अभी बाकी है दिल्ली की पिक्चर

By Independent Mail | Last Updated: Mar 9 2019 11:09PM
अभी बाकी है दिल्ली की पिक्चर
  • मनोज कुमार शर्मा, राजनीतिक विश्लेषक

दिल्ली में अभी तक की स्थिति यह है कि वहां बीजेपी के खिलाफ कोई गठबंधन नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने आम आदमी पार्टी (आप) से गठबंधन से इंकार कर दिया है। लेकिन राजनीति में जैसा दिखता है, वैसा होता नहीं है। इसलिए कहा जा सकता है कि पिक्चर अभी बाकी है। इसकी कई वजहें हैं। दिल्ली में 2015 के विधानसभा चुनावों के मुकाबले आप की स्थिति में काफी गिरावट आई है, वहीं कांग्रेस की स्थिति में पहले के मुकाबले सुधार हुआ है। पुलवामा आतंकी हमले और बालाकोट पर एयरफोर्स की स्ट्राइक के बाद बीजेपी की स्थिति में भी मजबूती आई है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी देश के हर प्रदेश में क्षेत्रीय पार्टियों से गठबंधन कर रहे हैं। इसलिए विपक्षी दलों के कई दिग्गज नेता चाहते हैं कि दिल्ली में आप और कांग्रेस में गठबंधन हो। लेकिन राहुल गांधी से मुलाकात के दौरान शीला दीक्षित और पार्टी के कई दूसरे नेता आप के साथ गठबंधन के खिलाफ थे। उनका तर्क था कि आप तेजी से लोगों का विश्वास खो रही है, वहीं कांग्रेस की स्थिति में सुधार हो रहा है। इन नेताओं का कहना था कि हमें आप को समर्थन देकर 2013 की गलती को दोबारा नहीं दोहराना चाहिए, क्योंकि 2015 में जब चुनाव हुआ, तो आप को 70 में से 67 सीटें मिलीं, वहीं कांग्रेस खाता भी नहीं खोल पाई थी। लेकिन इसी बैठक में अजय माकन ने आप से गठबंधन की खुलकर वकालत की। उनका कहना था कि बिना गठबंधन हम दिल्ली में एक भी सीट नहीं जीत पाएंगे। माकन की बात से दिल्ली के प्रभारी पीसी चाको भी सहमत थे। आश्चर्य की बात यह है कि जहां प्रदेश अध्यक्ष बनने से पहले शीला दीक्षित का रुख आप के प्रति नर्म था, वहीं माकन गठबंधन के खिलाफ थे, लेकिन अब सीन बदल चुका है। राजनीति में वोटों के गणित से चुनाव जीते जाते हैं। 2014 में मोदी लहर पर सवार होकर एनडीए गठबंधन ने राजस्थान, उत्तराखंड और हिमाचल के साथ-साथ दिल्ली की सभी सीटों पर फतह हासिल की थी। उस वक्त जब दिल्ली में आप की स्थिति काफी मजबूत थी, तो भी 2014 में चांदनी चौक निर्वाचन क्षेत्र में बीजेपी को 44.6 फीसद वोट मिले थे। आप के उम्मीदवार आशुतोष के मुकाबले 13.88 फीसद ज्यादा। लेकिन अगर आप और कांग्रेस का वोट एक साथ जोड़ा जाए, तो वह बीजेपी से ज्यादा पहुंच जाता है, 48.67 प्रतिशत। यही हाल नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली सीट पर था। यहां आप और कांग्रेस को 50.62 प्रतिशत वोट मिले, तो वहीं बीजेपी को 45.25 प्रतिशत। पूर्वी दिल्ली में भाजपा के 47.83 प्रतिशत के मुकाबले इन दोनों को 48.9 प्रतिशत वोट मिले थे। नई दिल्ली में भाजपा के 46.75 के मुकाबले इन दोनों का मत प्रतिशत 48.83 था। वहीं उत्तरी-पश्चिमी दिल्ली में भाजपा के 46.45 प्रतिशत और दक्षिण दिल्ली में 45.17 प्रतिशत के मुकाबले इन दोनों को 47 प्रतिशत वोट मिले थे। केवल पश्चिमी दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र ही एकमात्र ऐसी सीट थी, जहां बीजेपी को आप और कांग्रेस के संयुक्त वोट शेयर 42.74 प्रतिशत के मुकाबले 48.32 प्रतिशत वोट मिले थे। लेकिन उसके बाद से यमुना में काफी पानी बह चुका है। 2017 के नगर निगम चुनावों में बीजेपी को 36 प्रतिशत वोट मिले थे। आम आदमी पार्टी को करीब 26 फीसद यानी 2015 के विधानसभा चुनावों में मिले 54 प्रतिशत वोटों से आधे से भी कम, वहीं कांग्रेस को 21.28 फीसद वोट मिले थे। कांग्रेस ने काफी सुधार किया, लेकिन इतना नहीं कि वह अकेले बीजेपी को हरा सके। इसके साथ ही आप में भी इतना दम नहीं है कि वह बीजेपी को परास्त कर सके। नगर निगम चुनाव की बात और थी, लेकिन लोकसभा चुनाव में बीजेपी स्वयं को ज्यादा मजबूत स्थिति में पाती है। यह वह चिंता है, जो अरविंद केजरीवाल को परेशान किए जा रही है, इसलिए वह कांग्रेस से गठबंधन करने के लिए लालायित हैं। गठबंधन पर सबसे बड़ा पेच सीटों के बंटवारे को लेकर है। आप कांग्रेस के साथ दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में भी गठबंधन करना चाहती है, लेकिन दूसरी जगहों के मुकाबले दिल्ली में वह ज्यादा सीटें चाहती है, जो कांग्रेस को मंजूर नहीं। आप दिल्ली में अपने लिए पांच सीटें चाहती है, लेकिन कांग्रेस की तरफ से 3-3-1 का फॉर्मूला सामने आया है। तीन-तीन पर कांग्रेस और आप और एक सीट पर दोनों दलों की तरफ से मंजूर कोई नेता, जैसे चांदनी चौक से आप विधायक अलका लांबा कोशिश कर रही हैं, जिसकी आप से तनातनी चल रही है और कांग्रेस के साथ नजदीकियां हैं। अगर आप इस फार्मूले पर सहमत होती है, तो दिल्ली में उसका कांग्रेस से गठबंधन हो सकता है।

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