा पाकिस्तानी आतंकियों की खेप भी खुलकर आती रहती थी।

वर्ष 1999 में चलन सुरक्षा बलों के कैंपों और सरकारी भवनों में चुपके से दाखिल होकर आत्मघाती हमले का हो गया था। एक तरह से यह स्रोतों पर अतिरिक्त बोझ बना, क्योंकि तब कैंपों की रखवाली के लिए और ज्यादा सुरक्षाकर्मी तैनात करने एवं प्रवेश द्वारों पर निगरानी बढ़ानी पड़ी थी। अब सीमा पर घुसपैठ-रोधी प्रणाली स्थापित होने की वजह से घुसपैठ-निवारक व्यवस्था बहुत मजबूत हो गई और इससे आतंकियों की गिनती कम हो गई जो 2008-09 में 300-500 के बीच थी। यह वह समय था, जब पाकिस्तानी एजेंसियों ने निर्देश दिया कि सड़कों पर 'प्रदर्शन-आतंक' का दौर चलाया जाए और तब पत्थरबाजी आम बात हो गई। इसी तरह का एक नवीनतम तरीका है, आनन-फानन में सड़कों पर भीड़ इकट्ठी करना ताकि एक तो आतंकरोधी दस्ते द्वारा घेराबंदी और तलाशी लेने वाले काम में अड़चन डले और दूसरे सुरक्षा बलों द्वारा घेरे गए आतंकियों को बचकर भाग निकलने का मौका मिल सके और इस चक्कर में भीड़ के लोग मारे जाएं।

दरअसल, आतंकवादियों ने सुरक्षाबलों के खिलाफ अभियानों में दो विशेष क्षेत्रों में काफी सावधानी बरती है। इनमें पहला है, हेलीकॉप्टरों और हवाई जहाजों पर मिसाइलों का प्रयोग करने से गुरेज करना। दूसरा है, जम्मू-कश्मीर में सक्रिय विदेशी और स्थानीय आतंकवादियों ने अब तक उस किस्म के आत्मघाती हमले नहीं किए हैं, जिस तरह के अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा से सटे इलाकों और मध्य-पूर्व के देशों में देखने को मिलते हैं। तब सवाल यह है कि अचानक स्नाइपरों का इस्तेमाल क्यों और क्या यह खबर सही भी है?

संभव है कि आतंकियों की घटती गिनती उन्हें ऐसे हमले करने की 'विलासिता' नहीं देती कि अपने दो-तीन बंदे सुरक्षा बलों के कैंपों में घुसवाकर अंततः उनकी मौतों से अपनी गिनती का नुकसान करवाएं। अपने संख्याबल को बचाए रखना उनके लिए नितांत जरूरी हो जाता है। अब नजदीक से घात लगाकर किए जाने वाले हमले, जो कि कहीं ज्यादा असरदार होते हैं, वे कम और कभी-कभार हो रहे हैं और इनमें सुरक्षा बलों, विशेषकर सेना की नैसर्गिक त्वरित प्रतिक्रिया बोध के चलते उल्टे आतंकियों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। आतंकवादियों द्वारा स्नाइपर स्क्वाड की कथित तैनाती अपनी संख्या को बचाने की जुगत और कुछ नई सनसनी पैदा करने की गर्ज से है। किसी भी राइफल की मारक रेंज 300-400 मीटर होती है। लेकिन जो बंदूकें नाइट विजन और थर्मल इमेजिंग वाली दूरबीन से युक्त होती हैं, वे उन सघन शहरीय और उप-नगरीय क्षेत्रों में मुफीद होती हैं, जहां अमूमन 600-700 मीटर की रेंज की सीमा उपलब्ध नहीं होती।किसी भवन के ऊपरी तल या एक पेड़ या ढेर का इस्तेमाल इनके लिए मुफीद है।

जो चलन सदा से खतरनाक है, वह है स्व-निर्मित बम (आईईडी) और घात लगाकर किए गए हमलों का एक साथ प्रयोग। इस महीने देखने को मिला है कि एक सुरंग-रोधी वाहन पर स्व-निर्मित बम का प्रयोग किया गया है। यह काम 10 साल के अंतराल के बाद हुआ है। यह संकेत है किसी 'जुगाड़ू-बम-विशेषज्ञ' की वापसी का या उससे भी ज्यादा प्रशिक्षित आतंकी के होने का। स्नाइपिंग की आमद बताती है कि सैन्य कारवां, खुले में विचरने वाले सुरक्षाकर्मियों, वरिष्ठ कमांडरों और राजनेताओं को खतरा हो सकता है।

हालांकि, स्नाइपरों से निपटने के लिए कुछ नया सिखाने की जरूरत नहीं है। इसका तोड़ आक्रमण करने वाले में प्रथम पंक्ति के सैनिकों को दिए जाने वाले बुनियादी प्रशिक्षणों पर फिर से अमल में है। अचानक कहीं दूर से होने वाले हमलों के माहौल में किसी सैन्य-कैंप या हमले की संभावना वाले स्थल को कभी भी सिर्फ एक दुर्ग की भांति नहीं लिया जाता, बल्कि इसके आसपास के क्षेत्र में, जहां तक दूर से बैठकर कोई हमला कर सकता है, वहां तक गश्ती दलों और प्रतिघात दलों की तैनाती की जाती है, ताकि हमलावर को संभावित छिपने वाली जगह से अचानक अथवा तुरंत दबोचा जा सके। यदि ये उपाय स्नाइपर को अपने काम को अंजाम देने में न भी रोक पाएं तो भी उस आततायी को तीव्रतम प्रतिक्रिया में दबोचना या मार गिराना सुनिश्चित करेंगे। इसी तरह कारवां की सुरक्षा के लिए जितनी दूरी से कोई निशाना लगा सकता है, वहां तक निगरानी करने का पुराना उपाय इस्तेमाल करके सुरक्षित गलियारे बनाए जा सकते हैं।

वीसी कश्मीर यूनिवर्सिटी

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