मानवीय संबंधों का बदलता ताना-बाना

By Independent Mail | Last Updated: Apr 9 2019 11:34PM
मानवीय संबंधों का बदलता ताना-बाना

नई पीढ़ी को देखकर लगता है, समय कितना आगे चला गया है, हमारी कल्पना से भी बहुत आगे और हम वहीं के वहीं हैं। बदलाव का अर्थ जीवन में नई चीजों और सुविधाओं का आ जाना भर नहीं है। इसका पता चलता है मानवीय संबंधों के बदलते ताने-बाने से। वाकई इंसानी रिश्ते बहुत बदल गए हैं। नई पीढ़ी संबंधों को लेकर एकदम अलग सोच रखती है। पिछले दिनों एक सर्वेक्षण की रिपोर्ट पढ़ रहा था। इसके अनुसार ज्यादातर युवा सिंगल ही रहना चाहते हैं, उन्हें शादी में विश्वास नहीं है। इसका कारण यह है कि वे किसी बंधन में नहीं बंधना चाहते। टिंडर और कंसल्टिंग फर्म मोरार एचपीआई के अनुसार 18 से 25 वर्ष की आयु के 86 प्रतिशत नौजवानों का कहना है कि सिंगल रहते हुए जीना आसान है क्योंकि वे अपेक्षाओं के बोझ से मुक्त रहते हैं।  इन युवाओं के उलट हम लोगों ने विवाह को जिम्मेदारी और जीवन के अनिवार्य हिस्से के रूप में देखा और इसके लिए कई चीजें छोड़ दीं। कई तरह के समझौते किए। एक से बंध जाने के बाद किसी और के बारे में सोचना हमारी पीढ़ी के लिए एक अनैतिक विचार रहा। लेकिन आज की युवा पीढ़ी  के लिए यह कोई नैतिक प्रश्न नहीं है। सर्वे में शामिल 90 प्रतिशत युवाओं का कहना है कि वे हर हफ्ते एक या दो डेट पर जाते हैं। एक नौजवान मित्र ने एक बार मुझे बताया था कि आजकल सब कुछ बड़ी जल्दी तय हो जाता है।  रिलेशनशिप बनती-टूटती रहती है। मैंने जानना चाहा कि इससे दुख नहीं होता? उसका कहना था कि एकाध महीना अफसोस रहता है। हमारे जमाने में प्रेम-संबंध टूटने का अर्थ था व्यक्ति का लगभग बर्बाद हो जाना। दरअसल पहले न सिर्फ लड़कियों के लिए बल्कि लड़कों के लिए भी शादी ही जीवन की तमाम गतिविधियों की परिणति थी। ऐसा लगता था कि हम शादी के लिए ही पैदा हुए और जी रहे हैं। हमारे मिथिला में कोई बच्चा किसी सामान की जिद करता तो उसे कहा जाता कि चिंता मत करो, तुम्हें ससुराल में सब कुछ मिल जाएगा। लेकिन आज की पीढ़ी के लिए शादी बहुत सारी चीजों में से महज एक चीज है। वह एक तरह से बोनस है। उसके लिए घूमना-फिरना, कॅरियर, दोस्त, शौक ये सारी चीजें अपने पार्टनर से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। यानि विवाह और घर जैसी संस्था बिखर रही हैं, जिससे कई समस्याएं आएंगी। जैसे बच्चों के लालन-पालन और उनके अभिभावकत्व की समस्या, संपत्ति के उत्तराधिकार की समस्या। नई पीढ़ी उनका कोई हल ढूंढ ही लेगी।

  • स्वतंत्र टिप्पणीकार संजय कुंदन के ब्लॉग से... 
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