किसानों को नहीं मिल रहा विकास का लाभ

By Independent Mail | Last Updated: Dec 3 2018 11:26PM
किसानों को नहीं मिल रहा विकास का लाभ

डॉ. अश्विनी महाजन

नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (नबार्ड) ने अखिल भारतीय ग्रामीण समावेशी वित्तीय सर्वेक्षण, 2016-17 की रिपोर्ट में जो आंकड़े जारी किए हैं, उनसे पता चलता है कि किसानों की आमदनी में खेती और सहायक गतिविधियों, जैसे पशुपालन इत्यादि से मात्र 43 प्रतिशत की बढ़ोतरी ही होती है, जबकि शेष 57 प्रतिशत आय नौकरी, मजदूरी, उद्यम इत्यादि से प्राप्त होती है। ऐसे गृहस्थ जो कृषि में संलग्न नहीं हैं, उन्हें औसतन कुल आमदनी का 54.2 प्रतिशत हिस्सा मजदूरी, 32 प्रतिशत सरकारी और निजी नौकरियों और मात्र 11.7 प्रतिशत उद्यम से प्राप्त होता है। यदि कृषि और गैर-कृषि गृहस्थों को मिला दिया जाए, तो ग्रामीण क्षेत्रों में मात्र 23 प्रतिशत आमदनी ही कृषि से हो रही है और शेष 77 प्रतिशत मजदूरी, सरकारी-निजी नौकरियों और उद्यमों से। यानी, आय की दृष्टि से खेती-बाड़ी हाशिये पर है। हालांकि, गैर-कृषि क्षेत्रों में आमदनियां बढ़ी हैं लेकिन सिर्फ शहरों में। ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-कृषि उद्यमों से कुल आमदनी मात्र 8.4 प्रतिशत ही है। यानी, गांवों में लोग थोड़ी-बहुत आय खेती से प्राप्त करते हैं, बाकी मजदूरी और सरकारी-निजी क्षेत्रों में नौकरियों से।

हालांकि, किन्हीं दो स्रोतों से आंकड़ों की तुलना करना उचित नहीं जान पड़ता, फिर भी गांवों और शहरों की तुलना के लिए मात्र यही एक माध्यम बचता है क्योंकि केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) गांवों और शहरों की आय के आंकड़े नियमित प्रकाशित नहीं करता। नबार्ड के सर्वेक्षण 2016-17 के अनुसार भारत में कुल 21.17 करोड़ गृहस्थ (परिवार) हैं। ग्रामीणों को इस प्रकार से परिभाषित किया गया है जिसमें राजस्व की दृष्टि से गांव और उपशहरों जिनकी संख्या 50 हजार से कम है, को शामिल किया गया है।

इन 21.17 करोड़ कुल गृहस्थों में 10.07 करोड़ यानी 48 प्रतिशत कृषि-गृहस्थ हैं जिसमें वे गृहस्थ शामिल हैं जिनके कम से कम एक सदस्य की कृषि से आमदनी सालाना पांच हजार रुपये से ज्यादा है। शेष 11.10 करोड़ गृहस्थ यानी 52 प्रतिशत गैर-कृषि गृहस्थ हैं। नबार्ड सर्वेक्षण में ग्रामीण गृहस्थों की औसत आय आठ हजार 59 रुपये मासिक बतायी गयी है। यानी 2016-17 में ग्रामीण गृहस्थों (21.17 करोड़) की कुल आय 20.5 लाख करोड़ रुपये है। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2016-17 में कुल राष्ट्रीय आय 135 लाख करोड़ रुपये बतायी गयी है। यदि इसमें से ग्रामीण आय घटा दी जाए, तो वर्ष 2016-17 में शहरी क्षेत्र की कुल राष्ट्रीय आय 114.5 लाख करोड़ रुपये होगी। वर्ष 2016-17 में गांवों की प्रति व्यक्ति आय 22 हजार 702 रुपये वार्षिक ही रही, जबकि शहरी प्रति व्यक्ति आय दो लाख 79 हजार 609 रुपये रही।

इसका अभिप्राय यह है कि शहरी प्रति व्यक्ति आय ग्रामीण प्रति व्यक्ति आय से 12.3 गुना ज्यादा है। कुछ वर्ष पहले तक शहरी प्रति व्यक्ति आय ग्रामीण प्रति व्यक्ति आय से नौ गुणा ज्यादा थी। 2016-17 तक आते-आते यह अंतर 12.3 गुणा तक पहुंच गया है। शहर और गांव के बीच बढ़ती यह खाई चिंता का विषय है और नीति-निर्माताओं के लिए एक चुनौती भी। यही है गांवों से शहरों की ओर पलायन का कारण। इसमें गांवों में बढ़ती गरीबी का संकेत भी निहित है। हमें इसके कारण खोजने होंगे और उनका समाधान करना होगा। पूरे देश की जीडीपी में खेती और सहायक गतिविधियों का हिस्सा 1951 में 55.4 प्रतिशत था जो 1991 आते-आते मात्र 25 प्रतिशत रह गया था और 2016-17 में तो यह 17.4 प्रतिशत पहुंच गया। जाहिर है कि खेती से होने वाली किसान की आमदनी घटती गयी और 2016-17 का नबार्ड सर्वेक्षण बता रहा है कि गांवों में खेती से होने वाली आमदनी गांवों की कुल आमदनी का भी मात्र 23 प्रतिशत ही रह गयी। अब गांवों में रहने वाले लोग गांवों में मजदूरी या शहरों में नौकरी कर के ज्यादा पैसा कमा रहे हैं। सरकार द्वारा शुरू की गयी परियोजनाओं और मनरेगा से गांवों में रहने वालों को रोजगार मिल रहा है। हालांकि, बड़ी मात्रा में खेती में भी मजदूरों के लिए रोजगार निर्माण होता है लेकिन इन रोजगारों और गांवों में रहने वाले लोग जो सरकारी या निजी नौकरियों में लगे हुए हैं, उनकी आमदनियों को जोड़ते हुए भी ग्रामीण क्षेत्रों की यह बदहाली बड़े नीतिगत बदलावों की ओर इंगित करती है। ऐसे में गांवों में बसे उन 11.1 करोड़ परिवारों यानी 47.4 करोड़ लोगों की हालत को बेहतर बनाना ही होगा जो किसान परिवारों से भी पिछड़े हुए हैं और जिनकी प्रति व्यक्ति मासिक आय मात्र सात हजार 269 रुपये है। इनकी हालत को सुधारने के लिए गांवों में विभिन्न प्रकार के उद्योग शुरू कर पशुपालन, मुर्गीपालन, मत्स्य पालन जैसे व्यापारों को बढ़ावा देना होगा लेकिन सरकार की प्राथमिकता में गांवों के कल्याण की नीतियां बनाना शायद रह ही नहीं गया।

नेता, स्वदेशी जागरण मंच

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