जातिवाद की बीमारी को खत्म करे हिंदू समुदाय

By Independent Mail | Last Updated: Jan 9 2019 11:20PM
जातिवाद की बीमारी को खत्म करे हिंदू समुदाय
  • तरुण विजय

जब-जब हिंदुओं को अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा का अवसर मिला, तब-तब विदेशी विधर्मियों से बढ़कर स्वदेशी स्वधर्मियों ने ही अपने अहंकार और भीतरी विरोधियों से शत्रुता को प्रमुखता देते हुए उसके मार्ग में बाधाएं डालीं और एक तरह से मिलती-मिलती विजय पानीपत की पराजय में बदलती चली गई। दुर्भाग्य से इतिहास भी तो पराजय का ही पढ़ाया जाता है, पर पानीपत कितनों को याद होगा? यह सवाल जरा स्वयं से पूछिए। वह समय आ गया है, जब हम अपने आप से यह भी पूछें कि जो समाज अपनी जय और पराजय की स्मृति नहीं रखता, उसका क्या भविष्य होगा? भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बारे में अदालत ने जो फैसला दिया है, उसी से स्पष्ट हो जाता है कि इस देश में जो लोग हिंदू संस्कृति या हिंदू हित की बात राजनीति में करने के लिए उतरते हैं, उन्हें बाहर और भीतर से कितने आघात एवं झूठे और बेबुनियाद आरोप सहन करने पड़ते हैं। लेकिन यह भी सच है कि कई बार लम्हों की खता सदियों तक को झेलनी पड़ती है। हिंदू भूल गए हैं कि अगर स्वामी दयानंद सरस्वती ने पाखंड खंडिनी पताका उठाकर हिंदुओं के आलस्य और रूढ़िवादिता के साथ पारस्परिक शत्रुता और कर्मकांड में डूबे रहने पर करारे प्रहार नहीं किए होते तथा परंपरागत हिंदुओं की अकर्मण्यता को वेद-शक्ति के प्रहार से चूर-चूर नहीं किया होता, तो उत्तर भारत ईसाई बन गया होता। स्वामी दयानंद सरस्वती ने जातिप्रथा के आधार पर भेदभाव को हमारे घरों से दूर किया और अहंकारी ब्राह्मणों के कर्मकांड को चुनौती देते हुए शुद्धि आंदोलन चलाया तथा धर्मांतरित होकर ईसाई तथा मुसलमान बन चुके हिंदुओं को वापस लाैटा लाए। स्वामी दयानंद सरस्वती के बाद स्वामी श्रद्धानंद शुद्धि आंदोलन के महापुरुष थे और उनका कार्य इतना प्रखर तथा सफल था कि कट्टर मुसलमान भी उनका सम्मान करते थे और वह इतिहास के अकेले हिंदू संन्यासी हुए, जिन्हें दिल्ली की जामा मस्जिद में मुसलमानों को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया गया। लेकिन राजनीति और धनी एवं उच्च जाति के अहंकारी हिंदुओं के कारण समाज में आज भी जाति भेद प्रबल है।

