प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर बच्चों पर

By Independent Mail | Last Updated: Mar 10 2019 7:52PM
प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर बच्चों पर

डॉ. मोनिका शर्मा

दमघोटू हवा के मामले में भारत के हालात भयावह हो चले हैं। हवा में घुल रही जहरीली गैसों के कारण सांस लेने के लिए स्वस्थ वायु महानगरों में ही नहीं, दूरदराज के गांवों-कस्बों में भी नहीं बची है। बीते कुछ सालों में प्रदूषण के अत्यधिक खतरनाक स्तर की वजह से अब इंसानी डीएनए पर भी असर हो रहा है। कनाडा, चीन, जर्मनी, घाना और भारत जैसे देशों में शोध कर रहे जर्मनी के 'द पीफ्रोहेम आर्गेनाइजेशन' के मुताबिक अब जन्म से पहले ही दमघोटू हवा के नुकसान इंसान तक पहुंच रहे हैं। इसके चलते भ्रूण में बदलाव आ रहा है। नतीजतन समय से पहले प्रसव के मामले बढ़ रहे हैं। वायु प्रदूषण को लेकर पहले से ही कई महानगरों में आपातकालीन स्थिति को झेल रहे भारत की स्थिति समय से पहले प्रसव के मामलों में भी बेहद चिंतनीय है। भारत में 15 फीसद बच्चे प्री-मेच्योर डिलीवरी से पैदा हो रहे हैं। भ्रूण में हो रहे बदलाव के कारण मेंटल डिस्ऑर्डर, दुबले-पतले, दिव्यांग या आंखों की समस्याओं के साथ बच्चे जन्म ले रहे हैं। ऐसी बीमारियों के साथ पैदा हो रहे बच्चे आगे चलकर भी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं ने जूझते हैं। यह वाकई दुखद है कि हवा में घुले जहर के चलते नई पीढ़ी कई व्याधियों के साथ दुनिया में आ रही है। इस मामले में बीते साल आई विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट 'वायु प्रदूषण एवं बाल स्वास्थ्य-साफ हवा का नुस्खा' भी चेताने वाली थी। इस अध्ययन में कहा गया था कि वर्ष 2016 में भारत समेत निम्न एवं मध्यम आय-वर्ग के देशों में पांच साल से कम उम्र के 98 फीसद बच्चे अतिसूक्ष्म कण (पीएम) से पैदा वायु प्रदूषण के शिकार हुए थे। भारत में वर्ष 2016 में 1,10,000 बच्चों की मौत की वजह प्रदूषित हवा रही है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत के मामले में भी भारत के आंकड़े सबसे ज्यादा थे। यह चिंतनीय है कि हमारे यहां साल-दर-साल प्रदूषण की स्थिति और गंभीर होती जा रही है। एशिया के कई देशों में प्रदूषण रोकने की दिशा में काम करने वाली 'एयर एशिया' नामक संस्था के शोध मुताबिक दिल्ली में एक नवजात शिशु भी रोजाना परोक्ष तौर पर 15 सिगरेट का धुआं ग्रहण करता है। कोई हैरानी नहीं कि भारत में दुनिया के किसी भी स्थान की तुलना में श्वसन संबंधी बीमारियों के कारण भी सबसे अधिक लोगों की मौत होती है। हाल के सालों में बढ़ते औद्योगीकरण, कचरा जलाने और वाहनों की संख्या बढ़ने से भारत में वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ा है। राजधानी दिल्ली में तो हर साल स्थितियां आपातकालीन हो जाती हैं। ऐसे में बढ़ते प्रदूषण से बच्चों का न सिर्फ सांस लेना दुश्वार हो रहा है, बल्कि सांस से जुड़े रोग भी बढ़ रहे हैं। इस अध्ययन के मुताबिक बच्चे गर्भ में ही कई बीमारियों का शिकार बन रहे हैं। प्री-मेच्योर डिलीवरी के कारण अस्वस्थ और कमजोर बच्चे जन्म ले रहे हैं। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के मुताबिक अत्यधिक प्रदूषण वाले कणों, जैसे एसिड, धातु और हवा में मौजूद धूल कणों के संपर्क में आने से भी समय पूर्व प्रसव का खतरा बढ़ जाता है। दमा से पीड़ित गर्भवती महिलाओं में तो हवा के प्रदूषण के कारण निर्धारित समय से पूर्व प्रसव का खतरा 30 फीसद तक बढ़ जाता है। जो महिलाएं दमे की शिकार नहीं हैं, उनके लिए भी यह खतरा आठ प्रतिशत होता है। यह चेताने वाली बात है कि देश के भविष्य को बचपन में ही अनगिनत बीमारियां घेर रही हैं। अध्ययन बताते हैं कि बच्चों में बढ़ रहे कैंसर के मामलों की सबसे बड़ी वजह भी हवा में मौजूद हानिकारक तत्व ही हैं। इतना ही नहीं, वायु प्रदूषण का गर्भ में पल रहे बच्चे पर भी बुरा असर पड़ता है। इसके कारण जन्म के समय बच्चों में कई विकृतियां पैदा होने का खतरा है। शारीरिक या मानसिक दोष और कम वजन जैसी समस्याएं समय से पूर्व जन्म लेने वाले बच्चों में काफी देखने को मिलती हैं। जन्म से पहले ही बच्चों का इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है। भ्रूण तक ऑक्सीजन का प्रवाह मां से ही होता है। ऐसे में अगर मां ही प्रदूषित हवा में सांस ले रही है, तो अजन्मे बच्चों में भी दूषित हवा के कारण कई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। यह चिंतनीय है कि भारत के महानगर तो प्रदूषण की गिरफ्त में हैं ही, दूसरे बड़े शहर और गांव-कस्बे भी दूषित हवा की भीषण चपेट में हैं। देश के हर भूभाग में प्रदूषणजनित स्वास्थ्य विकार तेजी से फैल रहे हैं। खासकर वायु प्रदूषण तो दुनियाभर में मानव स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। देश के मानव संसाधन और पर्यावरण को बड़ी क्षति पहुंचा रही यह समस्या बच्चों के जीवन काे भी लील रही है।

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