प्रतिरोध की भाषा के तौर पर उभरी हिंदी

By Independent Mail | Last Updated: Jan 6 2019 6:56PM
प्रतिरोध की भाषा के तौर पर उभरी हिंदी
  • प्रियदर्शन

आश्चर्यजनक है कि साल 2018 के अंत में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल के बारे में संजय बारू की किताब द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर पर बनी फिल्म पर कांग्रेस के कुछ नेता सवाल उठाते देखे गए, तो साल के शुरू में पद्मावत को लेकर बीजेपी के नेताओं ने हंगामा किया था। यह शायद कांग्रेस की बदली हुई संस्कृति का असर है कि द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर के विवाद को एक हद से ज्यादा हवा नहीं दी गई। मध्य प्रदेश में इस पर पाबंदी की बात अफवाह साबित हुई। बहरहाल, पद्मावत व एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर के बीच ऐसी कई फिल्में रहीं, जिनको तरह-तरह की असहमतियों का सामना करना पड़ा। दिसंबर में ही रिलीज हुई फिल्म केदारनाथ को उत्तराखंड के सिनेमाघरों में नहीं दिखाने दिया गया। फिल्म का विरोध बस इसलिए किया गया कि वह उत्तराखंड में विकास के नाम पर चल रही पर्यावरण की विनाशलीला की ओर ध्यान खींचती है, वरना फिल्म में ऐसा कुछ नहीं था, जिससे उत्तराखंड की किसी सामाजिक-धार्मिक मर्यादा को चोट पहुंचती हो। दरअसल, 2018 में बेसब्री और असहिष्णुता का वह प्याला कुछ और छलकता नजर आया, जिसके कुछ छींटे पिछले वर्षों में उड़ते दिखे। साल के अंत में ही नसीरुद्दीन शाह के वक्तव्य को लेकर जो तीखी प्रतिक्रिया दिखी और जिस तरह अजमेर साहित्य समरोह में उनके कार्यक्रम का विरोध हुआ, वह इसी असहिष्णुता की पुष्टि करता रहा। यह अलग बात है कि अजमेर में एक अलग जगह पर उनके कार्यक्रम का आयोजन हुआ और उसी समारोह में लोगों ने हंगामा करने वालों की जमकर खबर भी ली। साहित्य और संस्कृति की दुनिया में यह हड़बड़ाई हुई प्रतिगामी किस्म की हिंसक प्रतिक्रिया मौजूदा समय के राजनीतिक-सामाजिक टकरावों की कोख से निकली है। इसमें दबंग और आक्रामक बहुसंख्यकवाद हावी दिखा। गोरक्षा से लेकर लव जेहाद और तीन तलाक तक के मामले मूलत: सामाजिक-सांस्कृतिक हैं, लेकिन वे अपने राजनीतिक प्रतिफलन से इस तरह जोड़ दिए गए हैं कि उन्हें अलग से देखना, उन पर बहस करना संभव नहीं रहा।

लोहिया कहा करते थे कि राजनीति अल्पकालिक धर्म है, जबकि धर्म दीर्घकालीन राजनीति। हमारे वक्त की रफ्तार इतनी तेज है कि लोहिया के समय की दीर्घकालिकता त्वरित प्रतिक्रियावाद में बदली हुई है और धर्म राजनीति का उपकरण है। साहित्य और संस्कृति की प्रक्रियाएं उससे स्वायत्त होते हुए भी कई बार उसकी अनुगामिनी दिखाई पड़ती हैं। गुजरे साल एक और प्रवृत्ति पिछले वर्षों से कहीं ज्यादा बड़े विस्तार की तरह सामने आई। कुछ बरस पहले जयपुर में साहित्य समारोह के साथ जो नई परंपरा शुरू हुई, वह अब समारोहों की बाढ़ में बदल गई है। जयपुर में इस साल एक ही साथ तीन समारोह चलते दिखे। इसके अलावा, देश के तमाम छोटे-बड़े शहरों में समारोहों की झड़ी लगी रही। मुंबई और दिल्ली से लेकर पटना, लखनऊ, देहरादून, बरेली, कानपुर से लेकर गुवाहाटी, भुवनेश्वर तक न जाने कितने साहित्य समारोह और पुस्तक मेले सजते रहे और हिंदी लेखक खुशी-खुशी इनमें शिरकत करते देखे गए। सोशल मीडिया की दुनिया एक तरफ इन समारोहों की तस्वीरों से पटी रही, तो इन पर उठाए जा रहे सवालों से भी भरी रही। क्या इतने सारे समारोहों ने साहित्य और संस्कृति को कुछ जनप्रिय बनाया? क्या कुछ लेखकों को ऐसी बड़ी पहचान मिली, जिससे वे खुद को जनता का लेखक मान पाएं? इन सवालों के जवाब कुछ उदास करने वाले हैं। ज्यादातर साहित्य समारोहों में फिल्मी सितारों, खिलाड़ियों, नेताओं, टीवी एंकरों और कुछ जाने-पहचाने चेहरों को सबसे ज्यादा अहमियत दी गई। उन समारोहों का प्रचार उन्हीं चर्चित हस्तियों के इर्द-गिर्द किया जाता रहा, जबकि लेखकों को हाशिए पर छोड़ दिया गया। इस सांस्कृतिक समय में पहली बार सोशल मीडिया पर अफवाह की विराट होती संस्कृति को लेकर चिंता भी दिखी और सक्रियता भी। पर यह समझ अभी विकसित होना बाकी है कि अफवाह की इस संस्कृति का वास्ता राजनीतिक-सांस्कृतिक वर्चस्व को बनाए रखने की एक वैचारिक कोशिश से भी है। तो एक तरफ पाबंदी की बढ़ती संस्कृति, दूसरी तरफ समारोह-प्रियता से निकले साहित्यिक आयोजन और तीसरी तरफ अफवाह की लगातार मजबूत होती संस्कृति, क्या इन बंटे हुए शीशों में हमारे समय के साहित्य का कोई मुकम्मल चेहरा बनता है? इसमें शक नहीं कि तमाम समारोहों और बंदिशों के बावजूद हिंदी साबित करती रही कि वह अंतत: प्रतिरोध की भाषा है। पत्र-पत्रिकाओं, समांतर आयोजनों में और सोशल मीडिया पर यह प्रतिरोध खूब दिखा। सच तो यह है कि अब पत्र-पत्रिकाएं पीछे छूट गई हैं और सोशल मीडिया जैसे साहित्य की मुख्य धारा बनता और बनाता जा रहा है। गुजरे साल कुछ आक्रामक बहसें चलीं, कुछ निजी हिसाब-किताब चुकाए गए और कई सदाशयता से भरी बधाइयां दी गईं। इन सबके बीच साहित्य और संस्कृति ने अपनी गतिशीलता बचाकर रखी।

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