अनुसूचित जाति के नौजवान शादी में घोड़े पर चढ़कर बारात ले जाते हैं, तो उन्हें उतार दिया जाता है, अपमानित किया जाता है। विद्यालयों में उनके बच्चों को अक्सर ताने सुनने पड़ते हैं। मध्यान्ह भोजन के दौरान स्कूलों में दलित बच्चों के साथ छुआछूत वाला भेदभाव होने की खबरें अब भी आती हैं। पिछले महीने मैं मेरठ में वाल्मीकि समाज के बच्चों के एक सम्मान समारोह में गया था। वाल्मीकि बच्चे प्रतिभा और कुशलता में किसी से कम नहीं हैं। लेकिन उन्हें समाज में जो भेदभाव सहना पड़ता है, उसका हम अंदाजा नहीं लगा सकते। मुझे एक प्रोफेसर मिले, आप उनके अनुभव सुनेंगे, तो आंखों में आंसू और हृदय में गुस्सा उबलने लगेगा। सब कुछ सही होते हुए भी जब कॉलेज के प्रबंधकों को पता चलता है कि वह अनुसूचित जाति से हैं, तो या तो उन्हें नौकरी नहीं देते या स्तर से कम वाली नौकरी देते हैं। कौन स्वाभिमानी समाज या व्यक्ति होगा, जो जाति के आधार पर या किसी भी कारण से इस तरह के तिरस्कार को सहन करेगा? एक बार मैंने स्वयं एक हवाई अड्डे पर देखा कि एक सांसद अपने बगल के यात्री से सिर्फ इसलिए भिड़ गए, बल्कि उसे झापड़ मार दिया, क्योंकि वह यात्री लाइन में सांसद जी से आगे आ गया था। क्या सांसद का यह रवैया लोकतंत्र के अनुकूल था? एक जाति सदियों से इस देश में सफाई कर्मचारी बनी हुई है, यह हिंदू समाज की कौन सी धार्मिक महानता है? मूर्तियां, मंदिर, आश्रम और करोड़ों रुपये लगाकर होने वाले भगवद्भजन-कीर्तन के कार्यक्रम लगातार बढ़ रहे हैं। हर मंगलवार को हनुमान जी के मंदिरों और शनिवार को शनि देवता के नए-नए मंदिरों के सामने भीड़ बढ़ रही है, लेकिन जिस समाज के हृदय में राम, अधरों पर राम, नाम में राम (अधिकतर अनुसूचित जातियों के), हिंदू जगजीवन राम से लेकर अर्जुन राम तक सब कुछ सहन करते हुए भी राम का साथ नहीं छोड़ते, ऐसे सच्चे और शौर्यवान रामभक्तों के साथ हम लोग क्या व्यवहार करते हैं? हम उनके साथ जो व्यवहार करते हैं, क्या वह ठीक होता है? राजनीति में अनुसूचित जाति के लोग किसी भी दल में आगे नहीं बढ़ाए जाते। उनको टिकट मिलना या न मिलना उन लोगों के हाथ में रहता है, जो चुनाव क्षेत्र में छोटी जाति, बड़ी जाति का आंकड़ा देखकर टिकट का आवंटन करते हैं।

अनुसूचित जाति के बच्चे-बच्चियों पर जब हमला होता है, या उनका अपमान होता है, तो क्या आपने कभी देखा कि संसार त्यागकर समस्त प्राणियों को एक समान मानने वाले संत-महात्मा या हिंदू सांसद-विधायक अनुसूचित जाति के घर-परिवारों में जाकर उनके साथ खड़े होते हैं और जाति भेद के आधार पर उनसे अन्याय करने वाले हिंदुओं को समझाकर सामाजिक समता स्थापित करते हैं? अगर कहीं ऐसा कोई वातावरण बनता दिखता है, तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साधारण अनाम, अजान कार्यकर्ता चुपचाप ही सामाजिक समरसता के लिए अनुसूचित जाति बस्तियों और वाल्मीकि मंदिरों में काम करते दिखते हैं, पर हालात बहुत कठिन हैं। समता की बात करने वालों को 14 अक्तूबर, 1956 का नागपुर की दीक्षा भूमि का दृश्य कभी भी भूलना नहीं चाहिए। उस दिन डॉ. अंबेडकर लाखों अनुयायियों के साथ हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध हो गए थे। अगले दिन 15 अक्तूबर, 1956 को दिया गया आंबेडकर का भाषण हर हिंदू को पढ़ना चाहिए और स्वयं से पूछना चाहिए कि आप अपने ही हिंदू भाई-बहनों के साथ केवल तब तक ही तो भेदभाव कर सकते हो, जब तक वे स्वयं को हिंदू कहते हैं? हिंदू समाज एक खतरनाक दौर से गुजर रहा है। उत्तराखंड से अरुणाचल प्रदेश तक बड़ी संख्या में हिंदू विभिन्न कोणों से हम लोगों का शिकार हो रहे हैं तथा संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में उन पर हमले बढ़े हैं और संख्या का रुझान घटने की तरफ चल पड़ा है। सड़क, पानी, बिजली की राजनीति करते रहिए, लेकिन अगर सदियों से केवल हिंदू होने के कारण जो विभिन्न दिशाओं से हमले झेल रहे हैं, वही आज भी स्वयं को अपनी विरासत, परंपरा तथा धार्मिकता पर चोट होते देखने पर विवश होंगे, तो हे परम पराक्रमी विभिन्न दलों के नेताओ, भारत अपने ही समाज के साथ पुन: अन्याय होते देख सुखी नहीं हो सकता। पद, पैसा और प्रभाव तो काबुल, रावलपिंडी, लाहौर और कराची के हिंदुओं के पास भी कम नहीं था, लेकिन वह नष्ट हो गए। यही वह बात है जो सभी को याद रखनी चाहिए।

  • वरिष्ठ नेता-भाजपा 

 

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