कैसे खत्म होगा राजनीति में वंशवाद?

By Independent Mail | Last Updated: Apr 9 2019 12:14AM
कैसे खत्म होगा राजनीति में वंशवाद?
रघु ठाकुर
 
2019 लोकसभा चुनाव के पूर्व एक बार देश में राजनीति वंशवाद पर बहस शुरू हुई। वैसे तो यह बहस कोई नई नहीं है। आजादी के बाद वंशवाद का सबसे प्रखर विरोध स्व. लोहिया ने किया था और तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. जवाहरलाल नेहरू के परिवारवाद पर सीधी उंगली उठाई थी। लोहिया को यह उंगली उठाने का नैतिक अधिकार भी था, क्योंकि उनका राजनैतिक जीवन पूर्णत: वंशवाद से परे था। लोहिया के अनुयायी अनेक लोग ऐसे हुए जो पार्टी के या सरकार के बड़े-बड़े पदो पर पहुंचे, संसद व विधानसभा में पहुंचे, परन्तु उन्होंने कभी भी अपने परिवार को तंत्र की ताकत से आगे बढ़ाने का प्रयास नहीं किया। स्व. मधुलिमये, कपूर्री ठाकुर, रविराय, मृणाल गोरे राजनारायण जैसे अनेकों नाम लिए जा सकते हैं। हॉलाकि भारतीय राजनीति परिवारवाद से मुक्त नहीं हो सकी। लगभग 3 वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारणी में परिवारवाद के खिलाफ राय दी थी। मैंने इसे पढ़कर उनकी तारीफ भी की थी और अपने अनेक प्रिय मित्र साथियों की आलोचना भी सही थी। जयशंकर गुप्ता और कुछ मित्रों ने लिखा था कि आप धोखा खाएंगे। मैंने उन्हें कहा था कि हमको व्यक्ति की नीयत देखनी चाहिए और कुछ समय इंतजार भी करना चाहिए। मेरे मित्रों की बात सही निकली। भाजपा ने उप्र विधानसभा चुनाव और बाद में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में परिवारवाद को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया, उल्टे परिवारवाद के आधार पर ही कई टिकिट दिए। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ आदि के चुनाव में जिताऊ प्रत्याशी के नाम पर नेता पुत्रों को टिकिट देकर उपकृत किया गया था यहां तक कि भाजपा की मप्र कार्यकारिणी में प्रधानमंत्री के सुझाव पर चर्चा हुई और राज्य शाखा ने प्रधानमंत्री के प्रस्ताव को नकार  दिया। मैं नहीं जानता हूं कि प्रधानमंत्री की घोषणा या कथन महज औपचारिकता थी या वे अपने पार्टी के संगठन को नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं, जो भी हो कुल मिलाकर भाजपा भी परिवार की पोषक पार्टी के रूप में सामने है फर्क सिर्फ इतना है कि कांग्रेस में शीर्ष नेतृत्व परिवारवाद से लेकर नीचे तक है और भाजपा में शीर्ष के नीचे का परिवारवाद। 
परिवारवाद के पक्ष में कांग्रेस पार्टी के लोग तो आरंभ से रहे है। हांलाकि आजादी के बाद कांग्रेस संगठन सत्ता का पिछलग्गू नहीं बना था। स्व. नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष होने के साथ-साथ प्रधानमंत्री पद पर भी थे। उन्होंने अपने गृहनगर इलाहाबाद में अपने दामाद स्व. फिरोज गांधी को 50 के दशक में पर्यवेक्षक बनाकर भेजा था। जिला पार्टी ने इसका विरोध किया और जवाहरलाल जी ने स्व. फिरोज गांधी को पर्यवेक्षक पद से वापस बुला लिया। हांलाकि यह स्वायत्ता थोड़े ही दिन चल पाई और उसके बाद जो छिट-पुट पार्टी में आजादी के स्वर थे वे भी दबा दिए गए। वैसे भी जब दो शीर्ष पद प्रधानमंत्री व पार्टी अध्यक्ष एक ही व्यक्ति के पास होंगे तो पार्टी जो आजादी के आंदोलन की पार्टी मानी जाती थी ने अपनी आजादी को स्वत: खो दिया  और वह शीर्ष और सत्ता की पिछलग्गू बन गई। स्व. इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने परिवारवाद को मजबूती से स्थापित किया तथा दल के बड़े प्रभावी नेताओं के बच्चों को उनके स्थान पर टिकिट देना