आत्मीयता के विस्तार बिना सुखी जीवन असंभव

By Independent Mail | Last Updated: Nov 5 2018 10:05PM
आत्मीयता के विस्तार बिना सुखी जीवन असंभव

मनुष्य जीवन में सबसे मधुर यदि कोई वस्तु है, तो वह है-स्नेह, सद्भाव, आत्मीयता। जहां एक दूसरे के प्रति आत्मीयता की भावना होती है, वहां स्वर्ग का साक्षात्कार होता है। स्वर्ग भी ऐसा ही है, जहां किसी से कोई बैर-भाव नहीं, सब एक-दूसरे के प्रति आत्मीयता से भरे हुए हैं। अगर हम समाज में भी आत्मीयता का वातावरण बना सके, तो धरती पर स्वर्ग उतारने की हमारे मनीषियों की कल्पना पूरी हो सकती है।गरीबी और अभावग्रस्त स्थिति में भी मनुष्य इन तत्वों के होने पर भारी संतोष और शांति का अनुभव करता है। इन तत्वों को सुरक्षित रखने के लिए ही आध्यात्मिकता, धार्मिकता एवं आस्तिकता का सारा विधान बना हुआ है। दूसरों के प्रति स्नेह-सद्भाव एवं आत्मीयता बनी रहे एवं बढ़ती रहे, इसके लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य दूसरों के शरीर में भी अपनी ही आत्मा को देखे। उनके सुख-दु:ख को भी अपना ही सुख-दु:ख माने। जिस प्रकार अपने बाल-बच्चे एवं परिजन अपने लगते हैं, वैसे ही और लोग भी अपने लगें, तो उनसे सहज ही स्नेह उत्पन्न होगा। जिसके प्रति सच्चा स्नेह होता है, उसके साथ कुछ नेकी-भलाई-उदारता का परिचय देने की इच्छा स्वभावत: ही हो जाती है। नवजात शिशु के पेट में कोई गड़बड़ी उत्पन्न हो जाए, इस भय से माता अपनी जीभ पर पूरा काबू रखकर आहार लेती है। अपने स्वाद की उपेक्षा करके वह बालक के स्वास्थ्य का ध्यान रखती है। यही मातृ बुद्धि जब सारे समाज के प्रति दिखने लगती है, तो मनुष्य स्वभावत: संयमी और संतोषी हो जाता है। माता अपने भोजन, वस्त्र, सुविधा और साधनों में कमी करके भी जिस प्रकार अपने प्यारे बालकों के लिए खुशी-खुशी अधिकाधिक साधन-सामग्री जुटाती है और उस प्रयत्न में उसे जो त्याग करना पड़ता है, अभाव भोगना पड़ता है, उसे खुशी-खुशी स्वीकार करती है, उससे खिन्न होना तो दूर, उलटे अधिक प्रसन्नता अनुभव करती है, उसी तरह का व्यवहार हमें दूसरों के प्रति भी करना चाहिए। यही त्याग, दान, परमार्थ, पुण्य का, उदारता का, सेवा का सिद्धांत है। आत्मीयता के भाव के विस्तार से ही संयम, त्याग, स्नेह और सेवा-भावना की वृद्धि होती है। एक-दूसरे के प्रति प्यार करें, एक-दूसरे के साथ सद्भाव एवं सदाशयता का व्यवहार करें, न्यायोचित मार्ग से जितनी साधन-सामग्री जुट सके, उसी में संतोष करें, तो इसके बाद मानसिक उलझनों जैसी कोई समस्या शेष नहीं रह जाएगी। यदि मन प्रसन्न रहे, उद्वेगों से छुटकारा प्राप्त किया जा सके, तो जीवन-यापन बहुत ही सरल, सुविधाजनक एवं शांतिपूर्ण हो सकता है। आज लोगों के सामने अनेक समस्याएं मौजूद हैं। उनके सुलझाने के लिए अनेक प्रकार के प्रयत्न किए जाते रहे हैं, पर गुत्थी सुलझने की कौन कहे, उलझती जाती है। स्वास्थ्य की समस्या सामने है, लोगों की नींद उड़ गई है और चैन पता नहीं कहां चला गया है। मनुष्य जितना कमाता है, उसका चौथाई हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च करता है। कोई दौलत के अहंकार से भरा है, कोई पद के। यह सब बुराइयां हैं, जो मानव जीवन का आनंद समाप्त कर देती हैं। बीमारियां हजार हैं, लेकिन उनकी दवा एक ही है। हर परिचत-अपरिचित इंसान को अपना बना लो, तो जीवन सुखों से भर जाएगा। अभाव और दुख परेशान नहीं करेंगे, क्योंकि तब आप संकट के समय में दूसरों को अपने साथ खड़ा पाएंगे। यही स्वर्ग का सुख है।

आचार्य श्रीराम शर्मा

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