जनतंत्र विरोधी रुझान का बढ़ना खतरनाक

By Independent Mail | Last Updated: Jan 4 2019 10:05PM
जनतंत्र विरोधी रुझान का बढ़ना खतरनाक

विश्वनाथ सचदेव

हाल ही में हुए पांच राज्यों के चुनाव-परिणामों से भाजपा को धक्का अवश्य लगा है और पार्टी का नेतृत्व जनमत के बदलते रूप से स्वाभाविक रूप से चिंतित है, पर पार्टी इस बात पर संतुष्टि अनुभव कर सकती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में बहुत ज्यादा कमी नहीं आई है। लगभग छह-सात महीने पहले अमेरिका की एक संस्था 'पियू' द्वारा किए गए सर्वेक्षण में यह बात सामने आई थी। पांच राज्यों में चुनाव इस सर्वेक्षण के बाद के हैं, लेकिन इन परिणामों के आधार पर भाजपा को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। यह एक स्थापित तथ्य है कि देश में भाजपा के बढ़े हुए समर्थन का एक बड़ा कारण नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता भी है और अमेरिकी संस्था का सर्वेक्षण भाजपा के लिए कुल मिलाकर भरोसा देने वाला ही है। लेकिन जनतंत्र में विश्वास रखने वालों के लिए इस सर्वेक्षण में कुछ ऐसी बातें भी हैं, जो चिंता का कारण होनी चाहिए। इसमें सबसे प्रमुख तथ्य यह है कि भारत की जनता का भरोसा आज भी किसी ताकतवर हस्ती में है। वैसे भी व्यक्ति पूजा हमारी संस्कृति का हिस्सा रही है, लेकिन जनतंत्र में व्यवस्था के बजाय व्यक्ति में इस तरह का विश्वास होना बहुत अच्छी बात नहीं है। निश्चित रूप से किसी भी राजनीतिक दल में नेतृत्व की विशिष्ट भूमिका होती है, लेकिन किसी व्यक्ति विशेष में बढ़ता विश्वास कुल मिलाकर जनतंत्र के लिए बहुत अच्छी बात नहीं मानी जा सकती। व्यक्ति जब राजनीतिक दल या विचारधारा से बड़ा बन जाता है, तो इसका अर्थ जनतांत्रिक मूल्यों का कमजोर होना ही माना जाना चाहिए। हम अपने देश में आपातकाल के दौरान व्यक्ति के बड़ा होने की प्रवृत्ति का परिणाम भुगत चुके हैं। बहरहाल, सन‍् 2018 में जारी की गई 'पियू' की इस रिपोर्ट के अनुसार सन‍् 2017 में 55 प्रतिशत अर्थात आधे से अधिक भारतीयों ने ऐसी शासन व्यवस्था को पसंद किया था, जिसका ताकतवर नेता संसद अथवा अदालतों के हस्तक्षेप के बिना निर्णय ले सके। इसका अर्थ यह है कि आधे से अधिक भारतीय यह मानते हैं कि संसद और अदालतें विकास की गति को धीमा कर रही हैं। यह सही है कि जो संसदीय प्रणाली हमने अपनायी है, उसमें विकास की गति धीमी होती है, निर्णय लेने में देरी होती है, सत्तारूढ़ दल अथवा व्यक्ति को सत्ता में बने रहने के लिए कुछ समझौते करने पड़ते हैं। लेकिन इसके बजाय किसी एक ताकतवर व्यक्ति के हाथों में शासन तंत्र का होना किसी भी दृष्टि से जनतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं हो सकता। जनतंत्र जनता का शासन है और किसी ताकतवर व्यक्ति के हाथों में शासन की बागडोर होने का मतलब जनता का शासन नहीं रह जाता। व्यक्ति का विवेक, उसकी सनक और सत्ता में बने रहने की उसकी ललक निर्णय को प्रभावित करती है। राजाओं का शासनकाल तो आज की पीढ़ी ने नहीं देखा, पर तानाशाही के परिणामों से हम अपरिचित नहीं हैं। ऐसे में 'ताकतवर व्यक्ति' को जनता द्वारा पसंद किया जाना जनतांत्रिक व्यवस्था के प्रति जनता के अविश्वास को ही दर्शाता है। यह एक खतरनाक स्थिति है। 