निर्वाचन बांड से चंदे में नहीं आई पारदर्शिता

By Independent Mail | Last Updated: Apr 9 2019 11:58PM
निर्वाचन बांड से चंदे में नहीं आई पारदर्शिता

प्रमोद भार्गव

राजनीतिक दलों को मिलने वाला देशी-विदेशी चंदा एक बार फिर कठघरे में है। भारत निर्वाचन आयोग ने इस आशय की अर्जी सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत की है कि निर्वाचन बांड से चंदे में पारदर्शिता नहीं आई है। इसमें उल्लेख है कि राजग सरकार द्वारा किए गए कानूनी बदलावों से उल्टा असर देखने में आ रहा है। दरअसल चुनाव आयोग ने एडीआर की याचिका का उत्तर देते हुए सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर स्पष्ट किया है कि 2017 में निर्वाचन बांड को कानूनी रूप में लाते वक्त सरकार ने दावा किया था कि इससे चंदे में पारदर्शिता आएगी और यह पहल चुनाव सुधार की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी। इस दृष्टि से जनप्रतिनिधित्व, आयकर, वित्त और आरबीआई कानूनों में विधेयक के जरिए संशोधन किए गए। लेकिन इन कानूनों में बदलाव के बावजूद कोई सुधार तो हुआ नहीं, बल्कि यह कहावत चरितार्थ हुई कि थोथा चना, बाजे घना। दरअसल अब राजनैतिक दलों के लिए चंदे की जानकारी देना बाध्यकारी ही नहीं रह गया है। वैसे राजनीतिक चंदा हमारे देश में हमेशा ही सुर्खियों में बना रहकर विवादित रहा है। 1976 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने विदेशी चंदा लेने पर पूरी तरह रोक लगा दी थी। यह प्रतिबंध उन कंपनियों से चंदा लेने पर भी थी, जिनमें 50 फीसद से भी ज्यादा हिस्सेदारी विदेशी धन की थी। 2010 में मनमोहन सिंह सरकार ने इस कानून में संशोधन कर इस रोक को समाप्त कर दिया। यह इसलिए भी जरूरी था, क्योंकि आर्थिक उदारवादी प्रक्रिया के चलते प्रवासी भारतीय देश की अर्थव्यवस्था में बड़ी भूमिका निभा रहे थे। इसी विधेयक में 2016 व 2018 में नरेंद्र मोदी सरकार ने दो ऐसे संशोधन किए, जिनके जरिए राजनीतिक दलों को विदेशी चंदा लेने की शत-प्रतिशत छूट मिल गई। यही नहीं इस छूट को 1976 के बाद के सभी विदेशी चंदों पर लागू कर दिया गया। मसलन जो दल गैर-कानूनी तरीके से विदेशी चंदा लेकर संदेह की स्थिति में थे, वे इस संदेह से मुक्त हो गए। इसी के साथ दलों को निर्वाचन बांड के जरिए चंदा लेने की सुविधा भी दे दी गई। इन प्रावधानों से स्वष्ट होता है कि केंद्र की राजग सरकार राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता के हक में नहीं रही। 

