हाशिमपुरा मामले में देर से इंसाफ

By Independent Mail | Last Updated: Nov 5 2018 10:06PM
हाशिमपुरा मामले में देर से इंसाफ

जाहिद खान

हाशिमपुरा नरसंहार मामले में पीड़ितों को आखिरकार 'इंसाफ' मिल गया है। इस नृशंस नरसंहार के गुनहगारों को 31 साल बाद ही सही अपने किए की सजा मिली है। दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में इस चर्चित मामले में निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए प्रोविंशियल आर्म्ड कॉन्स्टेबुलरी यानी पीएसी के 16 रिटायर जवानों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। जस्टिस एस. मुरलीधर और जस्टिस विनोद गोयल की पीठ ने पीएसी के जवानों को हत्या, अपहरण, आपराधिक साजिश तथा सबूतों को नष्ट करने का दोषी पाया। अदालत का इस बारे में कहना था कि सभी के खिलाफ मजबूत ठोस सबूत हैं। यह सीधे-सीधे हिरासत में मौत का मामला है। इस मामले में पीएसी जवानों ने मानवाधिकार का हनन किया है। अदालत ने इस नरसंहार को पुलिस द्वारा निहत्थे एवं निरीह लोगों की लक्षित हत्या करार देते हुए कहा कि पीड़ितों के परिवारों को इंसाफ के लिए 31 साल इंतजार करना पड़ा। इतने लंबे समय के बाद इंसाफ मिलना न्यायपालिका के उद्देश्य को पूरा नहीं करता है। आर्थिक मदद उनके नुकसान की भरपाई नहीं कर सकती। फिर भी कानून के तहत सभी पीड़ित परिवार अपनी गरिमा व परिवार के भरण पोषण के लिए उचित मुआवजे के हकदार हैं। यह मुआवजा सिर्फ राशि के अनुसार ही तय नहीं किया जाए, बल्कि परिवार के भरण पोषण को ध्यान में रखते हुए दिया जाए। जाहिर है कि अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए जो कुछ भी कहा, उसमें कोई भी बात गलत नहीं है। न्यायपालिका से संबंधित प्रचलित धारणा है कि देर से मिला न्याय, न्याय नहीं कहलाता। फिर इस मामले में, तो इंसाफ मिलने में पूरे 31 साल लगे। इस दौरान नरसंहार के तीन मुजरिम, बिना सजा पाए अपनी मौत मर गए। वहीं पीड़ितों ने इंसाफ पाने के लिए क्या-क्या नहीं झेला। पीड़ित तमाम दवाब झेलते रहे, लेकिन अपने इरादे से नहीं डिगे। उनका ये हौसला और पक्का इरादा ही था कि आज उन्हे इस मामले में इंसाफ मिला है। अदालत के इस फैसले से पीड़ितों के अपने वापस लौट नहीं आ जाएंगे, पर उनके जख्मों पर कुछ मरहम जरूर लगेगा। वर्दी की आड़ में जो लोग, मजलूमों पर जुल्म-ओ-सितम ढाते हैं, उन्हें डर रहेगा कि यदि उन्होंने कुछ गलत किया, तो कानून उन्हें नहीं छोड़ेगा। कभी न कभी उन्हें अपने किए की सजा जरूर मिलेगी।

'हाशिमपुरा नरसंहार' नाम से पहचाने जाने वाला यह दर्दनाक मामला, साल 1987 के 22-23 मई की दरमियानी रात का है। उस वक्त पश्चिमी उत्तर प्रदेश का यह इलाका साम्प्रदायिक दंगों में झुलस रहा था। मेरठ जिले के हाशिमुपरा गांव में अचानक पीएसी के जवान आए और एक सभा से अल्पसंख्यक समुदाय के 42 से 45 नौजवानों को ट्रक में भरकर अपने साथ ले गए। बाद में पीएसी के जवानों ने ट्रक में सवार लोगों को मुरादनगर गंगनहर पर ले गए और उन्हें गोलियों से भून दिया। बाद में उनकी लाशों को नहर में फेंक दिया। यह मामला तब सामने आया, जब इस वारदात से बच निकले एक शख्स ने पूरा किस्सा गांववालों को सुनाया। जैसे ही यह मामला सामने आया, पूरे देश में हंगामा मच गया। मीडिया और जनता के दवाब में सरकार ने घटना के दो दिन बाद 24 मई को मामले की जांच प्रदेश की सीबीसीआईडी को सौंप दी। जांच के नौ साल बाद, साल 1996 में गाजियाबाद के चीफ ज्युडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने मुल्जिमों के खिलाफ इस मामले में चार्जशीट पेश की गई। जिसकी सुनवाई साल 2000 में शुरू हुई। लेकिन जैसा कि इस तरह के मामलों में अक्सर होता है, याचिकाकर्ताओं पर कई तरह के दवाब पड़ने लगे। उन्हें यह मामला अदालत से वापस लेने के लिए धमकाया जाने लगा। लेकिन पीड़ित जरा सा भी नहीं घबराए और उन्होंने इंसाफ के लिए सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई। प्रभावित परिवारों की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने सितंबर 2002 में यह मामला, उत्तर प्रदेश से दिल्ली की तीस हजारी अदालत में स्थानांतरित कर दिया।

