अपने स्वभाव की बुराइयों को जांचकर उन्हें दूर करते चलें

By Independent Mail | Last Updated: Dec 6 2018 2:36PM
अपने स्वभाव की बुराइयों को जांचकर उन्हें दूर करते चलें

हमारा जीवन अनेक समस्याओं में उलझा हुआ है। इनको सुलझाने एवं प्रगति पथ पर उपस्थित रोड़ों को हटाने में बहुधा हमारी शक्ति का एक बहुत बड़ा भाग व्यतीत होता है, फिर भी कुछ ही समस्याओं का हल हो पाता है, अधिकांश तो उलझी ही रह जाती हैं। इस अपूर्णता का कारण यह है कि हम हर समस्या का हल बाहर ढूंढते हैं, जबकि वह हमारे शरीर के अंदर ही छिपा होता है। यदि हम कोई आकांक्षा करने से पहले अपनी सामर्थ्य और बाहरी परिस्थितयों का आकलन करने के बाद आगे बढ़ें, तो हमारी वह आकांक्षा जरूर पूरी हो जाएगी। एक बार के प्रयत्न में न सही, सोची हुई अवधि में न सही, पूर्ण न सही लेकिन कुछ तो ऐसा होगा जो हमें संतोष से भर देगा। यदि आकांक्षा के साथ-साथ अपनी क्षमता और स्थिति का ठीक अन्दाजा न करके बहुत बढ़ा-चढ़ा लक्ष्य रखा गया है, तो उसकी पूर्ति कठिन ही है। ऐसी दशा में खिन्नता भी स्वाभाविक ही है लेकिन यदि स्वभाव में आगा-पीछा सोचने, परिस्थिति के अनुसार चलने की दूरदर्शिता हो, तो उस खिन्नता से बचा जा सकता है और साधारण रीति से जो उपलब्ध हो सकता है, उतनी ही आकांक्षा करके शान्तिपूर्वक जीवन-यापन किया जा सकता है। अपने स्वभाव की त्रुटियों का निरीक्षण करके उनमें आवश्यक सुधार करने के लिए यदि हम तैयार हो जाएं, तो जीवन की तीन चौथाई समस्याओं का हल तुरंत हो जाता है। सफलता के बड़े-बड़े स्वप्न देखने की अपेक्षा हम सोच-समझकर सुनिश्चित मार्ग अपनाएं और उस पथ पर पूर्ण मनोयोग के साथ चलते रहें, तो मस्तिष्क शान्त रहेगा, उसकी पूरी शक्तियां लक्ष्य को पूरा करने में लगेंगी और मंजिल तेजी से पास आती चली जाएगी। समय-समय पर थोड़ी-थोड़ी जो सफलता मिलती चली जाएगी, उसे देखकर सन्तोष भी मिलता जाएगा।

इस प्रकार लक्ष्य की ओर आपके कदम एक व्यवस्थित गति के अनुसार बढ़ते चले जाएंगे। इसके विपरीत यदि हमारा मन बहुत कल्पनाशील है, बड़े-बड़े मंसूबे बांधता और बड़ी-बड़ी सफलताओं के सुनहरे महल बनाता रहता है, जल्दी से जल्दी बड़ी से बड़ी सफलता के लिए आतुर रहता है, तो मंजिल काफी कठिन हो जाएगी। जो मनोयोग कार्य की गतिविधि को सुसंचालित रखने में लगाना चाहिए था, वह सपने देखने में उलझा रहता है। उन सपनों को इतनी जल्दी साकार देखने की उतावली होती है कि जितना श्रम और समय उनके लिए अपेक्षित है, वह हमें भार रूप में प्रतीत होता है। ज्यों-ज्यों दिन बीतते जाते हैं, बैचेनी बढ़ती जाती है। ऐसी दशा में सफलता की मंजिल संदिग्ध होती जाती है। उतावला आदमी सफलता के अवसरों को गंवा देता है। एक संत का कथन है कि मुझे नरक में भेज दो, मैं वहां भी अपने लिये स्वर्ग बना लूंगा। स्वयं को परिष्कृत कर लेने पर व्यक्ति में ऐसी सूझ-बूझ की उत्पत्ति हो जाती है जिससे वह बुरे व्यक्तियों को भी अपना बना लेता है। यदि ऐसी विशेषता कोई व्यक्ति पैदा कर ले, तो यही माना जाएगा कि उसने संसार को सुधार लिया है।

आचार्य श्रीराम शर्मा

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