अयोध्या विवाद में मध्यस्थता की राह ही सही

By Independent Mail | Last Updated: Mar 14 2019 1:15AM
अयोध्या विवाद में मध्यस्थता की राह ही सही

हाल ही में अयोध्या विवाद की सुनवाई कर रही सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने विवाद के 'स्थाई समाधान' के लिए अपनी निगरानी में ऑन कैमरा, पर गोपनीय मध्यस्थता का रास्ता अपनाने का फैसला किया है। इसके लिए उसने सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जस्टिस कलीफुल्ला की अध्यक्षता में मध्यस्थों का जो तीन सदस्यीय पैनल बनाया है, उसके अन्य दो सदस्य आर्ट ऑफ लिविंग के श्रीश्री रविशंकर और वकील श्रीराम पंचू हैं। संविधान पीठ के इस निर्णय को लेकर लोगों के दिमाग में अभी से सवाल उठ रहा है कि क्या इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय भी पक्षकारों के न्याय पाने के अधिकार की पूर्ति में असफल रहा है और इसीलिए उसे मध्यस्थता का सहारा लेना पड़ा है? यह सवाल इसलिए भी उत्तर की मांग करता है कि पीठ के एक न्यायाधीश ने न्यायालय में कहा कि यह महज जमीन के एक टुकड़े का विवाद नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास और भावनाओं से जुड़ा हुआ मुद्दा है, इसलिए इसे अलग ढंग से देखकर निर्णय का रास्ता निकाला जा रहा है। अयोध्या विवाद ऐसा मामला है, जो आरंभ से लेकर अब तक विभिन्न विडंबनाओं से ग्रस्त रहा है।

यह विवाद 22-23 दिसंबर, 1949 की रात के घटनाक्रमों की बाबत अयोध्या पुलिस की उस रिपोर्ट से अस्तित्व में आया, जिसमें इंस्पेक्टर का कहना था कि कुछ लोगों ने अनुचित रूप से घुसकर मस्जिद में मूर्ति रख दी। इसके बाद संबंधित मस्जिद को धारा-145 के तहत कुर्क करके धारा-146 में स्वामित्व विवाद के निपटारे के लिए दीवानी न्यायालय को सौंप दिया गया था। मूर्ति रखने वालों पर मुकदमा चला, तो उन्हें इसलिए मुक्त कर दिया गया कि उन्होंने मंदिर समझकर मूर्ति रखी थी। 1983 के बाद इस विवाद में राजनीतिक दलों और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों का समावेश हुआ, तो उन्होंने इसे आंदोलन का रूप दिया और भीड़ भी जुटानी शुरू की। तब न्यायालय ने इसे निपटाने के लिए अपने बंद दरवाजे खोले और विवाद से चिंतित सरकार द्वारा शिलान्यास की अनुमति भी दी गई। यहां बताना जरूरी है कि 1987 में अयोध्या और फैजाबाद के वरिष्ठ मुस्लिम नेताओं ने इस विवाद के खात्मे के लिए विवादित मस्जिद या ढांचे कोे 11 फीट ऊंची दीवार से घेर देने तथा उस स्थान के पास मंदिर निर्माण आरंभ करने को लेकर अपनी सहमति दी थी, जिसमें कहा गया था कि निर्मोही अखाड़ा 1885 में जहां चबूतरे पर छत डालने का मुकदमा हार चुका था, यह वहां से आरंभ हो। इन मुस्लिमों का कहना था कि यह आंदोलन वास्तव में उनके समुदाय को मुख्यधारा से काटने के लिए है, इसलिए जितनी जल्दी इसका पटाक्षेप हो और मंदिर बन जाए, उनके लिए उतना ही अच्छा होगा। बाद में ऐसा इसलिए नहीं हो सका, क्योंकि दूसरा पक्ष विवाद के राजनीतिक इस्तेमाल पर आमादा था। इस समझौते के मुख्य कर्ता योगी अवैद्यनाथ तथा जस्टिस देवकी नंदन अग्रवाल, महंत नृत्यगोपाल दास, महंत रामचंद्र दास परमहंस सहित विश्व हिंदू परिषद के 13 लोग थे।

