विपक्षी दलों के भाषाई हमले झेलते मोदी

By Independent Mail | Last Updated: Nov 3 2018 9:25PM
विपक्षी दलों के भाषाई हमले झेलते मोदी

राजनीति में सहमति-असहमति और आरोप-प्रत्यारोपों के होने से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन असहमति या आरोप की अभिव्यक्ति करते हुए आवश्यक होता है कि भाषाई शुचिता के प्रति सचेत रहा जाए। इस संदर्भ में भारतीय राजनीति की दशा चिंतित करने वाली है। हमारे राजनेताओं की भाषा का स्तर गिरता जा रहा है। यदि निचले स्तर के नेताओं द्वारा असभ्य भाषा का प्रयोग किया जाता तो भी गनीमत थी, लेकिन जो जितना बड़ा नेता है, उसकी भाषा उतनी ही अधिक अशिष्ट और असभ्य होती जा रही है। अमर्यादित भाषा के मामले में पक्ष हो या विपक्ष, कोई भी एकदम पाक साफ कहलाने की स्थिति में नहीं है। इस कीचड़ में दोनों के ही हाथ कमोबेश सने हुए हैं। लेकिन एक तथ्य यह भी है कि गत चार वर्षो में सबसे अधिक यदि किसी के प्रति भाषाई अभद्रता दिखी है, तो वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। मोदी की लोकप्रियता के कारण भाजपा को लगातार चुनावी सफलताएं प्राप्त होने से बौखलाया विपक्ष अपनी खीझ प्रधानमंत्री के प्रति अपशब्दों के माध्यम से व्यक्त करता रहता है। देश की सबसे पुरानी पार्टी होने का दम भरने वाली वाली कांग्रेस की बात करें तो उस पर भाषाई शुचिता के शीलभंग का कुछ अधिक ही उत्साह रहा है। कांग्रेसी नेताओं में जैसे होड़ लगी हुई है कि कौन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति कितना खराब बोल सकता है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इन दिनों कथित राफेल घोटाले को लेकर प्रधानमंत्री पर बेहद आक्रामक हैं। भले ही इस मामले में तथ्य के नाम पर वह कुछ ठोस रखने में नाकाम रहे हों, लेकिन भाषाई अभद्रता की सभी सीमाएं उन्होंने लांघ दी हैं। वह अपनी रैलियों में प्रधानमंत्री के लिए 'चौकीदार चोर है' जैसे जुमले उछालने में लगे हैं। यहां तक कि सीबीआई प्रकरण तक से उन्होंने मनमाने ढंग से राफेल को जोड़ते हुए प्रधानमंत्री के लिए 'चोर' जैसे आपत्तिजनक शब्द का प्रयोग किया। अब जिस पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष ही ऐसी भाषा बोल रहा है, उसके अन्य नेता भाषाई मर्यादा का ध्यान कैसे रख सकते हैं। राहुल का बयान थमा भी नहीं था कि कांग्रेस के अत्यंत सुशिक्षित और संभ्रांत माने जाने वाले नेता शशि थरूर ने प्रधानमंत्री की तुलना बिच्छू से कर डाली। इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस नेत्री दिव्या स्पंदना ने पटेल की विशालकाय मूर्ति के चरणों में खड़े प्रधानमंत्री के लिए घटिया शब्द का प्रयोग कर दिया। गुजरात के एक विधायक जिग्नेश मेवाणी ने भी पिछले दिनों प्रधानमंत्री के लिए आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया। ये बस कुछ उदाहरण हैं, अन्यथा मोदी के प्रति भाषाई अभद्रताओं का इतिहास तो 'मौत के सौदागर' से लेकर 'नीच' तक बहुत लंबा है। उपरोक्त बातों से जाहिर है कि राजनीतिक विरोध में विपक्ष इस कदर अंधा हो चुका है कि उसे प्रधानमंत्री पद की गरिमा तक का ख्याल नहीं है। विपक्ष को समझना चाहिए कि प्रधानमंत्री किसी दल विशेष का नहीं होता, बल्कि देश का होता है जिसका अपमान देश की जनता का अपमान है। विपक्ष की इस भाषाई अभद्रता के बचाव में तर्क दिया जाता है कि जब डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, तो उनके प्रति तत्कालीन विपक्ष भी ऐसी ही भाषा का प्रयोग करता था। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि संप्रग-2 सरकार के दौरान जिस तरह से सरकारी एजेंसियों द्वारा केंद्रीय स्तर पर एक के बाद एक घोटाले सामने लाए गए, उनके चलते डॉ. मनमोहन सिंह विपक्ष के निशाने पर रहे थे। गत आम चुनावों में मोदी व अन्य भाजपा नेताओं ने घोटालों को आधार बनाते हुए मनमोहन सिंह के प्रति आक्रामक रुख दिखाया था। इस दौरान कुछ आपत्तिजनक बातें भी कही गईं जो निस्संदेह अनुचित थीं। हालांकि, तमाम घोटाले सामने आने के बावजूद भाजपा के किसी शीर्ष नेता ने कभी मनमोहन सिंह के लिए 'चोर' शब्द का प्रयोग नहीं किया, बल्कि वे आज भी गाहे-बगाहे उनके व्यक्तिगत तौर पर ईमानदार होने की बात कहते रहते हैं। सवाल यह उठता है कि मनमोहन सिंह के प्रति विपक्ष की आपत्तिजनक भाषा के आधार पर कांग्रेस को प्रधानमंत्री के प्रति आपत्तिजनक शब्दों के इस्तेमाल का अधिकार कैसे मिल जाता है? देखा जाए तो पहले भी राजनीति में पक्ष-विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप के दौर चलते थे, लेकिन उसमें भाषाई गरिमा का लोप नहीं होता था। नेता एक दूसरे पर तंज कसते थे, मगर तौहीन नहीं की जाती थी। इस संदर्भ में उल्लेखनीय होगा कि एक बार जवाहरलाल नेहरू ने जनसंघ के लिए कहा था, मैं जनसंघ को कुचल दूंगा। यह एक अलोकतांत्रिक भाषा थी, लेकिन जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बड़े ही खूबसूरत ढंग से इसका जवाब देते हुए कहा था, मैं आपकी कुचलने वाली मानसिकता को कुचल दूंगा। ऐसे ही अक्साई चीन प्रसंग में नेहरू के 'सिर के बालों' पर तत्कालीन विपक्षी सांसद महावीर त्यागी का तंज भी इतिहास प्रसिद्ध है। लेकिन नेहरू जी उस तंज को लेकर कठोर नहीं हुए। कहने का अर्थ यह कि पहले हमारे राजनेताओं में सहिष्णुता की भावना प्रबल होती थी जो क्षीण होती जा रही है। अब अगर एक पक्ष ने कुछ आपत्तिजनक कहा तो दूसरा पक्ष उसे अनदेखा करने की बजाय और अधिक आपत्तिजनक शब्दों के साथ जवाब देने उतर पड़ता है। जबकि वास्तव में अशिष्ट भाषा न केवल बात की गंभीरता को खत्म कर देती है, बल्कि वह बोलने वाले के वैचारिक दिवालिएपन को भी दर्शाती है। महात्मा गांधी का कहना था कि हिंसा का अर्थ सिर्फ किसी को शारीरिक चोट पहुंचाना ही नहीं, बल्कि कठोर शब्दों के जरिये मन को कष्ट पहुंचाना भी हिंसा ही है। इस कारण वे अक्सर सत्य किंतु मीठा बोलने पर जोर देते थे। आज सभी राजनीतिक दल गांधी के आदर्शों पर चलने का दावा तो करते हैं, लेकिन गांधी की इस एक सामान्य और सहज कसौटी पर पूरी तरह कोई खरा नहीं उतर पाता है। नेताओं की भाषाई शुचिता सुनिश्चित करने के लिए एक कानून या कुछ कानूनी दिशा-निर्देशों की सख्त जरूरत महसूस होती है, क्योंकि नैतिकता बोध के आधार पर हमारे नेतागणों से सभ्य भाषा की उम्मीद करना अब बेमानी हो चला है।

शिवानंद द्विवेदी, शोधार्थी, श्यामाप्रसाद मुखर्जी फाउंडेशन

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