शुरू किया। इस प्रक्रिया से जहां एक तरफ जो थोड़े बहुत विरोध के स्वर निजी तौर से उठ सकते थे वे स्वत: समाप्त हो गए और नेहरू परिवार के पद भी नीतिगत और स्थाई हो गए। जब कभी इसकी आलोचना हुई तो कांगे्स के नेताओं ने तर्क करना शुरू किया कि अगर डॉक्टर का बेटा डॉक्टर बन सकता है तो नेता का बेटा नेता क्यों नहीं बन सकता? वे यह भूल गए कि डॉक्टर या वकील का बेटा जब डॉक्टर या वकील बनता है तो उसे कम से कम परीक्षा पास करनी होती है। परन्तु राजनीति में ऐसी कोई परीक्षा नहीं देना पड़ती। अब चूंकि भाजपा के लोगों ने भी एक प्रधानमंत्री को छोड़कर बकाया नीचे के स्तर पर परिवारवाद को स्वीकार कर लिया है। लगभग हर बड़े नेता की संतान टिकट मांग और पा रही है अत: अब उनकी भी लाचारी है कि उन्हें परिवारवाद की सफाई देना है। भाजपा का यह गंभीर अंतरविरोध सामने है, जिसमें प्रधानमंत्री एक तरफ खड़े हैं और लगभग भाजपा उनके प्रतिपक्ष में खड़ी है। प्रधानमंत्री अपनी राय को लागू कराने के लिए कुछ दृढ़ता दिखाएंगे या शाब्दिक उपदेश देकर चुप्पी साध लेंगे, यह शीघ्र ही सामने आ जाएगा। हांलाकि अभी तक देश में आम लोगों को ऐसा विश्वास है कि चूंकि नरेन्द्र मोदी का अपना कोई परिवार नहीं है अत: वे पार्टी में परिवारवाद को रोकेंगे। संघ जो भाजपा के सत्ता और संगठन को नियंत्रित करता आया है उसकी जानकारी व सहमति में विधानसभाओं के चुनावो में या पिछले लोकसभा के चुनावो में कई नेता पुत्रों को टिकट दिए गए, उससे उनकी भूमिका भी संदिग्ध नजर आती है। 
चंकि संगठन मंत्री और प्रचारक संघ से भाजपा में प्रतिनियुक्तिपर भेजे जाते हैं और वे संघ के निर्देशों को भाजपा में लागू करते हैं। अत: यह मानने का पर्याप्त आधार है कि प्रधानमंत्री पद के नीचे के स्तर पर या शीर्ष स्तर पर भाजपा के संगठन व सत्ता में चल रहा परिवारवाद संघ की मूक सहमति से है। अब तो कांग्रेस से ज्यादा भाजपा के नेताओं ने जोरशोर से और कुतर्कों से परिवारवाद का समर्थन शुरू कर दिया है। कुछ भाजपा के नेता बोलते हैं कि अगर नेता पुत्रों को टिकट नहीं मिलेंगा तो वे दूसरी पार्टी में जाकर राजनीति करेंगे। कुछ लोग बोलते हैं कि नेताओं के पुत्रों को टिकट नहीं मिलेगा तो क्या नेता पुत्र भीख मांगगे? इन दोनों ही तर्कों को कसौटी पर कसना चाहिए। यह तर्क कि अगर नेताओं के पुत्रों को टिकिट नहीं मिलेगा तो वे दूसरे दलों में राजनीति करने जाएंगे यह कुतर्क भी है और झूठ भी है। अगर कोई नेता पुत्र किसी दूसरे दल की विचारधारा से सहमत होकर जाता है तो उसे यह अधिकार है बल्कि इस प्रक्रिया से लोकतंत्र संवेदनशील परिपक्व और उत्तरदायित्व पूर्ण बनेगा। और यह कहना कि अगर नेता पुत्रों को टिकिट नहीं मिलेगा तो क्या वह भीख माँगेंगे? यह समूचे कार्यकर्ताओं का अपमान है। क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि उनकी पार्टी के कार्यकर्ता जिन्हें टिकट नहीं मिलते वे भिखारी हैं और भीख मांगकर जी रहे हैं? किसी भी राजनैतिक दल के कार्यकर्ताओं का इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है? अब समय आ गया है कि लोकतंत्र को नव सामंतवाद से बचाने के लिए जनता आगे आए। जब जनता और कार्यकर्ता इस नव सामंतवाद के खिलाफ विद्रोह करेंगे तभी पार्टियां भी सोचेंगी, देश सोचेगा और राजनीति में बदलाव होगा। अन्यथा हम फिर से आजादी के पहले के उस दौर में जा रहे हैं, जहां 500 राजे-राजवाड़े थे और देश विभाजित था तथा इसी कारण से देश को लंबी गुलामी सहनी पड़ी थी।   
समाजवादी चिंतक
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