लेकिन मामला छह दिसंबर, 1992 को पीवी नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्रित्वकाल में विवाद बाबरी मस्जिद के विध्वंस तक जा पहुंचा, तो वह उसके समाधान के लिए अयोध्या विशिष्ट क्षेत्र अधिग्रहण अध्यादेश लाए, जो बाद में संसद द्वारा पारित कानून बन गया। इसके तहत अधिगृहीत भूमि पर अयोध्या में राममंदिर, मस्जिद, पुस्तकालय, वाचनालय व संग्रहालय के साथ सार्वजनिक सुविधाओं का निर्माण होना था। बाद में मुसलमानों का यह दावा सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने नहीं माना कि मस्जिद का अधिग्रहण नहीं हो सकता। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के बावजूद उसे लेकर विवाद इसलिए समाप्त नहीं हो पाया, क्योंकि अधिग्रहण कानून में राज्य द्वारा की गई संबंधित मुकदमे की समाप्ति को असंवैधानिक माना गया। कारण यह कि उसमें प्रभावितों के न्याय पाने की किसी वैकल्पिक व्यवस्था का पूर्णत: अभाव था। इसके चलते यह विवाद फिर से इलाहाबाद उच्च न्यायालय की तीन सदस्यों की पीठ के हवाले हो गया, जो पहले भी इस पर विचार कर रही थी। उसने इसे रामलला विराजमान, सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़ा के पक्ष में तीन बराबर-बराबर भागों में बांटने के पक्ष में फैसला सुनाया, जिसके खिलाफ 14 अपीलें सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन हैं।

अदालत पहले भी इच्छा व्यक्त कर चुकी थी कि विवाद का आपसी सहमति से निपटारा हो। ऐसा संभव नहीं हुआ, तो सुनवाई कर रही पीठ ने इसे जमीन और कब्जे का मामला मानकर सुनवाई आरंभ की। लेकिन अब उसे इस विवाद को मध्यस्थता के रास्ते सुलझाने की नई तजवीज सूझी है, जिस पर उसने यह कहकर अमल शुरू किया है कि एक प्रतिशत भी उम्मीद हो, तो दोनों पक्षों को मध्यस्थता के रास्ते पर चलना चाहिए।

प्रसंगवश, इस विवाद का निपटारा जहां कुछ लोग अपने विश्वास के अनुसार चाहते हैं, वहीं मुस्लिम पक्ष के सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड के कई नेताओं ने पहले ही यह घोषणा कर दी है कि अगर फैसला उनके पक्ष में हो जाए, तब भी वह भविष्य में वहां मस्जिद बनाने नहीं जा रहे हैं। लेकिन उन्हीं के समुदाय में कुछ लोग इसे पराजय की मनोवृत्ति कह रहे हैं। कई लोगों को सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त जस्टिस कलीफुल्ला को मध्यस्थता पैनल का अध्यक्ष बनाए जाने के पीछे यह दूरंदेशी भी दिख रही है कि फैसला करने वाला उसी विश्वास का हो, जिसके वह विपरीत है, तो वह न्यायपूर्ण भी दिखेगा और असंतोष को भी कम करेगा। फिलहाल, देश की जनता आम तौर पर यही चाहती है कि जिस विवाद को राजनीतिक मुद्दा बनाकर कुछ लोग लाभ उठाने में लगे हैं, उसे समाप्त होना ही चाहिए। यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि देश को भविष्य में राजनीतिक लाभ उठाने के ऐसे विवादों व प्रवृत्तियों से मुक्ति मिले।

क्या मध्यस्थता के रास्ते यह उद्देश्य हासिल किया जा सकेगा? जवाब में कुछ लोग सवाल करते हैं कि क्या आस्था व विश्वास के नाम पर भड़काए गए सारे विवादों में इस प्रक्रिया को अपनाया जा सकता है? लेकिन क्या कुछ लोग इसे अपनी आस्थाओं की विजय मानकर इसका अनुचित लाभ उठाकर पूरी राजनीति में ही सांप्रदायिकता को निर्णायक बनाने का प्रयत्न नहीं करेंगे? ऐसा हुआ, तो संविधान में दिए गए सारे उद्देश्य ही निरर्थक हो जाएंगे और अगर तीनों मध्यस्थों के फैसले को पंच निर्णय नहीं, बस मध्यस्थता भर माना गया, तो अंत में अदालत को ही निर्णय करना होगा। इन सभी संभावनाओं और आशंकाओं के बावजूद मध्यस्थता के रास्ते को खराब नहीं माना जा सकता। अयोध्या विवाद सुलझना चाहिए, लेकिन सुनिश्चित यह भी किया जाना चाहिए कि भविष्य में इस तरह के विवाद फिर न हों।

शीतला सिंह वरिष्ठ पत्रकार

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