2019 में करें चीन को नियंत्रित करने की कोशिश

By Independent Mail | Last Updated: Jan 7 2019 6:07PM
2019 में करें चीन को नियंत्रित करने की कोशिश

प्रो. सतीश कुमार

साल 2018 को विदेश नीति के मोर्च पर सफल माना जाएगा। गुजरे साल कई परिवर्तन हुए और भारत की छवि बेहतर हुई। शुरू में ऐसा लगा था कि श्रीलंका, नेपाल, मालदीव और अन्य पड़ोसी देश भारत से दूर होते जा रहे हैं, लेकिन 2018 के अंत तक श्रीलंका, मालदीव और बांग्लादेश में जो राजनीतिक परिवर्तन हुए, उससे भारत की स्थिति बेहतर हुई और अब ऐसा लगने लगा है कि चीन की चाल भारत के पड़ोसी देशों में सफल नहीं हो पा रही है। यह सब जरूरी था। पाकिस्तान में भारत विरोध की गूंज इमरान खान के बाद और तेज हुई है। लिहाजा भारत ने स्पष्ट कह दिया है कि पाकिस्तान से किसी तरह की बातचीत तब तक संभव नहीं है, जब तक पाकिस्तान आतंकी गतिविधियों पर रोक नहीं लगाता। चीन के साथ पाकिस्तान की धींगामुश्ती बढ़ती जा रही है। दूसरी तरफ अंतर्राष्ट्रीय परिवर्तन भी भारत के लिए चुनौतियों का कारण बन गया है। रूस, चीन और पाकिस्तान का सामरिक गठजोड़ बन रहा है। वहीं, भारत के साथ अमेरिका और जापान हैं, लेकिन ट्रंप की अविश्वसनीयता के कारण भारत और जापान परेशान हैं। इसलिए हमें आगे के लिए अपनी ही क्षमता पर भरोसा करना होगा। भारत की विदेश नीति कई दशकों से पड़ोसी देशों के दो तत्वों से प्रभावित होती है। पहला, उस देश की राजनीतिक विचारधारा और दूसरा, भारत के संघीय समीकरण। मसलन, श्रीलंका की समस्या तमिलनाडु की राजनीति से प्रभावित होती है, तो बांग्लादेश के साथ संबंध पश्चिम बंगाल और उत्तर पूर्वी राज्यों के राजनीतिक कारको से। नेपाल के मधेशी समीकरण को लेकर बिहार और उत्तर प्रदेश की राजनीति झुलसती रहती है। इसका असर भारत की विदेश नीति पर पड़ता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पड़ोसी प्रथम वाली सोच गुजराल सिद्धांत और नेहरू की सोच से अलग है। शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और उसके बाद चीन निरंतर भारत के पड़ोसी देशों के बीच अपनी घुसपैठ बनाने की जुगत में रहे हैं। भारत को अब सावधान रहना चाहिए। भारत से कई गलतियां पिछले पांच वर्षों में हुई हैं, जिन्हें दुरुस्त करने की जरूरत है। नेपाल की राजनीति दो समुदायों में बंट गई है, पहाड़ी और मधेशी के बीच। मधेशी भारत समर्थक हैं, लेकिन सत्ता की बागडोर पर पहाड़ियों की पकड़ है। पहाड़ी पहले चीन के समर्थक नहीं थे, लेकिन अब वे उसके समर्थ हो गए हैं। जबकि उनका चीन के साथ न तो धार्मिक लगाव है और न ही सांस्कृतिक जुड़ाव। हम से यह गलती हुई कि हमने केवल नेपाली कांग्रेस से अपने संबंध रखे, अन्य दलों से नहीं।इसका फायदा चीन ने उठाया और पहाड़ी लोगों के बीच भारत विरोधी बीज बो दिए। इस गलती को सुधारना पड़ेगा।

बांग्लादेश में हाल में संपन्न हुए चुनाव में शेख हसीना की आवामी लीग की जीत हुई है। यह भारत के लिए सुखद है, लेकिन चिंता का कारण यह भी है कि वहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर पड़ती जा रही है। वहां की दलगत राजनीति भारत की विदेश नीति को अपने रंग में रंग चुकी है। बेशक बेगम खालिदा जिया की नीति भारत विरोधी रही है, लेकिन हमारे संबंध उनसे भी रहने चाहिए। श्रीलंका की कहानी भी यही है। तमिल उत्पीड़न के कारण हम वहां के जातीय युद्ध का हिस्सा बन गए। इस सोच को बदलने की जरूरत है। भूटान भारत का विशेष पड़ोसी देश है। पिछले साल हुए समझौते के अनुसार विदेश नीति और सुरक्षा के मसले पर भारत उसकी मदद करता है। डोकलाम विवाद के जख्म अभी भरे नहीं हैं कि भारत के विदेश विभाग द्वारा बौद्ध गुरु करमापा के संदर्भ में कुछ तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, जो भारत के लिए सुकूनदायक नहीं है। यह भी उम्मीद है कि दलाई लामा के बाद करमापा ही तिब्बतियों के सबसे बड़े गुरु होंगे। ऐसे में हम उनका विरोध क्यों करें? अफगानिस्तान में भी रूस और चीन की मिलीभगत के कारण समीकरण बदल रहे हैं। हालांकि, भारत ने चीन के जाल को कुतरने की कोशिश की है। कुल मिलाकर भारत का वैश्विक कद पिछले पांच साल में बढ़ा है। इन्हीं वर्षों में फ्रांस और जापान हमारे बेहतर सहयोगी बने हैं। हमारा आसिआन के कुछ देशों कि साथ आर्थिक और सामरिक समीकरण बेहतर हुआ है, लेकिन भारत की विदेश नीति की सफलता के लिए यह जरूरी है कि चीन की शक्ति क्षीण हो। चीन की शक्ति जितनी क्षीण होगी, भारत की पकड़ उतनी ही मजबूत होगी। 2019 में भारत सरकार को चीन पर शिकंजा कसने की कोशिश करनी चाहिए। उम्मीद है कि मोदी सरकार यह प्रयास करेगी।

विदेशी मामलों के जानकार

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