साझी संस्कृति विरासत ही नहीं हमारी ताकत भी

By Independent Mail | Last Updated: Apr 7 2019 2:12AM
साझी संस्कृति विरासत ही नहीं हमारी ताकत भी

लाख प्रचार के बाद भी भारत में धार्मिक अंतरसंबंध बेहद मजबूत है। यही करण है कि भारत में शांति बनी हुई है। इसका सीधा श्रेय नि:संदेह हिन्दुओं को जाता है। हालांकि भारत के मुसलमान भी दुनिया के अन्य मुसलमानों की तुलना में ज्यादा समझदार और संवेदनशील हैं। मसलन अंतरधार्मिक-सद्भावना, मुसीबत के समय ढाल का काम करती है। यह इस देश के हिन्दू और मुसलमान दोनों समझते हैं। यही कारण है कि हाल ही में पुलवामा में अर्धसैनिक बल पर हुए फिदायीन हमले के कारण हमारे सीआरपीएफ के जवानों की मौत के बाद धार्मिक सीमाओं को लांघते हुए लोगों के द्वारा की गई प्रतिक्रिया ने एक बार फिर से अंतरधार्मिक संबंधों की प्रगाढ़ता को साबित कर दिया है। भारत की अंतरधार्मिक सद्भावना व मिश्रित संस्कृति बेहद मजबूत है। यही नहीं इस तरह की आपात स्थिति में यह और प्रबल हो जाती है। इस दौरान अपने सूबों से बाहर रहने वाले कश्मीरी मुसलमानों को हिन्दुओं द्वारा दी गई सुरक्षा की कई घटनाएं सामने आई हैं। इनमें से कुछ घटनाओं की यहां चर्चा करना जरूरी होगा।

देहरादून, उत्तराखंड में करीब 150 कश्मीरी मुस्लिम छात्रों को उनके हिन्दू साथियों ने अपने घरों में आश्रय व खाना उपलब्ध करवाया। पटना, बिहार में कश्मीरियों के लिए हिन्दुओं ने अपने दरवाजे खोले। हैदराबाद, तेलंगाना में कश्मीरी व्यापारियों की सुरक्षा सूनिश्चित करते हुए उन्हें घरों तक सुरक्षित पहुंचाने की व्यवस्था की गई। अजमेर राजस्थान की दरगाह, गरीबनवाज से मुसलमानों को आतंकवादियों और उनके पनाहगारों को बेनकाब करने की अपील की गई। चंडीगढ़ में कश्मीरी दुकानदारों को खाना और आश्रय दिया गया। ये घटनाएं भारत की सांस्कृति विरासत में मौजूद एक-दूसरे के प्रति मानवीय सरोकार की भावना को चिह्नित करता है। ये कोई आज की बात नहीं है। हमारे पुरखों ने इसे बनाया और हम उस विरासत को संजोए हुए हैं। आपको पता होना चाहिए कि हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर बसंत पंचमी बनाई जाती है। 700 साल से लगातार हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया की दरगार पर बसंतोत्सव मनाया जा रहा है। वहां बसंतोत्सव इस साल भी धूमधाम से मनाया गया। बसंतोत्सव को दरगाह में देखने के लिए तमाम अलग-अलग जगहों से पीले पोशाक में लोग भी पहुंचे और मजार पर पीले फूल और पीली चादर चढ़ाई गई। बसंतोत्सव के इस मौके पर लोगों में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। लोगों ने खूबसूरत कव्वाली के साथ अपनी शाम दरगाहर में गुजारी। इस रंगारंग त्यौहार को सभी मजहबों के लोगों ने चिश्ती शाह की याद में पूरे मेल-मिलाप के साथ मनाया। इस उत्सव के साथ एक रोचक कहानी जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि औलिया निजामुद्दीन अपने भांजे के गुजर जाने के बाद बेहद गमगीन थे। बसंत के मौके पर हजरत अमीर खुसरो ने कुछ औरतों को गाना गाते और पीले फूल, पीली पोशाकों में जाते देखा तो खुसरो भी ऐसा रूप धारण कर हजरत निजामुद्दीन औलिया के सामने गाना गाने लगे, जिससे औलिया खुश हो गए। इसके बाद यहां होली का त्यौहार मनाया जाने लगा। यह त्यौहार विगत 700 साल से मनाया जा रहा है। इसीलिए हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह साम्प्रदायिक सौहार्द की निशानी मानी जाती है।

संत, फकीर, सूफी इत्यादि अपनी शिक्षाओं के द्वारा देश के हर नुक्कड़ और कोने में यहां की मिश्रित संस्कृति तथा सहअस्तित्व के समीकरण को कायम रखने व इससे भिन्न धार्मों को मानने वालों के दरम्यान मजबूत करने का कार्य कर रहे हैं। ताकि उनके बीच प्रेम सम्मान आत्मसात करने वाले संबंध तथा सर्वशक्तिमान के एकत्व की भावना को प्रसारित किया जा सके। ऐसे ही दो नामवर व्यक्तित्व स्वामी शंकर देव व अजान फकीर जी ने अपना पूरा जीवन असम में शांति व सद्भाव फैलाने में लगा दिया। इन दोनों ने बिना किसी धार्मिक भेदभाव के ईश्वर तथा इंसान को जोड़ने पर जोर दिया। इन दोनों संतों के द्वारा खड़ी की गई विरासत अब असमी संस्कृति का हिस्सा बन गई है। प्रार्थना सभाओं के लिए नियत नामघर, जिनकी स्थापना शंकरदेव तथा विभिन्न दरगाहों के सूफी व फकीरों ने की थी के दरवाजे हिन्दुओं व मुसलमानों दोनों के लिए खुले हैं। इसी प्रकार विभिन्न समुदाय के लोग सामूहिक तौर पर सरस्वती पूजा, दुगा र्पूजा, ईद-मोहर्रम तथा बिहू इत्यादि का त्योहार, धार्मिक सीमाओं से ऊपर उठकर मनाते हैं। इस बात से यह साबित होता है कि मनुष्य ईश्वर की रचना है, जबकि धर्म मानव की देन है तथा मनवता सर्वोच्च धर्म है। भारत इसी कारण दुनिया के अन्य देशों से भिन्न है। यहां की संस्कृति इतनी प्यारी है कि लोग यहां खिंचे चले आते हैं। यही इस देश की ताकत भी है। कश्मीर में आतंकवादियों के साथ लोहा लेते हुए इस बार सबसे पहला सीआरपीएफ का कोई शख्स मारा गया तो वह मुसलमान था। इसलिए हमें इस देश की संस्कृति के साथ छेड़छाड़ करने का कोई अधिकार नहीं है।

- रजनी राणा, स्वतंत्र टिप्पणीकार

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