हालांकि राजनीतिक दलों और औद्योगिक घरानों के बीच लेन-देन में पारदर्शिता के नजरिए से 2013 में संप्रग सरकार ने कंपनियों को चुनावी ट्रस्ट बनाने की अनुमति दी थी। ऐसा इसलिए किया गया था, जिससे उद्योगपतियों के नाम किसी दल विशेष के साथ न जोड़े जा सकें। नतीजतन चंद ही दिनों में ऐसे कई ट्रस्ट वजूद में आ गए, जो धर्मार्थ एवं लोक-कल्याण के बहाने दलों को चंदा देने लग गए। इन्हीं में से एक ट्रस्ट में एक ऐसी कंपनी भी थी, जिसका स्वामित्व विदेशी था और इस ट्रस्ट ने लगभग सभी बड़े राजनीतिक दलों को चंदा दिया था। गोया, इस जटिल मामले की वैधता की जांच भी सुप्रीम कोर्ट में चल रही है। दरअसल एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स नाम के एनजीओ ने इन्हीं ट्रस्टों द्वारा दिए चंदे का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हुए यह सार्वजनिक किया था कि साल 2004 से 2015 के बीच हुए विधानसभा चुनावों में किस दल को कितना चंदा मिला। इस दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों को 2,100 करोड़ रुपए का चंदा मिला है। इसका 63 प्रतिशत नकदी के रूप में लिया गया। इसके अलावा भी पिछले 3 लोकसभा चुनावों में भी 44 फीसद चंदे की धनराशि नकदी के रूप में ली गई। राजनीतिक दल उस 75 फीसद चंदे का हिसाब देने को तैयार नहीं हैं, जिसे वे अपने खातों में अज्ञात स्रोतों से आया दर्शा रहे हैं। एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार 2014-15 में व्यापारिक घरानों के चुनावी ट्रस्टों से दलों को 177.40 करोड़ रुपए चंदे के रूप में मिले हैं। इनमें सबसे ज्यादा चंदा 111.35 करोड़ भाजपा, 31.6 करोड़ कांग्रेस, एनसीपी को 5 करोड़, बीजू जनता दल को 6.78 करोड़, आम आदमी पार्टी को 3 करोड़, आईएनएलडी को 5 करोड़ और अन्य दलों को 14.34 करोड़ रुपए मिले हैं। सुप्रीम कोर्ट ने चंदे की इसी गड़बड़ी की वैधता को जांचने के आदेश दिए हैं। वित्त विधेयक-2017 में प्रावधान है कि कोई व्यक्ति या कंपनी चेक या ई-पेमेंट के जरिए चुनावी बांड खरीद सकता है। ये बियरर चेक के तरह बियरर बांड होंगे। मसलन इन्हें दल या व्यक्ति चैकों की तरह बैंकों से भुना सकते हैं। चूंकि बांड केवल ई-ट्रांसफर या चेक से खरीदे  जा सकते हैं, इसलिए खरीदने वाले का पता होगा, लेकिन पाने वाले का नाम गोपनीय रहेगा। अर्थशा्त्रिरयों ने इसे कालेधन को बढ़ावा देनी वाली पहल बताया था। क्योंकि इस प्रावधान में ऐसा लोच है कि कंपनियां इस बॉन्ड को राजनीतिक दलों को देकर फिर से किसी अन्य रूप में वापस ले सकती हैं।  कंपनी या व्यक्ति बांड खरीदने पर किए गए खर्च को बहीखाते में तो दर्ज करेंगी, लेकिन यह बताने को मजबूर नहीं रहेंगी कि उसने ये बांड किसे दिए हैं। यही नहीं सरकार ने इन संशोधनों के साथ कंपनियों से चंदा देने की सीमा भी समाप्त कर दी थी। जिस किसी भी पंजीकृत दल को पिछले विधानसभा या लोकसभा चुनाव में एक प्रतिशत वोट मिले हों, उसके नाम का बांड खरीदा जा सकता है। बांड खरीदे जाने की सुविधा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की चुनिंदा शाखाओं में है। बांड के जरिए 20 हजार रुपए से ज्यादा चंदा देने वाली कंपनी या व्यक्ति का नाम भी बताना जरूरी नहीं रह गया है। जबकि इसी सरकार ने कालेधन पर अंकुश लगाने की दृष्टि से राजनीतिक दलों को मिलने वाले नकद चंदे में पारदार्शिता लाने की पहल करते हुए आम बजट में नकद चंदे की सीमा 20,000 रुपए से घटाकर 2,000 रुपए की हुई है। हालांकि केंद्र सरकार ने यह पहल निर्वाचन आयोग की सिफारिश पर की थी। आयोग ने इसके लिए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 में संशोधन का सुझाव दिया था। फिलहाल दलों को मिलने वाला चंदा आयकर अधिनियम 1961 की धारा 13 (ए) के अंतर्गत आता है। इसके तहत दलों को 20,000 रुपए से कम के नकद चंदे का स्रत बताने की जरूरत नहीं है। इसी झोल का लाभ उठाकर दल बड़ी धनराशि को 20,000 रुपए से कम की राशियों में सच्चे-झूठे नामों से बही खातों में दर्ज कर कानून को ठेंगा दिखाते रहे हैं। इस कानून में संशोधन के बाद जरूरत तो यह थी कि दान में मिलने वाली 2,000 तक की राशि के दानदाता की पहचान को आधार से जोड़ा जाता, जिससे दानदाता के नाम का खुलासा होता रहता। किंतु ऐसा न करते हुए सरकार ने निर्वाचन बॉन्ड के जरिए उपरोक्त प्रावधानों पर पानी फेर दिया। मजे की बात यह है कि इन संशोधनों का विरोध किसी भी राजनीतिक दल ने नहीं किया है। इससे लगता है कि सभी दल हमाम में नंगे हैं। क्योंकि सभी दल उद्योगपतियों से नामी-बेनामी चंदा लेकर ही अपना राजनीतिक सफर तय करके मंजिल पर पहुंचते हैं। एक मोटे अनुमान के अनुसार देश के लोकसभा और विधानसभा चुनावों पर 50 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च होते हैं। इस खर्च में बड़ी धनराशि कालाधन और आवारा पूंजी की होती है।  

  • वरिष्ठ पत्रकार
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