हम कैसे बन पाएंगे विश्व के संचालक?

By Independent Mail | Last Updated: Apr 6 2019 12:28AM
हम कैसे बन पाएंगे विश्व के संचालक?

महेश तिवारी

किसी देश को विश्व परिदृश्य पर श्रेष्ठ उसे उसकी संस्कृति और सभ्यता बनाती है। ऐसे में अगर हम विश्व का सफल नेतृत्व करना चाहते हैं, तो अपनी सांस्कृतिक विरासत और जड़ों को मजबूत और समृद्ध बनाना होगा। यह तभी होगा, जब हम अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण बनाने के लिए सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर कार्यशील होंगे। पर दुर्भाग्य है, हम विश्वगुरु बनना चाहते हैं, स्वदेशी की बात भी करते हैं। लेकिन अपनी विरासत और पृष्ठभूमि को छोड़ उधार की संस्कृति और रहन-सहन का तौर-तरीका ग्रहण करने की फिराक में लगे हुए हैं। ऐसे में हम विश्व के संचालनकर्ता कैसे बन पाएंगे? भारतीय नववर्ष की गरिमा और प्रतिष्ठा हमारे समाज में स्थापित करने के लिए स्वामी विवेकानंद ने एक बार यह उक्ति कही थी, कि यदि हमें गौरव से जीने का भाव अपने आप में जगाना है, और अपने अंतर्मन में राष्ट्र भक्ति के बीज को पल्लवित करना है तो राष्ट्रीय तिथियों का आश्रय लेना होगा। गुलाम बनाए रखने वाले परकीयों के दिनांकों पर आश्रित रहने वाला अपना आत्म गौरव खो देता है। आज हम अपने गौरव और इतिहास को बिसार कर दूसरों की संस्कृति से सम्मोहन कर बैठे हैं, तभी तो हमारा समाज पिछड़ता जा रहा है। फिर बात किसी भी क्षेत्र की हो। अगर उदाहरण के रूप में समझें, तो जिस शिक्षा पद्धति पर आज ब्रिटेन और विदेशी देश चल रहे हैं, कि युवाओं को सिर्फ उस क्षेत्र विशेष का ज्ञान दिया जाए। जिसमें उसकी अभिरुचि है। तो यह व्यवस्था तो हमारे गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था के आसपास ही नजर आती है। लेकिन हम तो आधुनिक होने की फिराक में फंस गए हैं। जिससे स्वयं अपना नुकसान कर रहे हैं। बात हम वैसे भारतीय नववर्ष की करते हैं। तब इसका मतलब चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से होता है। जिसे नव-संवत्सर भी कहा जाता हैं।

भले अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह अक्सर मार्च-अप्रैल के महीने से आरंभ होता है। पर भारतीय नववर्ष की शुरुआत ही ऐसे दिन के साथ होती है। जो सांस्कृतिक और ऐतिहासिक कहानियों से अभिभूत है, जो समाज और भारत को अन्य देशों से श्रेष्ठ बनाता है। फिर सवाल यही है कि हम उधार की संस्कृति और एक जनवरी से आरंभ होने वाले अंग्रेजी नववर्ष को इतना महत्व क्यों देते हैं। जो हमारी संस्कृति और सभ्यता को चुराकर ही आगे बढ़ रहा है। हमें दूसरे की संस्कृति और विरासत का अपमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि हम बहुजन हिताय बहुजन सुखाय और वसुधैव कुटुम्बकम की बात करने वाले लोग हैं। फिर भी यह न्यायसंगत नहीं, कि आधुनिक होने के नाम पर अपनी पुरातन बातों से इत्तेफाक रखना भूल जाएं। आज की हमारी पीढ़ी अंग्रेजी ग्रेगेरियन कैलेंडर को ही अपना समझकर हर्ष और उल्लास मनाती है। जो यह साबित करता है, कि शायद हमें अपने गौरव और सभ्यता का ज्ञान नहीं। हम बात तो हिंदी, हिन्दू और हिंदुस्तान की करते हैं, लेकिन चलते अंग्रेजों की राह पर हैं।

एक बार पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को जब किसी ने एक जनवरी को नववर्ष की बधाई दी तो उन्होंने कहा, किस बात की बधाई? मेरे देश और देश के सम्मान का तो इस नववर्ष से कोई संबंध नहीं। तो यह बात हमारी रहनुमाई व्यवस्था और हमारा समाज क्यों नहीं समझता? सबको नहीं तो बुद्धिजीवी और सामाजिक रूप से सचेत लोगों को अपनी विरासत पर अभिमान कर उसको प्रसारित और प्रचारित करना चाहिए, वरना आने वाली पीढ़ी को यह पता भी नहीं चलेगा, कि हम कितनी सांस्कृतिक विविधता और समृद्ध संस्कृति के धनी रहे हैं। अगर इस भारतीय नववर्ष के ऐतिहासिक पहलू को देखें, तो दो हजार वर्ष पहले शकों ने सौराष्ट्र और पंजाब को रौंदते हुए अवंतिका पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की। इसके अलावा विक्रमादित्य ने राष्ट्रीय शक्तियों को एक सूत्र में पिरोया और शक्तिशाली मोर्चा खड़ा करके ईसा पूर्व 57 में शकों पर भीषण आक्रमण कर विजय प्राप्त की। इसी सम्राट विक्रमादित्य के नाम पर भारत में विक्रमी संवत प्रचलित हुआ। इतना ही नहीं अगर भारतीय नववर्ष का पौराणिक महत्व देखें, तो यही दिन सृष्टि रचना का पहला दिन है। इसी दिन प्रभु राम ने लंका पर विजय प्राप्ति के बाद अयोध्या में राज्याभिषेक के लिए चुना था। इसके अलावा धार्मिक महत्व को देखें। तो शक्ति और भक्ति की प्रतिमूर्ति मां दुर्गा के नौ रूपों की उपासना का पहला दिन भी यही है। ऐसे में जब आज की राजनीति रामराज्य स्थापित करने की बात करती है, साथ में स्त्री की अस्मिता को सुरक्षित रखने का दंभ भी भरती है, तो भारतीय नववर्ष के पहले दिन को क्यों भूल जाती है? उस कैलेंडर को क्यों भूल जाती है, जिसकी बदौलत भारतीय नववर्ष की शुरुआत हुई थी। ऐसे में मतलब स्पष्ट है, यह दिन भारतीय संस्कृति में अद्वितीय स्थान रखता है। तो क्यों न हम ऐसा कुछ संकल्प करें, जिस राह पर चलकर हमारी संस्कृति और सभ्यता और सुदृढ़ हो सके।

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