बहरहाल, चार साल के अंतराल और अभियोजन पक्ष की ओर से 91 लोगों की गवाही के बाद, साल 2006 में मुल्जिमों पर इल्जाम तय हुए। लेकिन जब इस मामले में साल 2015 में इंसाफ आया, तो सभी ठगे रह गए। इस मामले में फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा कि यह बहुत तकलीफदेह है कि कुछ बेगुनाह लोगों को इतनी यंत्रणा झेलनी पड़ी और एक सरकारी एजेंसी ने उनकी जान ले ली। इस मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश ने अफसोस भरे लहजे में कहा, जांच एजेंसी और अभियोजन पक्ष दोषियों की पहचान को साबित करने लायक सबूत पेश करने में नाकाम रहा। लिहाजा मौजूदा परिस्थितियों में सभी 16 अभियुक्तों को उन पर लगाए सभी आरोपों से बरी किया जाता है। निचली अदालत द्वारा हत्या और अन्य अपराधों के आरोपी 16 पूर्व पुलिसकर्मियों को बरी करने के फैसले से पीड़ित परिवार, जरा सी भी हिम्मत नहीं हारे। पीड़ित परिवारों, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, उत्तर प्रदेश सरकार और दीगर लोगों ने इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। जहां अदालत ने आखिरकार पीड़ितों के हक में इंसाफ सुनाया। हाशिमपुरा नरसंहार मामले से जुड़ी जिस जनरल डायरी (जीडी) को उत्तर प्रदेश सरकार 30 साल तक दबाए रही, अदालत में सुनवाई के दौरान जीडी ही सबसे अहम सुबूत साबित हुई और सजा का आधार बनी। न्यायमूर्ति एस मुरलीधर व न्यायमूर्ति विनोद गोयल की पीठ ने कहा कि अदालत में पेश की गई जीडी से स्पष्ट है कि जो ट्रक घटना के दिन हाशिमपुरा गया था और वहां से 42 से 45 लोगों को लेकर आया था। उसमें पीएसी के 16 जवान मौजूद थे। हाईकोर्ट ने हाशिमपुरा मामले की जांच करने वाली उत्तर प्रदेश की सीबीसीआईडी की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि जिस तरह से जांच एजेंसी से जुड़े अधिकारियों ने प्रकरण से जुड़े अहम दस्तावेजों को सही समय पर पेश नहीं किया। उससे उनकी भूमिका संदेह के घेरे में है। हाशिमपुरा मामले में आज भले ही पीड़ितों को इंसाफ मिल गया हो, लेकिन यह मामला हमारे पूरे सिस्टम जिसमें पुलिस, जांच एजंसियां और न्यायपालिका भी शामिल है, पर सवालिया निशान लगाता है। हाशिमपुरा हत्याकांड, धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले हमारे देश पर एक ऐसा दाग है, जो शायद ही कभी उसके दामन से छूटे। इस शर्मनाक घटना ने पूरे सिस्टम की जैसे पोल खोलकर रख दी। एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष समाज में राज्य से न्यूनतम अपेक्षा यह की जाती है कि वह बिना किसी भेदभाव के अपने सभी नागरिकों के जान-माल की हिफाजत करेगा। यदि उसके साथ कहीं अत्याचार या नाइंसाफी होती है, तो उसे इंसाफ मिलेगा। संविधान भी उन्हें इस बात की जमानत देता है। बावजूद इसके हाशिमपुरा मामले में पीड़ितों को इंसाफ दिलाने में पूरा तंत्र, तीस साल तक नाकाम रहा। इतने लोगों की दिल दहला देने वाली हत्या के मुकदमे की सुनवाई के पूरे होने में 31 साल लग गए। होना तो यह चाहिए कि हर वे मामला जिसमें ज़िंदगी, आज़ादी और नागरिकों के अधिकार का मसला शामिल हो, उस मामले की फास्ट ट्रेक कोर्ट में सुनवाई हो और दोषी लोगों को सख्त से सख्त सजा दी जाए। फिर मुजरिम चाहे जैसा रसूख वाला क्यों न हों। हाशिमपुरा मामले में गुनहगार खुद पुलिस थी, लेकिन पुलिस के आला अधिकारियों ने ही अपने मातहतों को बचाने का काम किया। इस मामले के ज्यादातर सबूतों को दबाया गया या नष्ट कर दिया गया। सबसे हैरान कर देने वाली बात यह है कि इस हत्याकांड के अभियुक्त पुलिसवालों को कभी भी निलंबित नहीं किया गया। वे पुलिस बल में बने रहे और उनमें से कुछ को तो तरक्की भी दे दी गई। इस दरमियान उन्होंने जांच को नियंत्रित और इसके नतीजों को प्रभावित करने की कोशिश की। होना तो यह चाहिए कि जो इस अपराध के सहभागी या आपराधिक लापरवाही के दोषी हैं, उनकी भी इस मामले में जिम्मेदारी तय की जाए और उन्हें उनके किए की उचित सजा मिले। तभी इस मामले में पीड़ितों को सही इंसाफ मिलेगा।

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