'पियू' के इस सर्वेक्षण में कुछ और बातें भी उभर कर आई हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार 53 प्रतिशत भारतीयों ने सैनिक सत्ता में विश्वास प्रकट किया है। यह सचमुच चिंता की बात है कि इस विश्वव्यापी सर्वेक्षण में यह पाया गया है कि अन्य किसी देश की तुलना में भारत में निरंकुश शासन को अधिक पसंद किया गया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दो-तिहाई भारतीय यह मानते हैं कि 'देश में शासन चलाने का बेहतर तरीका विशेषज्ञों के हाथ में सत्ता सौंपना होगा। 'पियू' के इस सर्वेक्षण में यह जानने की कोशिश की गई थी कि ताकतवर व्यक्ति की सत्ता, सैनिक शासन और विशेषज्ञों के शासन में विश्वास जताने वाले लोग, किस राजनीतिक विचारधारा या पार्टी के साथ जुड़े हैं और सर्वेक्षण के अनुसार इस प्रश्न का उत्तर है, भाजपा। जनतांत्रिक व्यवस्था और मूल्यों में विश्वास करने वालों का इस रुझान पर चिंतित होना स्वाभाविक है। चिंता की बात यह नहीं है कि कोई एक व्यक्ति देश में सर्वाधिक ताकतवर बन रहा है और चिंता इस बात की भी नहीं होनी चाहिए कि कोई दल विशेष किसी और बड़े दल से देश को विहीन करना चाहता है। लेकिन चिंता इस बात की होनी चाहिए कि देश में जनतंत्र विरोधी सोच पनप रही है। ऐसा नहीं है कि यह प्रवृत्ति सिर्फ हमारे भारत में ही है। अमेरिका, रूस, ब्राजील जैसे देशों में भी इस सोच के बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं। उदार सोच के व्यक्तियों को इस बात पर चिंतित होना ही चाहिए कि यह प्रवृत्ति आखिर क्यों बढ़ रही है? जिस जनतांत्रिक व्यवस्था को हमने अपने देश के लिए अपनाया है और पिछले सात दशक से अधिक समय से जिसकी सफलता के हम ध्वजवाहक हैं, उसे सबसे कम खामियों वाली शासन व्यवस्था माना गया है। अपनी सारी कमियों के बावजूद जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन एक ऐसी प्रणाली है, जिसमें किसी एक व्यक्ति अथवा सोच के डंडे से जनसामान्य को हांका नहीं जाता। ऐसे में आज जो चुनौती उदारवादियों के सामने है, वह यह सिद्ध करने की है कि जनतंत्र आज भी विकास की सर्वाधिक कारगर व्यवस्था है। यह बात हमें समझनी होगी कि अनुशासन की दुहाई देकर स्वतंत्रता के मूल्यों को कम नहीं किया जा सकता। स्वतंत्रता सबसे बड़ा मानवीय मूल्य है और जनतंत्र इस मूल्य की रक्षा का कारगर उपाय। ताकतवर व्यक्तित्व के नाम या लोक-लुभावन वक्तव्य के बल पर जनतांत्रिक मूल्यों को कमतर बनाने-बताने की कोशिश के सफल होने का मतलब एक मानवीय सोच की हार होगी। यह मानवीय सोच हर एक को समर्थ बनने में विश्वास करती है। समाज में समानता के सिद्धांत को मजबूती से पनपाने की स्थितियों के निर्माण में विश्वास करती है। ताकतवर हस्ती नहीं, ताकतवर मानवीय सोच हमारी आवश्यकता है। जनतंत्र ऐसी ही मानवीय सोच वाली शासन प्रणाली है। सेना की ताकत या विशेषज्ञों के सहारे या फिर किसी एक व्यक्तित्व के बल पर विकास की सीढ़ियां तो शायद चढ़ी जा सकती हैं, पर ये सीढ़ियां उस लक्ष्य तक नहीं पहुंचातीं, जिसे मानवीय विकास के नाम से जाना जाता है। मानवीय विकास यानी मनुष्य की क्षमता में विश्वास करके आगे बढ़ना, मनुष्य के विवेक पर भरोसा करना। किसी एक ताकतवर नेतृत्व पर भरोसा करने का मतलब है, सामूहिक विवेक की ताकत को नकारना। सामूहिक विवेक में विश्वास ही जनतंत्र का आधार और उसकी ताकत है। आवश्यकता इस विवेक को जाग्रत रखने की है। इसमें भरोसा रखने की है।

वरिष्ठ पत्रकार

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