मोदी बनाम विपक्ष या विपक्ष बनाम मोदी

By Independent Mail | Last Updated: Jan 6 2019 6:54PM
मोदी बनाम विपक्ष या विपक्ष बनाम मोदी
  • अंबिका दत्त मिश्रा

एक शेरनी सौ लंगूर चिकमंगलूर चिकमंगलूर। आज से लगभग 40 वर्ष पहले भारतीय राजनीति में यह नारा बहुत तेजी से गूंजा और चर्चित हुआ था। अवसर था 1978 में कर्नाटक के चिकमंगलूर लोकसभा क्षेत्र का उपचुनाव। स्व. इंदिरा गांधी इस क्षेत्र से प्रत्याशी थी। लगभग समस्त विपक्ष उनके खिलाफ एकजुट हो गया। तब इंदिरा समर्थकों ने यह नारा दिया था। वह चुनाव जीत गयी थीं। मगर अगले कई सालों तक इस नारे की चर्चा रही। 40 वर्षों बाद भारतीय राजनीति के पटल पर यह दृश्य फिर उभरता दिखायी पड़ रहा है। उस समय भी कांग्रेस विपक्ष में थी और आज भी है। फर्क इतना है कि तब इंदिरा गांधी के खिलाफ विपक्ष ने घेराबंदी की और आज नरेंद्र मोदी विपक्षी एकजुटता के निशाने पर हैं। तब कांग्रेस रक्षात्मक थी, पर आज आक्रामक है। एक फर्क यह भी है कि उस समय लोकसभा की महज एक सीट का उपचुनाव था और आज लोकसभा के चुनाव की तैयारी है। नये साल के शुरू होते ही लोकसभा चुनाव की हलचल तेज होने लगी है। सभी दल अपने वोट बैंक सहेजने और रणनीति बनाने में जुट गये हैं। सत्तारूढ़ भाजपा अपनी उपलब्धियों को मुद्दा बना रही है। वहीं विपक्ष मोदी हटाओ नारे को लेकर चुनावी वैतरणी पार करने में लगा है। मोदी हट जाएंगे फिर क्या? यह एक ऐसा सवाल है जिस पर भ्रम का पर्दा पड़ा हुआ है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में सबसे स्वस्थ परंपरा है कि चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों पर लड़े जाएं। ये मुद्दे विदेश या गृहनीति अथवा आर्थिक व्यवथा या विकास, महंगाई आदि से जुड़े होते हैं। मगर जो राजनीतिक दृश्य दिखायी पड़ रहा है, उसमें ये तमाम मुद्दे दूसरे पायदान पर चले गये हैं। पहले पायदान का मुद्दा है कि मोदी हटाओ। लोकतंत्र में व्यक्तिवादी सोच बहुत ही घातक होती है, चाहे वह सत्तारूढ़ दल की हो अथवा विपक्ष की। हमारे यहां आज यही हो रहा है। पिछले कुछ वर्षों में विपक्ष ने भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को लेकर केंद्र पर निशाना साधा, लेकिन वह अधिक देर तक टिक नही सका। जहां तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रश्न है, तो उनके विरूद्ध भ्रष्टाचार का एक भी सवाल खड़ा नही किया जा सका। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने पहले पाकिस्तान में सेना द्वारा किये गये सर्जिकल स्ट्राइक को मुद्दा बनाने की कोशिश की। किसी ने इसे झूठा बताया तो किसी ने सबूत मांगा। मामला सेना और रक्षा से जुड़ा था। इस संवेदनशील विषय पर राजनीति जनता को रास नही आयी और इस मुद्दे ने उठने के कुछ दिनों बाद दम तोड़ दिया। दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारे गूंजे। भारत तेरे टुकड़े होंगे हजार, आजादी लेकर रहेंगे जैसे नारे लगाये गये। अगले दिन से इसे भी सियासत ने समेट लिया। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जेएनयू पहुंचे और छात्रों की सभा की। कुछ दिन तक अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर इसे मुद्दा बनाने की कोशिश की गयी, लेकिन देश की अखंडता से जुड़े होने के कारण जनता ने इसे ठुकरा दिया। सभी खामोश हो गये और मुद्दा गुम हो गया। इसी तरह नवंबर 2016 में नोटबंदी विपक्ष के हाथ में एक बड़े हथियार के रूप में सामने आई। चूंकि नोटबंदी से आम जनता प्रभावित हुई थी, इसलिए काफी दिनों तक यह मामला गर्म रहा, लेकिन धीरे-धीरे समय के गर्त में चला गया। इसके बाद जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) भी विपक्ष के लिए मुद्दा बनाने का अवसर लेकर आया। इस टैक्स से व्यापारियों को होने वाली शुरुआती दिक्कतों ने विपक्ष को उत्साहित कर दिया, मगर फिर सब कुछ सामान्य हो गया। विपक्षी दल बीच-बीच में डोकलाम, माब लिंचिंग (उन्मादी भीड़), महंगाई और कश्मीर में हिंसा जैसे मुद्दे उठाते रहे। बेरोजगारी, महंगाई सदाबहार मुद्दे भी आते और जाते रहे। इन सबके बीच भाजपा विरोधी दल यह तय नहीं कर पाये कि किसे लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ मुख्य मुद्दा बनाया जाए। तलाश एक ऐेसे मुद्दे की है, जो सर्वमान्य हो और सभी दलों के लिए स्वीकार्य हो। फ्रांस से लड़ाकू विमान राफेल को लेकर भी कांग्रेस हमलावर रही। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और सरकार की सफाई के बाद यह भी गुम होता नजर आ रहा है। ऐसे में विपक्ष के पास एक ही मुद्दा है। वह है, मोदी हटाओ! इस पर सभी सहमत हैं। बस अब इसे मुद्दा बनाकर लोकसभा चुनाव की रणनीति तैयार की जा रही है। मगर इन सबके बीच एक सवाल यह है कि क्या यह नारा जनता के लिए भी स्वीकार्य होगा? क्या इसे मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ा जा सकता है? कांग्रेस का एक प्रयास यह भी है कि राहुल गांधी को मोदी के मुकाबले का चेहरा बनाकर पेश किया जाए। कांग्रेस के रणनीतिकार इसे अमल में लाने में जुटे हैं। इससे कांग्रेस को एक फायदा यह तो होगा कि यदि चुनाव हार भी गये, तो भी राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी एक सितारा बन कर उभरेंगे। इसके विपरीत, अन्य दलों को कांग्रेस की यह पहल रास नही आ रही है। अलग-अलग राज्यों के क्षेत्रीय दल इससे किनारा कर रहे हैं। इसलिए वे इस मुद्दे पर अक्सर कांग्रेस को झटका देते रहते हैं। भाजपा का विकल्प बनने वाले दलों ने कई मोर्चों पर अपनी नीति भी स्पष्ट नही की है। देश की अर्थव्यवस्था कैसी होगी, कश्मीर समस्या सुलझाने के लिए कौन से कदम उठाये जाएंगे या फिर बेरोजगारी, महंगाई और गरीबी दूर करने के लिए वे क्या करेंगे? विदेश नीति पर भी उनकी चुप्पी बरकरार है। पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को लेकर भी कांग्रेस या उसके सहयागियों ने रुख साफ नही किया है। राम मंदिर निर्माण के सवाल पर भी ढुलमुल रवैया है। विपक्ष का यह रूख कभी-कभी भ्रम की स्थिति पैदा कर देता है। सबसे बड़ी बात यह है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस दूर भागती दिखती है। कुल मिलाकर देश के विकास और समृद्धि के लिए उसकी क्या योजना है, इस पर पर्दा पड़ा हुआ है। दूसरी तरफ केंद्र सरकार अपनी उपलब्धियों के प्रचार में लगी है। चाहे वह जनधन योजना हो या फिर आयुष्मान भारत। गरीबों को मुफ्त गैस कनेक्शन, जीरो खाता खुलवाना, शौचालय योजना, गांवों को बिजली पहुंचाने जैसे तमाम मुद्दे भाजपा के हाथ में हैं। उसने अभी से निचले स्तर से ही इनका प्रचार शुरू कर दिया है। भाजपा के लिए शिवसेना जैसे दल सिरदर्द बने हुए हैं। भाजपा भी अगस्ता वेस्टलैंड और नेशनल हेराल्ड को लेकर कांग्रेस पर निशाना साध रही है। फिलहाल, आज स्थिति यह है कि एक तरफ विपक्ष है और दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। कांग्रेस चुनाव को पूरी तरह व्यक्तिगत (मोदी विरोधी) बनाने में जुटी है।

  • वरिष्ठ पत्रकार
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